अंधेरे से नहीं, अंधेरे में रखने वालों से बचो!
इंद्र यादव/मुंबई/अंधेरा तो सिर्फ अंधेरा है। रात होती है, बिजली जाती है, कमरा अंधेरा हो जाता है। डर लगता है! हाँ, लगता है। लेकिन असली खतरा अंधेरे में नहीं है। असली खतरा उन लोगों में है जो तुम्हें जान-बूझकर अंधेरे में रखते हैं। जो रोशनी बुझाते हैं, फिर कहते हैं ,डरो मत, हम हैं ना।
ये लोग कहाँ-कहाँ हैं!हर जगह।
राजनीति में बैठे हैं जो तुम्हें अज्ञान का अंधेरा पसंद है इसलिए शिक्षा का बजट काटते हैं, स्कूलों में टीचर नहीं भेजते, और फिर भाषण देते हैं “गरीबों के लिए लड़ रहे हैं।” मीडिया में बैठे हैं जो आधा सच दिखाकर पूरा झूठ बेचते हैं। सोशल मीडिया के इंटेलेक्चुअल हैं जो सिर्फ नफरत और डिवाइड फैलाते हैं ताकि तुम सोचो ही मत। परिवार में भी बैठे हैं जो “बेटा/बेटी, तुम इतना मत पढ़ो, हमारा क्या होगा” वाला ड्रामा करते हैं। ऑफिस में बॉस है जो जानकारियों को अपने पास रोककर रखता है ताकि तुम कभी उसके बराबर न आ सको।
ये सब एक ही खेल खेलते हैं।
रोशनी मत आने दो। सवाल मत पूछने दो। पढ़ने-लिखने दो तो भी उतना ही दो जितने से तुम “हाँ जी, सही कहा” बोल सको। थोड़ा बहुत ज्ञान दो ताकि तुम खुद को समझदार समझो, लेकिन असली खेल की चालें कभी न बताओ। फिर जब तुम अंधेरे में ठोकर खाओ तो कहें देखा, दुनिया ऐसी ही है, हमने तो पहले से कहा था।
साला सबसे खतरनाक अपराध यही है।
चोरी-डकैती तो एक बार की बात है। लेकिन किसी की आँखों पर पट्टी बाँधकर उम्र भर अंधेरे में घुमाना… ये तो जिंदगी भर की गुलामी है। और सबसे मजेदार बात! ये लोग खुद अंधेरे से नहीं डरते। इनके पास रोशनी है। इनके बच्चों के पास रोशनी है। इनके घरों में जेनरेटर चलता है। अंधेरा सिर्फ तुम्हारे लिए रिजर्व है।
अब सवाल ये है कि बचा कैसे जाए!
पहले ये समझो कि अंधेरा बाहर नहीं, अंदर पैदा होता है जब तुम सवाल करना बंद कर देते हो। जब तुम “सब कुछ भगवान् भरोसे” या “नेता जी जानते होंगे” वाली मानसिकता में चले जाते हो। जब तुम फ्री में मिलने वाली अफवाहों को सच मान लेते हो और किताब खोलना मुश्किल समझते हो।
रोशनी माँगो। जबरदस्ती माँगो।
किताब पढ़ो। सवाल पूछो। आंकड़े मांगो। वीडियो देखो तो दोनों तरफ का देखो। किसी के “भरोसा रखो” वाले डायलॉग पर तुरंत विश्वास मत करो। जो तुम्हें ज्ञान से दूर रखना चाहता है, वो तुम्हारा दुश्मन है — चाहे वो तुम्हारा नेता हो, गुरु हो, रिश्तेदार हो या दोस्त।
अंधेरा तो आएगा और जाएगा।
लेकिन जो लोग तुम्हें अंधेरे में रखने का बिजनेस चला रहे हैं, उनसे बचो। उनसे दूर रहो। उनकी दुकान बंद करो। क्योंकि अंधेरे से तो आदमी डर कर रोशनी ढूँढ लेता है।
लेकिन अंधेरे में रखने वाले आदमी की आँखें ही फोड़ देते हैं।
और फिर वो आदमी रोशनी आने पर भी अंधा ही रहता है।

