Close Menu
Rashtra SamvadRashtra Samvad
    Facebook X (Twitter) Instagram
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • होम
    • राष्ट्रीय
    • अन्तर्राष्ट्रीय
    • राज्यों से
      • झारखंड
      • बिहार
      • उत्तर प्रदेश
      • ओड़िशा
    • संपादकीय
      • मेहमान का पन्ना
      • साहित्य
      • खबरीलाल
    • खेल
    • वीडियो
    • ईपेपर
    Topics:
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Rashtra SamvadRashtra Samvad
    • रांची
    • जमशेदपुर
    • चाईबासा
    • सरायकेला-खरसावां
    • धनबाद
    • हजारीबाग
    • जामताड़ा
    Home » जातीय बिसात पर भाजपा का 2027 वाला दांव
    Breaking News Headlines राजनीति राष्ट्रीय संपादकीय

    जातीय बिसात पर भाजपा का 2027 वाला दांव

    Devanand SinghBy Devanand SinghOctober 5, 2026No Comments4 Mins Read
    Share Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Share
    Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link

    जातीय बिसात पर भाजपा का 2027 वाला दांव

    देवानंद सिंह
    उत्तर प्रदेश में राज्यसभा के लिए भाजपा की आठ नामों वाली सूची को महज उम्मीदवारों की घोषणा मानना राजनीतिक भूल होगी। यह सूची दरअसल 2027 के विधानसभा चुनाव की पटकथा का शुरुआती पन्ना है। भाजपा ने चेहरों का चयन करते समय जातीय गणित को जिस बारीकी से साधा है, उससे साफ है कि लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी ने अपने सामाजिक समीकरणों की कमजोर कड़ियों को पहचान लिया है और अब उन्हें जोड़ने की कवायद शुरू हो चुकी है।
    दो ब्राह्मण, दो दलित, तीन OBC और एक ठाकुर आठ नामों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश की राजनीति के लगभग पूरे सामाजिक परिदृश्य को समेटने की कोशिश की है। लोधी, पाल और कुर्मी जैसे पिछड़े वर्गों को अलग-अलग प्रतिनिधित्व देना बताता है कि भाजपा OBC राजनीति में किसी एक जाति के भरोसे नहीं रहना चाहती। दलित चेहरों को जगह देकर वह उस सामाजिक आधार को भी फिर से मजबूत करने का संदेश दे रही है, जहां विपक्ष पिछले कुछ समय से सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही ब्राह्मण और ठाकुर प्रतिनिधित्व यह बताता है कि भाजपा अपने पारंपरिक समर्थक वर्गों को भी किसी कीमत पर नजरअंदाज नहीं करना चाहती।
    यानी संदेश साफ है हर सामाजिक खांचे में भाजपा की मौजूदगी चाहिए और 2027 में किसी एक वर्ग के भरोसे चुनाव नहीं लड़ना है।
    यह रणनीति भाजपा के लिए नई नहीं है। उत्तर प्रदेश में उसकी चुनावी सफलता का बड़ा आधार यही सामाजिक इंजीनियरिंग रही है। उसने गैर-यादव OBC और गैर-जाटव दलित राजनीति को अपने साथ जोड़कर प्रदेश की सत्ता में लंबे समय तक मजबूत पकड़ बनाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह भी दिखा दिया कि यह समीकरण अब अजेय नहीं है। विपक्ष ने सामाजिक गठजोड़ के जरिए भाजपा को चुनौती दी और कई सीटों पर उसके पुराने गणित को उलट दिया।
    यही वजह है कि राज्यसभा की यह सूची राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है।
    लेकिन भाजपा के सामने असली चुनौती जातीय प्रतिनिधित्व से कहीं बड़ी है। क्या सिर्फ टिकट और पद देकर सामाजिक भरोसा वापस पाया जा सकता है? क्या जिन वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है, वे वास्तव में सरकार की नीतियों से संतुष्ट हैं? क्या रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय स्तर पर प्रशासन से जुड़े सवालों का समाधान जातीय समीकरण की भरपाई कर सकता है?
    इन सवालों से बचकर कोई भी दल 2027 की लड़ाई नहीं जीत सकता।
    भाजपा के लिए एक और चुनौती विपक्ष की रणनीति है। विपक्ष अब केवल सरकार विरोधी माहौल के भरोसे नहीं रहना चाहता, बल्कि जातीय जनगणना, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के सवालों को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में भाजपा के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को बचाना और दूसरी तरफ उन वर्गों में पैदा हुई राजनीतिक असंतुष्टि को रोकना।
    राज्यसभा की आठ सीटें शायद संख्या में छोटी हों, लेकिन इन आठ नामों में भाजपा की बड़ी राजनीतिक चिंता दिखाई देती है। पार्टी समझ रही है कि 2027 का रास्ता लखनऊ से होकर जरूर जाएगा, लेकिन उस रास्ते की कई पगडंडियां जातीय समीकरणों से होकर गुजरेंगी।
    फिर भी एक बात भाजपा को याद रखनी होगी जाति चुनाव जिताने का औजार हो सकती है, लेकिन सत्ता बचाने की गारंटी नहीं।
    उत्तर प्रदेश का मतदाता अब प्रतिनिधित्व के साथ प्रदर्शन भी देखता है। चेहरे कितने सामाजिक समूहों से आते हैं, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उन चेहरों की राजनीतिक विश्वसनीयता और सरकार की उपलब्धियां उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
    इसलिए भाजपा की राज्यसभा सूची को 2027 की जीत का फार्मूला कहना जल्दबाजी होगी। हां, इतना जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा ने अपनी चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। अब सवाल यह है कि क्या जातीय समीकरणों की यह नई बिसात विपक्ष के गठजोड़ को मात दे पाएगी, या 2024 की तरह फिर कोई नया सामाजिक समीकरण भाजपा के गणित को बिगाड़ देगा?
    2027 का चुनाव इस सवाल का जवाब देगा।

