राष्ट्र संवाद नजरिया
कैलाशपति मिश्र को पद्म सम्मान में उदासीनता क्यों?
देवानंद सिंह
भाजपा आज देश की प्रमुख राजनीतिक शक्तियों में शामिल है। पार्टी अपने कार्यकर्ताओं को संगठन की सबसे बड़ी ताकत और रीढ़ बताती है। ऐसे में बिहार भाजपा के उस तपस्वी संगठनकर्ता का सवाल स्वाभाविक रूप से सामने आता है, जिसने अपना पूरा जीवन पार्टी, संगठन और विचारधारा के लिए समर्पित कर दिया स्वर्गीय कैलाशपति मिश्र।
कैलाशपति मिश्र को भाजपा का ‘भीष्म पितामह’ कहा जाता है। जनसंघ के दौर से बिहार में संगठन को खड़ा करने से लेकर भाजपा के विस्तार तक उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। वे गुजरात के राज्यपाल रहे और राजस्थान का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला। स्वयं भाजपा के नेताओं ने उन्हें संगठन का महान शिल्पी और पार्टी को वटवृक्ष बनाने वालों में एक बताया है।
उनकी सादगी और संगठन के प्रति समर्पण का एक प्रसंग आज भी कार्यकर्ताओं के बीच चर्चा में है। बताया जाता है कि गुजरात के राज्यपाल पद से विदाई के समय उन्हें चार गाड़ियां मिली थीं। उन्होंने उन्हें निजी संपत्ति बनाने के बजाय कथित तौर पर दो गाड़ियां झारखंड भाजपा और दो गाड़ियां बिहार भाजपा संगठन को सौंप दीं। यानी जो मिला, वह भी अपने लिए नहीं, संगठन के लिए।
आज सवाल किसी दूसरे नेता को मिले सम्मान पर आपत्ति का नहीं है। सवाल यह है कि कैलाशपति मिश्र जैसे समर्पित संगठनकर्ता के योगदान को राष्ट्रीय नागरिक सम्मान के योग्य मानने में आखिर इतनी उदासीनता क्यों?
पद्म सम्मान देना सरकार की निर्धारित प्रक्रिया का विषय है, लेकिन किसी योग्य व्यक्तित्व के योगदान को सामने रखना समाज और राजनीतिक संगठनों की जिम्मेदारी भी है। आज जब उनकी जयंती पर भाजपा उन्हें श्रद्धांजलि देकर उनके आदर्शों को याद कर रही है, तब यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है।
सम्मान केवल पदक नहीं होता, वह इतिहास के प्रति कृतज्ञता की सार्वजनिक स्वीकृति भी होता है। जिस व्यक्ति ने संगठन के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर किया, क्या उसके योगदान को राष्ट्रीय सम्मान के स्तर पर पहचानने का समय अब नहीं आया?
सवाल कठिन है, लेकिन जरूरी है कैलाशपति मिश्र को पद्म सम्मान में उदासीनता क्यों?

