वोट चोरी का शोर और लोकतंत्र की असली चुनौती
देवानंद सिंह
बैलेट पेपर हो या ईवीएम, चुनाव की विश्वसनीयता का आधार तकनीक नहीं, निष्पक्षता और जनविश्वास है। उत्तर प्रदेश और बिहार के विधान परिषद चुनावों में बूथ कैप्चरिंग और मतपत्रों की कथित लूट की पुरानी घटनाएं याद दिलाती हैं कि चुनावी धांधली का खतरा किसी एक मतदान प्रणाली तक सीमित नहीं रहा है।
एक दौर में बूथों पर कब्जा, मतदाताओं को डराना और मतपत्रों पर जबरन मुहर लगाने जैसी घटनाएं लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती थीं। उस समय निगरानी के साधन सीमित थे और कई मामलों में पत्रकारों की तस्वीरें तथा अखबारों की खबरें ही घटनाओं को सामने लाने का माध्यम बनती थीं। आज तकनीक बदली है, लेकिन चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की जरूरत अब भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
बैलेट पेपर की वापसी की मांग और ईवीएम पर उठते सवालों के बीच यह समझना जरूरी है कि कोई भी प्रणाली अपने आप में पूर्ण सुरक्षा की गारंटी नहीं देती। मतदान की विश्वसनीयता पारदर्शी व्यवस्था, प्रभावी निगरानी और शिकायतों की निष्पक्ष जांच से तय होती है। इसलिए चुनावी गड़बड़ी के आरोपों को न बिना जांच स्वीकार करना चाहिए, न राजनीतिक आरोप बताकर खारिज कर देना चाहिए। फैसला तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।
मतदाता सूची का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। किसी पात्र नागरिक का नाम छूटना उसके लोकतांत्रिक अधिकार का हनन है, जबकि अपात्र नामों को हटाना भी जरूरी है। चुनाव आयोग को सूची में संशोधन की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और जवाबदेह बनानी चाहिए, ताकि किसी योग्य मतदाता को मतदान से वंचित न होना पड़े। राजनीतिक दलों को भी वास्तविक शिकायतें प्रमाणों के साथ उठानी चाहिए, न कि हर विवाद को केवल राजनीतिक लाभ-हानि से जोड़ना चाहिए।
वोट चोरी के विरोध में होने वाले प्रदर्शनों में भीड़ का आकार किसी मांग की सत्यता का पैमाना नहीं हो
सकता। इसी तरह, किसी आरोप की गंभीरता केवल उसे उठाने वाले दल से तय नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान और आरोपों की निष्पक्ष जांच, दोनों अनिवार्य हैं।
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पारदर्शी कामकाज और समयबद्ध कार्रवाई से मजबूत होगी। राजनीतिक दलों को संस्थाओं में जनता का भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी निभानी होगी और नागरिकों को अपुष्ट सूचनाओं के आधार पर निष्कर्ष निकालने से बचना होगा।
लोकतंत्र की रक्षा नारों से नहीं, वोट की सुरक्षा और मतदाता के विश्वास से होती है। बैलेट पेपर हो या ईवीएम, असली कसौटी यही है कि हर पात्र नागरिक निर्भय होकर मतदान कर सके, हर शिकायत सुनी जाए और जनता के फैसले का सम्मान हो। चुनाव की पवित्रता किसी एक तकनीक की जीत में नहीं, बल्कि निष्पक्ष व्यवस्था में निहित है।

