सत्ता में भाजपा, फिर भी उपेक्षित क्यों महसूस कर रहा है वर्षों तक संघर्ष करने वाला कार्यकर्ता?
भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता अनिल सिंह का खुला पत्र संगठन और नेतृत्व के सामने खड़े करता है कई असहज सवाल
*इंट्रो : राजनीति में सत्ता हासिल करना जितना कठिन होता है, सत्ता मिलने के बाद संगठन की जड़ों को मजबूत बनाए रखना उससे भी बड़ी चुनौती होती है। भारतीय जनता पार्टी को खड़ा करने में दशकों तक संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। कभी रात-रात भर झंडे छापना, दीवारों पर लेखन करना, नेताओं के आगमन से पहले शहर को झंडों से सजाना और तमाम सामाजिक-राजनीतिक विरोध के बावजूद विचारधारा के लिए डटे रहना ही उनकी पहचान थी। आज जब पार्टी सत्ता और संसाधनों के साथ मजबूत स्थिति में है, तब उन्हीं पुराने कार्यकर्ताओं के सम्मान, सुनवाई और राजनीतिक योगदान के मूल्यांकन का सवाल उठना संगठन के लिए आत्ममंथन का विषय है। भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता अनिल सिंह द्वारा लिखा गया खुला पत्र इसी पीड़ा, अपेक्षा और सवालों को सामने रखता है। यह पत्र केवल एक कार्यकर्ता की शिकायत नहीं, बल्कि संगठन की कार्यशैली और नेतृत्व की जवाबदेही पर विचार करने का अवसर भी है। खुला पत्र को हूबहू राष्ट्र संवाद पाठकों के समक्ष रख रहा है*
खुला पत्र
सादर प्रणाम।
यह पत्र किसी विपक्षी दल के कार्यकर्ता का नहीं है। यह उस कार्यकर्ता की बेचैनी है जिसने भाजपा को सत्ता की सीढ़ी नहीं, बल्कि दशकों तक अपना राजनीतिक परिवार माना है।इसलिए बात थोड़ी कड़वी होगी।लेकिन अगर संगठन अपने कार्यकर्ता की कड़वी बात भी नहीं सुनेगा, तो फिर कौन सुनेगा?
आजकल कार्यकर्ताओं को लगातार उपदेश दिए जा रहे हैं—संगठन मजबूत कीजिए, जनता के बीच जाकर सरकार की उपलब्धियाँ बताइए, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहिए, विपक्ष के आरोपों का जवाब दीजिए।लेकिन कभी संगठन और सरकार में शामिल यशस्वी नेतागण कार्यकर्ता से यह नहीं पूछते—“भाई, तुम्हारी सेहद कैसी है सरकार और संगठन से कोई शिकायत तो नहीं”।
आज भाजपा के पास सरकार है, सत्ता है, संसाधन हैं, संगठन का विशाल ढांचा है।एक समय था जब भाजपा का कार्यकर्ता विपक्ष में बैठकर संघर्ष करता था।न झंडा न डंडा पूरी रात लोहे व कार्ड बोर्ड के फर्मा से झंडा खुद छापना व अपने चहेते नेता के आने के पहले पूरे नगर में पूरी पूरी रात जग के झंडे को स्वयं पोल में बाँधना,दिवाल लेखन से लेकर वे सारे कार्य करते थे जो संगठन विस्तार में आवश्यक थे।तब न कोई सरकारी पद की लालसा, न कोई सरकारी सुविधा मिलने की संभावना,
न निगम का अध्यक्ष बनने की उम्मीद,न किसी आयोग की सदस्यता का होड़ था!फिर भी कार्यकर्ता खड़ा रहा हर बूथ पर केवल एक लक्ष्य लिए “लाल किले पर कमल निशान”।
कई बार सामाजिक और राजनीतिक विरोध सहा,और एक दिन आ ही गया जब हमारी पार्टी की सत्ता आ गई।
इतिहास भाषण देने के लिए नहीं होता,इतिहास इसलिए होता है कि सत्ता में आने के बाद हम यह न भूलें कि सत्ता तक पहुँचाया किसने।
पार्टी के पुराने कार्यकर्ता की हालत ऐसी होती गई कि उसके पहचान को बीपीएल सूची में दर्ज कर दिए गए कार्यकर्ता गरीब हो सकता है,लेकिन पार्टी के लिए उसका योगदान गरीब नहीं होता।उसके पास पद नहीं हो सकता,लेकिन उसके पास दशकों का संगठनात्मक अनुभव हो सकता है।उसके पास पैसा नहीं हो सकता, लेकिन उसके पास बूथ का सामाजिक समीकरण हो सकता है।उसके पास कोई सरकारी बंगला नहीं हो सकता,लेकिन उसके पास हजारों परिवारों से वर्षों का संबंध हो सकता है।ऐसे कार्यकर्ता को केवल चुनाव के समय याद करना संगठन की शक्ति नहीं, उसकी कमजोरी का संकेत है।
सवाल यह है कि……
क्या पार्टी में कभी पुराने कार्यकर्ता की प्राथमिकता तय होगी?
