अनंत सिंह पर कार्रवाई कर जदयू खुद को कितना नुकसान पहुंचाएगी?
अनुशासन के नाम पर सियासी दबाव या राजनीतिक मजबूरी? मोकामा में ‘छोटे सरकार’ के जनाधार को नजरअंदाज करना आसान नहीं
राष्ट्र संवाद संवाददाता
पटना। जदयू विधायक अनंत सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चर्चा के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इससे नुकसान किसका ज्यादा होगा—जदयू का या अनंत सिंह का? फरवरी 2015 में जब अनंत सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को कैमरे के सामने थप्पड़ मारने की धमकी दी थी, तब वह नीतीश कुमार के समर्थन में दिया गया बयान था। उस समय उनके तेवरों को लेकर पार्टी का नजरिया क्या था और आज वही अंदाज अनुशासन का मुद्दा क्यों बन रहा है? राजनीति में यह सवाल उठना लाजिमी है।
कड़वा सच यह है कि जदयू ने जब अनंत सिंह को दोबारा पार्टी में शामिल किया, तब उनके राजनीतिक व्यक्तित्व और कार्यशैली से वह अनजान नहीं थी। यदि उनकी छवि और उनका अंदाज पहले से स्पष्ट था, तो आज अनुशासन का सवाल उठाने से पहले पार्टी नेतृत्व को अपने फैसलों की समीक्षा भी करनी चाहिए। आखिर जब उनका जनाधार पार्टी के लिए उपयोगी था, तब सब ठीक था और अब मतभेद होने पर वही व्यक्तित्व परेशानी का कारण बन रहा है?
अनंत सिंह बिहार की राजनीति में अपनी अलग पहचान रखते हैं। मोकामा में उनकी राजनीति केवल किसी पार्टी के चुनाव चिह्न पर निर्भर नहीं रही है। उनके समर्थक उन्हें ‘छोटे सरकार’ के नाम से जानते हैं और उनकी व्यक्तिगत पकड़ लंबे समय से क्षेत्रीय राजनीति में चर्चा का विषय रही है। ऐसे में यह मान लेना कि पार्टी से अलग होने पर उनकी राजनीतिक ताकत समाप्त हो जाएगी, जल्दबाजी होगी। निर्दलीय चुनाव लड़कर जीतने की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता, हालांकि इसका अंतिम फैसला मतदाता ही करेंगे।
जदयू के सामने असली चुनौती अनुशासन और राजनीतिक विवेक के बीच संतुलन बनाने की है। यदि पार्टी कार्रवाई करती है, तो उसे स्पष्ट करना होगा कि उसका आधार क्या है। और यदि कार्रवाई नहीं करती, तो अनुशासन के सिद्धांत को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी देना होगा। किसी भी राजनीतिक दल की विश्वसनीयता इसी बात से तय होती है कि उसके नियम सभी पर समान रूप से लागू होते हैं या राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार बदलते दिखाई देते हैं।
अनंत सिंह की राजनीति में आन-बान और व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का सवाल भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यदि विवाद प्रतिष्ठा की लड़ाई में बदल गया, तो समझौते की राह कठिन हो सकती है। हालांकि, आगे क्या होगा, यह संबंधित पक्षों के रुख और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
जदयू को यह समझना होगा कि अनंत सिंह को पार्टी में शामिल करना उसका राजनीतिक फैसला था, इसलिए आज पैदा हुए विवाद की जिम्मेदारी से पार्टी पूरी तरह बच नहीं सकती। अनुशासन का डंडा चलाने से पहले यह आकलन जरूरी है कि कार्रवाई से संगठन को क्या हासिल होगा और मोकामा के राजनीतिक समीकरणों पर उसका क्या असर पड़ेगा। आखिरकार, राजनीति में किसी नेता को साथ लाना जितना आसान हो सकता है, उसे खोने की कीमत चुकाना उतना ही कठिन भी हो सकता है।

