दिनकर को याद करना आसान, दिनकर को आत्मसात करना कठिन
देवानंद सिंह
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का नाम लेते ही हिंदी साहित्य में ओज, स्वाभिमान, राष्ट्रचेतना, सामाजिक न्याय और जनसरोकार का एक विराट संसार सामने उभरता है। 23 सितंबर 1908 को बिहार के सिमरिया में जन्मे दिनकर ने कविता को केवल सौंदर्य और मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज और राष्ट्र के प्रश्नों से जोड़ने का काम किया। यही कारण है कि दशकों बाद भी उनकी रचनाएं केवल साहित्य की पुस्तकों में बंद नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में उद्धृत होती हैं और नई पीढ़ियों को प्रभावित करती हैं।
आज उनकी जयंती पर देशभर में साहित्यिक, सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उनके जन्मस्थान सिमरिया में भी उन्हें स्मरण किया जा रहा है। मंच सजे , माल्यार्पण हुआ, भाषण हुए, दिनकर की पंक्तियां दोहराई गई और उनके योगदान को याद किया गया। यह सब आवश्यक है, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है क्या हम दिनकर को केवल याद कर रहे हैं या उनकी सोच को अपने जीवन और कर्म में उतार भी रहे हैं?
दिनकर को आत्मसात करने का अर्थ केवल उनकी कविताएं पढ़ना या उनकी प्रसिद्ध पंक्तियां सुनाना नहीं है। उनकी रचनाओं के भीतर जो बेचैनी है, वह अन्याय के प्रति है जो आक्रोश है, वह शोषण के विरुद्ध है जो राष्ट्रभावना है, वह केवल नारों तक सीमित नहीं है और जो स्वाभिमान है, वह व्यक्ति से लेकर समाज और राष्ट्र तक जिम्मेदारी का बोध कराता है।
आज साहित्य जगत में दिनकर की उपस्थिति है, लेकिन यह प्रश्न भी उतना ही प्रासंगिक है कि क्या दिनकर जैसी सामाजिक बेचैनी और जनसरोकार की आवाज हमारे समय के साहित्य में उतनी ही मुखर दिखाई देती है? यह किसी एक कवि या साहित्यकार पर सवाल नहीं, बल्कि पूरे साहित्यिक समाज के सामने एक आत्ममंथन का विषय है।
आज क्षेत्रीय स्तर पर अनेक कवि और साहित्यकार सक्रिय हैं। वे अपने-अपने क्षेत्रों की भाषा, संस्कृति, सामाजिक समस्याओं और स्थानीय सरोकारों को अपनी रचनाओं में स्थान दे रहे हैं। यह साहित्य की शक्ति है। लेकिन क्षेत्रीय चेतना और राष्ट्रीय चेतना एक-दूसरे की विरोधी नहीं होनी चाहिए। दिनकर का साहित्य हमें यही व्यापक दृष्टि देता है कि अपनी मिट्टी से जुड़कर भी पूरे देश और समाज की चिंता की जा सकती है।
आज पत्रकारिता के सामने भी यही चुनौती है। पत्रकार का काम केवल घटनाओं को दर्ज करना नहीं, बल्कि समाज के सवालों को सामने लाना भी है। दिनकर की लेखनी से प्रेरणा लेने का अर्थ यह नहीं कि हर पत्रकार उनकी भाषा या शैली की नकल करे। बल्कि यह है कि पत्रकारिता में निर्भीकता, जनसरोकार और सवाल पूछने की परंपरा मजबूत हो। सत्ता हो या समाज जहां सवाल जरूरी हों, वहां सवाल उठाने का साहस बना रहे।
साहित्यकारों के लिए भी दिनकर का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि साहित्य समय से संवाद करे। ‘रश्मिरथी’ का कर्ण हो, ‘कुरुक्षेत्र’ का युद्धबोध हो, ‘उर्वशी’ का मानवीय और दार्शनिक विमर्श हो या ‘संस्कृति के चार अध्याय’ की सांस्कृतिक दृष्टि दिनकर को एक ही रंग में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना होगा।
इसलिए आज आवश्यकता केवल ‘राष्ट्रकवि दिनकर अमर रहें’ कहने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि उनके साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए। स्कूलों और महाविद्यालयों में उनकी रचनाओं पर गंभीर चर्चा हो। साहित्यिक संस्थाएं केवल जयंती और पुण्यतिथि तक सीमित न रहें, बल्कि वर्षभर पाठ, संवाद और विचार-विमर्श आयोजित करें। पत्रकार दिनकर को पढ़ें, कवि उन्हें समझें और सामाजिक संस्थाएं उनके साहित्य में मौजूद जनसरोकारों को अपने कार्यों से जोड़ें।
राष्ट्रकवि की कमी इसलिए नहीं खलती कि आज कवि नहीं हैं कमी इसलिए महसूस होती है कि दिनकर जैसी व्यापक जनस्वीकार्यता, निर्भीक वैचारिक आवाज और साहित्य को सामाजिक चेतना से जोड़ने वाली परंपरा को निरंतर मजबूत करने की जरूरत है।
दिनकर को श्रद्धांजलि का सबसे सार्थक तरीका उनके नाम पर कार्यक्रम करना भर नहीं, बल्कि उनकी रचनाओं को पढ़ना और उनसे सवाल करना है हमारे समय का अन्याय क्या है? समाज की पीड़ा क्या है? लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका क्या है? साहित्य की जिम्मेदारी क्या है? और राष्ट्रप्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है?
सिमरिया में दिनकर की जन्मभूमि आज भी उनकी स्मृति का केंद्र है। देशभर में होने वाले आयोजन उनकी लोकप्रियता और साहित्यिक विरासत को जीवित रखते हैं। लेकिन आने वाली पीढ़ियां दिनकर को केवल स्मारकों, तस्वीरों और भाषणों में याद करेंगी या उनकी रचनाओं में छिपी चेतना को अपने जीवन में उतारेंगी असल परीक्षा यहीं है।
दिनकर को पढ़ना साहित्य से जुड़ना है, उन्हें समझना समाज से जुड़ना है और उनकी मूल चेतना को आत्मसात करना अपने समय के प्रति जिम्मेदार होना है।
दिनकर को श्रद्धांजलि शब्दों से नहीं, विचारों और कर्म से दीजिए। यही राष्ट्रकवि के प्रति सच्चा सम्मान होगा।

