एमएलसी चुनाव: कांग्रेस साफ, जन सुराज की दस्तक और ‘छोटे सरकार’ की सियासत!
देवानंद सिंह
बिहार विधान परिषद की आठ सीटों के नतीजों ने सूबे की राजनीति में नए समीकरणों की पटकथा लिख दी है। भाजपा की तीन सीटों पर जीत, राजद का खाता खुलना, जन सुराज की दरभंगा में दस्तक और कांग्रेस का शून्य पर सिमटना—इन नतीजों में हर दल के लिए कोई न कोई संदेश छिपा है। लेकिन सबसे दिलचस्प तस्वीर मोकामा के ‘छोटे सरकार’ अनंत सिंह और जदयू नेता नीरज कुमार के सियासी मुकाबले से उभरी है।
अनंत सिंह जन सुराज के भूमिहार उम्मीदवार के समर्थन में खड़े थे, लेकिन नीरज कुमार ने जीत दर्ज कर अपने विरोधियों को राजनीतिक जवाब दे दिया। अनंत सिंह ने भी परिणाम के बाद साफ कहा कि उन्हें पार्टी से कोई शिकायत नहीं, उनकी नाराजगी नीरज कुमार से है। उनका यह बयान बताता है कि बिहार की राजनीति में दोस्ती, दुश्मनी और दलगत निष्ठा के अपने अलग-अलग समीकरण हैं। छोटे सरकार का यह कहना कि नीरज बोलेंगे तो वह भी बोलेंगे, वरना वह भी चुप रहेंगे, आने वाले दिनों में इस सियासी तकरार के जारी रहने का संकेत देता है।
इस चुनाव में नीरज कुमार की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि जातीय समीकरणों के आधार पर लगाए जा रहे कई अनुमान गलत साबित हुए। भूमिहार और कुर्मी मतों के संभावित बंटवारे के बावजूद उनकी जीत ने यह दिखाया कि चुनाव केवल जातीय गोलबंदी से नहीं जीते जाते। संगठन, व्यक्तिगत संपर्क और मतदाताओं का भरोसा भी अहम होता है। हालांकि, इस जीत को किसी एक जातीय समूह के मतदान का परिणाम मानना भी उचित नहीं होगा।
दूसरी ओर, प्रशांत किशोर की जन सुराज ने दरभंगा में जीत दर्ज कर बिहार की राजनीति में अपनी मौजूदगी का एहसास कराया है। इसे अभी राज्यव्यापी राजनीतिक बदलाव कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस सफलता ने स्थापित दलों को अपनी रणनीति पर विचार करने के लिए जरूर मजबूर किया है। राजद के लिए खाता खुलना राहत की बात है, जबकि कांग्रेस की हालत सबसे खराब रही। अपनी सीटिंग सीट नहीं बचा पाना उसके संगठन और नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कांग्रेस पर तंज और कांग्रेस के पलटवार के बीच असली सवाल यह है कि विपक्ष जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता कैसे लौटाएगा। भाजपा के लिए जीत उत्साह बढ़ाने वाली है, लेकिन जन सुराज की सफलता और निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत यह भी बताती है कि मतदाता हमेशा स्थापित राजनीतिक खेमों तक सीमित नहीं रहते।
निष्कर्ष साफ है—बिहार की राजनीति में न कोई स्थायी बाहुबली है, न कोई अजेय समीकरण और न ही किसी दल की जीत सुनिश्चित है। छोटे सरकार की नाराजगी अपनी जगह है, नीरज कुमार की जीत अपनी जगह और प्रशांत किशोर की दस्तक अपनी जगह। आने वाले समय में देखना होगा कि ये नतीजे केवल विधान परिषद तक सीमित रहते हैं या विधानसभा की राजनीति में भी नए संघर्ष और नए गठबंधन जन्म लेते हैं।
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