क्या मंडल और जिला स्तर पर वर्षों तक काम करने वालों का रिकॉर्ड देखा जाएगा?क्या यह देखा जाएगा कि कौन व्यक्ति सत्ता आने से पहले पार्टी के साथ था?क्या यह देखा जाएगा कि कौन कार्यकर्ता चुनाव हारने के बाद भी पार्टी में खड़ा रहा?क्या यह देखा जाएगा कि कौन केवल सत्ता से लाभ लेने हेतु पार्टी की सदस्यता ली?अगर इन सवालों का जवाब नहीं है तो फिर कार्यकर्ता से “समर्पण” की अपेक्षा करने से पहले नेतृत्व को स्वयं भी आत्ममंथन करना चाहिए।
उस सामान्य कार्यकर्ता का क्या जिसने 20-30 साल तक पार्टी के लिए काम किया?जिसने कभी टिकट नहीं माँगा।जिसने कभी पद नहीं माँगा।जिसने कभी किसी नेता के दरवाजे पर अपनी राजनीतिक हैसियत का दावा नहीं किया।जो केवल इसलिए पार्टी में रहा क्योंकि उसे विचारधारा पर विश्वास था।उसकी राजनीतिक पूंजी का मूल्यांकन कौन करेगा?
लेकिन एक सवाल भाजपा संगठन को अपने भीतर भी पूछना चाहिए—क्या हमारा कार्यकर्ता भी कई बार यही महसूस नहीं करता कि उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं है?अगर तहसील में अधिकारी कार्यकर्ता की बात नहीं सुनता और संगठन में भी उसकी शिकायत केवल फाइल बनकर रह जाती है, तो फिर वह किसके पास जाए?कार्यकर्ता को पदाधिकारी के सामने सिफारिश लेकर खड़ा होना पड़े और फिर उसी कार्यकर्ता से कहा जाए कि वह सरकार की उपलब्धियाँ जनता को बताए—यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती।
सरकार की सबसे मजबूत जनसंपर्क व्यवस्था सरकारी विज्ञापन नहीं, उसका कार्यकर्ता है।अब अपने कार्यकर्ता ही आईना दिखाने लगे हैं यह भी ध्यान देने वाली बात है कि भाजपा के पक्ष में लंबे समय तक धुआंधार बल्लेबाजी करने वाले कुछ राष्ट्रवादी पत्रकार और विचारक भी अब संगठन तथा सरकार से असुविधाजनक सवाल पूछ रहे हैं।
अगर अपने पक्ष में लिखने-बोलने वाले लोग भी आईना दिखाने लगें तो कम-से-कम एक बार आईने में चेहरा जरूर देख लेना चाहिए।आईना दुश्मन नहीं होता।वह केवल वही दिखाता है जो सामने होता है।समस्या आईने में नहीं है।
समस्या तब है जब हम चेहरा देखने के बजाय आईना साफ करने में लग जाते हैं।इसी संदर्भ में एक पुरानी पंक्ति बहुत कुछ कह जाती है—
“शायद यही भूल हम जीवन भर करते रहे,
दाग चेहरे पर थे और आईना साफ करते रहे।”
एक सवाल सबसे महत्वपूर्ण हो गया है—
क्या कार्यकर्ता के भीतर पार्टी के प्रति वही भाव है जो सत्ता में आने से पहले था?
