अतीत के पन्नों से
सियासत, स्त्री और स्वाभिमान का साहसिक बयान
जब सियासत में रिश्ते बने हथियार और बिस्तर बना सौदा!
राष्ट्र संवाद डेस्क
कभी-कभी अतीत की किताबें हमें झकझोर देती हैं। स्व. रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘आपहुदरी’ ऐसी ही किताब है — जो न केवल उनके जीवन की कहानी कहती है, बल्कि उस दौर की राजनीति, समाज और स्त्री की स्थिति का आइना भी दिखाती है। यह किताब पढ़ते हुए महसूस होता है कि यह सिर्फ एक स्त्री की निजी दास्तां नहीं, बल्कि पूरे दौर का दस्तावेज है।
रमणिका गुप्ता बेबाक थीं। उन्होंने जो देखा, वही लिखा। बिहार के राज्यमंत्री के साथ ट्रेन यात्रा का रोमांचक लेकिन असहज किस्सा हो या मुख्यमंत्री केबी सहाय से मुलाकात का संस्मरण — उन्होंने किसी को बख्शा नहीं। उन्होंने साफ लिखा कि मुख्यमंत्री ने उन्हें आगोश में लेकर चूमा और वे विरोध नहीं कर सकीं — या शायद करना नहीं चाहा। यह स्वीकारोक्ति चौंकाती है, लेकिन इसके पीछे की मानसिकता समझने पर कहानी कहीं गहरी हो जाती है।
इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ सच इतने तीखे होते हैं कि पढ़ते हुए रगों में सनसनी दौड़ जाती है। स्व. रमणिका गुप्ता की आत्मकथा ‘आपहुदरी’ ऐसा ही दस्तावेज है। यह सिर्फ एक स्त्री का आत्मकथ्य नहीं, बल्कि उस दौर की राजनीति के बिस्तर तक झांकने वाली साहसी गवाही है।
रमणिका गुप्ता ने जो लिखा, वह उस समय की राजनीतिक तहजीब को नंगा कर देता है। ट्रेन यात्रा का वह किस्सा, जब एक राज्यमंत्री और नेता उनके साथ कूपे में बैठे राजनीति पढ़ाने के बहाने उन्हें छूते रहे, प्रेमालाप करते रहे — और वह खामोश रहीं। और फिर मुख्यमंत्री केबी सहाय से मुलाकात का वह प्रसंग, जब चार बजे सुबह फाइलें देखने वाले मुख्यमंत्री ने फाइल बंद कर उन्हें गले लगाया, चूमा और पार्टी की जिम्मेदारी सौंपते हुए कहा – “मेरा मन तो तुमने जीत ही लिया है।”
रमणिका ने लिखा — “मैं विरोध नहीं कर सकी, शायद करना नहीं चाहा।” यह पंक्ति पढ़कर लगता है कि यह केवल एक महिला की व्यक्तिगत कमजोरी नहीं, बल्कि राजनीति में जगह बनाने की मजबूरी थी। उन्होंने साफ कहा कि यह शोषण नहीं था, यह उनका चुना हुआ “सुरक्षा कवच” था। उन्होंने मान लिया कि यह बिस्तर पर हुआ समझौता उन्हें उन दरिंदों से बचा सकता था जो राजनीति के नाम पर महिलाओं को केवल शरीर समझते थे।
‘आपहुदरी’ का सबसे बड़ा साहस यही है कि रमणिका इन रिश्तों को न तो पूरी तरह प्रेम कहती हैं और न पूरी तरह व्यभिचार। वे लिखती हैं कि सहमति से बने रिश्ते को प्रेम भी कहा जा सकता है। समाज चाहे उसे व्यभिचार कहे, पर राजनीति में यह समझौते अक्सर जरूरी हो जाते हैं। उनके शब्दों में — “मातृसत्ता की समाप्ति के बाद से औरत की पूरी जिंदगी समझौतों को स्वीकारने और नकारने की कहानी है।”
रमणिका ने यह भी लिखा कि राजनीति में सिर्फ पुरुष ही नहीं, कई महिलाएं भी बिस्तर को सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ीं। किसी ने सुरक्षा-कवच चुना, किसी ने फायदा। किसी ने इसे सौदा बना दिया। यह किताब हमें याद दिलाती है कि सत्ता के गलियारों में नैतिकता का चोला अक्सर दरवाजे पर ही उतर जाता है।
आज जब हम यह आत्मकथा पढ़ते हैं, सवाल उठता है — क्या राजनीति बदली है? क्या आज भी महिला कार्यकर्ताओं को अपनी जगह बनाने के लिए समझौते करने पड़ते हैं? क्या आज भी सत्ता और बिस्तर के बीच की रेखा इतनी ही धुंधली है?
रमणिका गुप्ता ने हमें दिखाया कि सियासत का चेहरा केवल भाषणों, रैलियों और कुर्सी के खेल से नहीं बनता, वह बिस्तर, सुरक्षा और स्वाभिमान की अदृश्य लड़ाइयों से भी बनता है। उनकी कलम ने यह साबित कर दिया कि सच चाहे जितना चुभने वाला हो, लिखना जरूरी है।
अतीत के ये पन्ने हमें चुनौती देते हैं — अगली पीढ़ी की महिलाएं कब तक इस सुरक्षा-कवच की मजबूरी में जिएंगी? कब राजनीति में उनका सम्मान उनकी बुद्धि से तय होगा, न कि उनके बिस्तर से?