    Share. Facebook Twitter Telegram WhatsApp Copy Link
    Previous Articleभाजपा की राज्यसभा सूची में संगठन को तरजीह, ब्राह्मण चेहरे को जगह नहीं
    Next Article छोटे सरकार की बगावत: मोकामा में किसका खेल, किसका हिसाब?

    Related Posts

    छोटे सरकार की बगावत: मोकामा में किसका खेल, किसका हिसाब?

    October 5, 2026

    भाजपा की राज्यसभा सूची में संगठन को तरजीह, ब्राह्मण चेहरे को जगह नहीं

    October 5, 2026

    सियासत की बदलती राहों में स्वामी ने फिर बदला पड़ाव! राहुल गांधी से मुलाकात के बाद नई राजनीतिक पारी क

    October 5, 2026

    Comments are closed.

    अभी-अभी

    छोटे सरकार की बगावत: मोकामा में किसका खेल, किसका हिसाब?

    जातीय बिसात पर भाजपा का 2027 वाला दांव

    भाजपा की राज्यसभा सूची में संगठन को तरजीह, ब्राह्मण चेहरे को जगह नहीं

    सियासत की बदलती राहों में स्वामी ने फिर बदला पड़ाव! राहुल गांधी से मुलाकात के बाद नई राजनीतिक पारी क

    दोस्ती का खूनी खेल या मौत का इंजेक्शन? मलाड में अमन की तड़पती मौत ने खोली मुंबई की नशे वाली सड़कों क

    *मां पाउड़ी: सरायकेला राजमहल से सिंहभूम की लोकआस्था तक*

    रूस-यूक्रेन युद्ध में भारत की सक्रिय शांति पहल

    सदर अस्पताल में मानसिक स्वास्थ्य पर कार्यशाला, तनाव और नशे से बचाव की दी जानकारी

    बर्मामाइंस में मनाई गई महारानी रानी दुर्गावती की जयंती

    ‘बन्धन’ ने रूगरी स्कूल के बच्चों के साथ बांटी दुर्गापूजा की खुशियां

    Facebook X (Twitter) Telegram WhatsApp
    © 2026 News Samvad. Designed by Cryptonix Labs .

    Type above and press Enter to search. Press Esc to cancel.