कार्यकर्ता केवल व्हाट्सऐप ग्रुप में जोड़ देने से सक्रिय नहीं होता,कार्यकर्ता सम्मान से सक्रिय होता है।कार्यकर्ता सुनवाई से सक्रिय होता है।कार्यकर्ता यह देखकर सक्रिय होता है कि संगठन में मेहनत का मूल्य है।
उसे यह भरोसा होना चाहिए कि—
मैं आज पार्टी के लिए खड़ा हूँ तो कल पार्टी भी मेरे साथ खड़ी होगी।पद बाँटना ही समाधान नहीं है यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि हर कार्यकर्ता को आयोग का अध्यक्ष या निगम का सदस्य बनाना संभव नहीं है।न ही राजनीति का अर्थ केवल पद प्राप्त करना है।
लेकिन सवाल पद का नहीं है।सवाल न्यायपूर्ण अवसर का है।
किसी को जिम्मेदारी दी जाए तो उसका आधार स्पष्ट हो।
योग्यता देखी जाए।संगठनात्मक योगदान देखा जाए।सामाजिक स्वीकार्यता देखी जाए।विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता देखी जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
कठिन समय में पार्टी के साथ खड़े रहने का इतिहास देखा जाए।अगर इन सबके बजाय केवल संपर्क, प्रभाव और पहुँच ही महत्वपूर्ण हो जाए तो फिर जमीन का कार्यकर्ता धीरे-धीरे किनारे चला जाएगा।
भाजपा की असली ताकत दिल्ली की फाइलों में नहीं, गाँव से लेकर शहर के बूथ पर है भाजपा को देश की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनाने में केवल बड़े नेताओं का योगदान नहीं है।इसके पीछे लाखों छोटे-छोटे कार्यकर्ताओं की दशकों की मेहनत है।
वह बूथ अध्यक्ष जिसकी कोई टीवी पहचान नहीं।
वह मंडल कार्यकर्ता जिसका कोई बड़ा परिचय नहीं।
वह जिला कार्यकर्ता जिसकी फोटो अखबार में नहीं छपती।
वह पुराना स्वयंसेवक जो आज भी बिना किसी पद के पार्टी के लिए काम करता है।यही भाजपा की वास्तविक पूँजी है।
पत्र शिकायत के लिए नहीं, चेतावनी के लिए है।
संगठन चाहे तो अभी भी बहुत कुछ ठीक कर सकता है।पुराने कार्यकर्ताओं का वास्तविक डेटा तैयार हो।मंडल से लेकर प्रदेश तक सक्रिय कार्यकर्ताओं की पहचान हो।
राजनीतिक नियुक्तियों में पारदर्शी और स्पष्ट प्रक्रिया हो।
कार्यकर्ताओं की शिकायतों के लिए प्रभावी व्यवस्था बने।
अधिकारियों के सामने कार्यकर्ताओं की बात सुनी जाए।
और सबसे महत्वपूर्ण—
संगठन यह संदेश दे कि भाजपा में केवल सत्ता के आसपास रहने वालों की नहीं, संघर्ष करने वालों की भी जगह है।क्योंकि चुनाव के समय बूथ पर खड़ा होने वाला कार्यकर्ता कोई “मानव संसाधन” नहीं है।वह संगठन का प्राण है,जिसने सत्ता की उम्मीद के बिना भाजपा का झंडा उठाया था।
और अगर वह आज पूछ रहा है—“जब सत्ता आई तो मेरा नंबर कब आएगा?”तो उसका मजाक मत उड़ाइए।उसकी शिकायत को अनुशासनहीनता मत कहिए।उसके सवाल को विपक्ष की भाषा मत बताइए।क्योंकि कभी-कभी सबसे जरूरी सवाल वही पूछता है जिसने सबसे ज्यादा दिया होता है।बाहर के विरोधियों से लड़ना आसान है।अपने भीतर की कमजोरी को पहचानना कठिन है।
इसलिए आईना मत तोड़िए।चेहरा देखिए।जहाँ दाग हैं, उन्हें साफ कीजिए।
ईश्वर भाजपा नेतृत्व को सद्बुद्धि दे और संगठन को अपने वास्तविक कार्यकर्ता की आवाज सुनने की शक्ति दे।
धन्यवाद
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