कुछ भी कहिए, मजाक में ही सही, पर अनंत सिंह से ज्यादा लोकतांत्रिक नेता आपको अभी भारतीय राजनीति में ढूंढें नहीं मिलेगा। बिहार में तो बिलकुल भी नहीं।
नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव जिस समय पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावी मतगणना में हो रहे विलंब पर चुनाव आयोग को “देश का सबसे अशुद्ध और आवारा संस्थान” के तमगे से नवाज रहे थे, जिसमें कुछ ही देर बाद उनके पार्टी के कैंडिडेट विजयी घोषित हुए, उसी समय, अपने समर्थित उम्मीदवार के हार जाने पर अनंत सिंह की यह प्रतिक्रिया थी।
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पत्रकार: अनंत जी, MLC चुनाव के लिए आपके कैंडिडेट अनुज सिंह थे, अभी तीसरे नंबर पर चल रहे हैं?
अनंत सिंह: नहीं, हार गए, अब तीसरा-चौथा कहां हैं? गिनती खतम हो गया। तीसरा-चौथा के बाते अब नहीं हैं।
पत्रकार: क्या लगता है?
अनंत सिंह: क्या लगता है? हार गए। लगे के कौन बात है? दोकान से लाये थे जो कैसे कम गया कि तौल के लाए थे। जनता मालिक हैं, भगवान है, जिनको दिया वो जीता।
जेकरा नहीं दिया, उ हारा।
पत्रकार: नीरज जी को क्या कहेंगे?
अनंत सिंह: क्या कहेंगे? उ जीत गए, हम हार गए। इसमें कहना क्या है?
पत्रकार: नीरज जी को बधाई देंगे?
अनंत सिंह: हम काहे बधाई देंगे?
पत्रकार: अगर उनके तरफ से दादा पहले फोन आता है?
अनंत सिंह: फोन आवेगा ओकर बाद के न बात है।
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जब पूरे देश में “SIR” को लेकर इतनी तीखी गहमागहमी चल रही हो, वैसी स्थिति में, एक ऐसे चुनाव में अपने समर्थित उम्मीदवार की हार को इतनी इमानदारी एवं सादगी पूर्वक स्वीकार कर लेना, जिसके पीछे अनंत सिंह ने अपना सारा ताकत झोंक दिया था, कम बड़ी बात नहीं है। एक बार भी उन्होंने नहीं कहा कि चुनाव में कुछ गड़बड़ी हुई है, जबकि उसी समय बिहार के नेता प्रतिपक्ष चुनाव आयोग को आवारा संस्थान बता रहे थे। अनंत सिंह में एक लाख अवगुण हो सकते हैं, लेकिन एक बात है कि आदमी जो अंदर है, वो बाहर है, बाकी नेताओं के तरह “घांईं” नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अनंत सिंह का बेल कैंसिल कर उन्हें सरेंडर करने को कहा। अनंत सिंह ने कहा, कोर्ट ने कहा है तो करेंगे, इसमें कौन बड़ी बात है?
(साभार:रोहित के फैसबुक वाल से)

