अर्पणा संत सिंह
सृजनकर्ता ने मुझे
सृजित का वरदान दिया
सृजित करती नवजीवन को
प्रेम, स्नेह से पोषित करतीं
सर्वस्व से सींचित करतीं
संचालिका हूँ सभ्यता की
संरक्षिका हूँ मानवता की
प्रेम स्नेह सहयोग समन्वय
दया करूणा त्याग समर्पण
मधुरता वत्सल्य मातृत्व
यहीं हमारी प्रकृतिक गुण
हाँ , मैं हूँ नारी
नारी हूँ मैं
कई रूप में
जीवन के आरम्भ से अंत तक
मेरा तेरा संग रहा
न तू पृथक हो मुझसे रहा
न मैं पृथक हो कर तुझसे रही
सुसंस्कृत उन्नत समाज के निर्माण में
मेरी सहभागिता के बिना
यह स्वप्न आधा अधूरा ही रह जाएंगा
ना बंधने की कोशिश करों
मर्यादा के नाम पर
स्वतंत्रता पर कितने पहरे
मेरे मित्रता को सहमति
मेरे इंसानियत को चरित्रहीन
मेरे स्वाभिमान को अभिमानी
वासनात्मक दृष्टि से प्रतिघात करते
हर बार
कभी सडक कभी विद्यालय कभी आफिस
कभी कभी तो घर पर भी
मेरे स्वच्छ विचार पर कुंठित मानसिकता
न हम है कोई देवी
न चाहिए हमें कोई पूजा
नारी से पहले हम हैं इंसान
हमें भी दें दो हमारे हिस्से का सम्मान