लेखक: ललित गर्ग
भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य मानने की परंपरा रही है, लेकिन आधुनिक दौर में केरल की वृद्ध संरक्षण पहल एक नई आशा का संचार कर रही है। केरल विधानसभा ने अक्टूबर 2026 में वरिष्ठ नागरिकों के संरक्षण से संबंधित एक व्यापक विधेयक सर्वसम्मति से पारित किया है, जो बुजुर्गों के जीवन में सम्मान, सुरक्षा और भरोसे का नया सूर्योदय साबित हो सकता है।
केरल की वृद्ध संरक्षण पहल: प्रमुख प्रावधान और प्रभाव
यह विधेयक बुजुर्गों की समस्याओं को केवल पारिवारिक जिम्मेदारी न मानकर सामाजिक और संस्थागत दायित्व के रूप में देखता है। इसमें शारीरिक एवं मानसिक दुर्व्यवहार, क्रूरता और इच्छा के विरुद्ध बेसहारा छोड़ने पर तीन वर्ष तक के कारावास तथा 50 हजार रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।
संरक्षण इकाइयां और देखभाल केंद्रों का नियमन
विधेयक में संरक्षण इकाइयों, देखभाल केंद्रों के पंजीकरण, देखभालकर्ताओं के प्रशिक्षण और शिकायत निवारण तंत्र पर जोर दिया गया है। साइबर धोखाधड़ी से बचाव तथा बुजुर्गों के स्वास्थ्य संबंधी निर्णयों के अधिकार जैसे विषयों को शामिल करना बदलते समय की जरूरतों को समझने का संकेत है।
‘एजिंग इन प्लेस’ की संवेदनशील अवधारणा
इस पहल का सबसे संवेदनशील पहलू ‘एजिंग इन प्लेस’ है, अर्थात बुजुर्गों को यथासंभव उनके अपने घर और परिचित परिवेश में सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर देना। वृद्धाश्रमों की आवश्यकता से इनकार नहीं, लेकिन माता-पिता के लिए घर का एक कमरा तब अधिक मूल्यवान होता है जब उसमें अपनत्व की गर्माहट हो।
बुजुर्गों को केवल भोजन, दवा और बिस्तर नहीं चाहिए, उन्हें बातचीत करने वाला साथी, उनकी बात सुनने वाला कान और उनके अस्तित्व को स्वीकार करने वाला परिवार चाहिए। उम्र के इस पड़ाव पर आर्थिक अभाव से अधिक भावनात्मक अभाव पीड़ा देता है।
बदलती जनसांख्यिकी और सिल्वर इकोनॉमी की संभावनाएं
भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 15 करोड़ है, जो 2036 तक 23 करोड़ और 2050 तक 34 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है। यह बदलती जनसांख्यिकी चेतावनी भी है और अवसर भी।
इस पहल का एक दूरदर्शी पक्ष ‘सिल्वर इकोनॉमी’ की अवधारणा है। बुजुर्गों को केवल सहायता प्राप्त करने वाले नागरिकों के रूप में नहीं, बल्कि समाज के सक्रिय योगदानकर्ता के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुभव, ज्ञान और कौशल का उपयोग शिक्षा, परामर्श, सामाजिक सेवा और उद्यमिता में किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि बुजुर्ग आबादी आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
राष्ट्रीय स्तर पर क्रियान्वयन की आवश्यकता
अब समय है कि केंद्र सरकार और दूसरे राज्य भी केरल की इस पहल से प्रेरणा लें। केंद्र के माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के प्रभावी क्रियान्वयन की समीक्षा हो तथा उसे और सशक्त बनाया जाए। राज्यों में समर्पित संरक्षण इकाइयां, सुलभ शिकायत व्यवस्था, निःशुल्क कानूनी सहायता और घर पर स्वास्थ्य सेवाएं विकसित की जाएं।
पुलिस, अस्पतालों, बैंकों और स्थानीय निकायों में बुजुर्गों की समस्याओं के त्वरित समाधान की व्यवस्था हो। साथ ही, विद्यालयों और महाविद्यालयों में पीढ़ियों के बीच संवाद तथा परिवारों में संवेदनशीलता विकसित करने के अभियान चलाए जाएं। कानून अपराध होने के बाद दंड दे सकता है, लेकिन संस्कार अपराध की नौबत आने से पहले ही रोक सकते हैं।
निष्कर्ष: भविष्य की सुरक्षा का मार्ग
अंततः बुजुर्गों की सुरक्षा का प्रश्न केवल एक आयु-वर्ग के कल्याण का विषय नहीं, बल्कि भारत के भविष्य की दिशा का निर्धारक है। आज जो युवा हैं, वे कल वरिष्ठ नागरिक होंगे। विकसित भारत का स्वप्न तभी सार्थक होगा जब आर्थिक समृद्धि के साथ मानवीय संवेदना और पारिवारिक आत्मीयता भी विकसित होगी। केरल की वृद्ध संरक्षण पहल एक नई रोशनी का संकेत है, इस रोशनी को देश के प्रत्येक घर तक पहुंचाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

