लेखक: देवानंद सिंह
दुनिया जिस समय गहरे भू-राजनीतिक तनाव, युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, व्यापारिक टकराव और बदलते शक्ति-संतुलन के दौर से गुजर रही है, उस समय नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सर्वसम्मति से सफल होना भारत की कूटनीतिक क्षमता की बड़ी परीक्षा थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में ब्रिक्स के 21 सदस्य देशों द्वारा ‘नई दिल्ली घोषणापत्र 2026’ को सर्वसम्मति से स्वीकार किया जाना निश्चित रूप से भारत के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक उपलब्धि है। खास बात यह है कि घोषणा-पत्र पर किसी सदस्य देश ने आपत्ति नहीं जताई। यह सहमति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विस्तारित ब्रिक्स में अलग-अलग राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक हित रखने वाले देश शामिल हैं।
ब्रिक्स का विस्तार और विकासशील देशों की आकांक्षाएं
ब्रिक्स के मंच पर भारत ने जिस सोच को आगे रखा, उसका मूल संदेश स्पष्ट है विश्व व्यवस्था में किसी एक शक्ति का वर्चस्व नहीं, बल्कि व्यापक भागीदारी, संवाद और साझेदारी होनी चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि “हम किसी के विरुद्ध नहीं, सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं”, भारत की संतुलित विदेश नीति का सार प्रस्तुत करता है। भारत न तो किसी गुट के खिलाफ खड़ा दिखाई देना चाहता है और न ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करना चाहता है। यही संतुलन आज भारत को वैश्विक कूटनीति में अलग पहचान दे रहा है।
ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह अब केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। इसके विस्तार के साथ एशिया, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और अन्य क्षेत्रों के महत्वपूर्ण देश इससे जुड़े हैं। ऐसे में यह मंच विकासशील देशों की आकांक्षाओं को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सामने रखने का प्रभावी माध्यम बन सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस बात पर जोर दिया कि यदि भविष्य साझा है तो उसके निर्माण में योगदान भी साझा होना चाहिए। यह बात केवल भाषण का हिस्सा नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था की वास्तविकता है। विकासशील देशों को लंबे समय से शिकायत रही है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी आबादी, आर्थिक योगदान और वैश्विक महत्व के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं है। भारत ने इस असंतुलन को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग
इसी संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि यूएनएससी में सुधार अब और नहीं टाला जा सकता, वैश्विक शासन व्यवस्था की मौजूदा संरचना पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। आज दुनिया की अर्थव्यवस्था, जनसंख्या और शक्ति संतुलन में बड़ा बदलाव आ चुका है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की संरचना अभी भी काफी हद तक पुराने दौर की वास्तविकताओं पर आधारित है। भारत का आग्रह है कि निर्णय लेने वाली संस्थाओं में विकासशील और उभरती शक्तियों को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इस मुद्दे पर अधिक जानकारी के लिए संयुक्त राष्ट्र चार्टर देखें।
भारत-चीन संबंध: संवाद की वापसी
इस ब्रिक्स सम्मेलन की एक और बड़ी विशेषता भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर पूरी दुनिया की नजर रही। वर्ष 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत-चीन संबंध जिस तनावपूर्ण दौर से गुजरे, उसमें धीरे-धीरे संवाद और संपर्क की वापसी सकारात्मक संकेत है। हालांकि यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि एक बैठक से दोनों देशों के सभी विवाद समाप्त हो जाएंगे। सीमा विवाद, विश्वास की कमी और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे प्रश्न अब भी मौजूद हैं। लेकिन कूटनीति में संवाद का महत्व सबसे अधिक होता है। यदि दोनों देश सीमा पर शांति और स्थिरता सुनिश्चित करते हुए आर्थिक एवं व्यापारिक संबंधों को व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाते हैं, तो इसका लाभ केवल भारत और चीन को नहीं, बल्कि पूरे एशिया को मिल सकता है। भारत के लिए यह संतुलन बेहद आवश्यक है। चीन के साथ प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन पड़ोसी देश के साथ संवाद और स्थिरता भी उतनी ही जरूरी है। भारत को अपनी सुरक्षा चिंताओं से समझौता किए बिना आर्थिक और राजनयिक अवसरों का इस्तेमाल करना होगा।
रूस, चीन और पश्चिम: भारत की संतुलित कूटनीति
ब्रिक्स सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मौजूदगी भी भारत की रणनीतिक स्थिति को रेखांकित करती है। भारत और रूस के बीच लंबे समय से चले आ रहे रक्षा, ऊर्जा और आर्थिक संबंधों को नई परिस्थितियों में आगे बढ़ाना भारत की प्राथमिकता है। दूसरी ओर भारत अमेरिका और यूरोप के साथ भी अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत कर रहा है। यही भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी विशेषता है भारत किसी एक ध्रुव का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर सभी प्रमुख शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है। रूस से संबंध हों, अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी हो, यूरोप के साथ व्यापार हो, खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा संबंध हों या इंडो-पैसिफिक में सहयोग भारत हर मोर्चे पर अपनी स्वतंत्र भूमिका बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। ब्रिक्स में ईरान और यूएई जैसे देशों की मौजूदगी इस मंच की जटिलता को भी दर्शाती है। पश्चिम एशिया की अस्थिरता, होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े जोखिम पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे विषयों पर ब्रिक्स यदि साझा दृष्टिकोण विकसित करता है तो उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता और बढ़ेगी।
नई दिल्ली घोषणापत्र: क्रियान्वयन ही असली कसौटी
भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स को केवल एक राजनीतिक मंच के रूप में नहीं, बल्कि परिणाम देने वाली संस्था के रूप में विकसित करने की कोशिश दिखाई दी है। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की कार्यप्रणाली में निरंतरता और निर्णयों के क्रियान्वयन के लिए संस्थागत व्यवस्था बनाने की बात कही है। यह प्रस्ताव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हर साल अध्यक्षता बदलने से कई बार पिछली पहलों की गति प्रभावित होती है। यदि ब्रिक्स अपने निर्णयों की निगरानी, समीक्षा और क्रियान्वयन के लिए स्थायी तंत्र विकसित करता है तो इस संगठन की प्रभावशीलता कई गुना बढ़ सकती है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और आपसी व्यापार जैसे क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएं शुरू करना अब समय की मांग है। सिर्फ संयुक्त घोषणाएं और सम्मेलनों की तस्वीरें किसी संगठन को प्रभावशाली नहीं बनातीं। उसकी ताकत तब साबित होती है जब उसके निर्णय आम लोगों की जिंदगी में बदलाव लाते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की अध्यक्षता को आम लोगों से जोड़ने की बात इसी संदर्भ में कही है।
भारत के सामने बड़ी जिम्मेदारी
नई दिल्ली घोषणापत्र भारत की सफलता जरूर है, लेकिन इसे अंतिम उपलब्धि मानना उचित नहीं होगा। असली चुनौती अब घोषणापत्र में व्यक्त सहमति को ठोस कार्रवाई में बदलने की है। ब्रिक्स के भीतर अलग-अलग देशों के हितों में अंतर है। कई सदस्य देशों के बीच क्षेत्रीय और राजनीतिक मतभेद भी हैं। ऐसे में सभी को एक साझा एजेंडे पर साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा। भारत को आने वाले समय में इसी कूटनीतिक संतुलन की परीक्षा देनी होगी। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि ब्रिक्स किसी देश या समूह के खिलाफ राजनीतिक मंच न बने, बल्कि वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में अधिक न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व, सहयोग और स्थिरता की आवाज बने। ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ पर भारत ने जिस तरह ‘आवाज से प्रभाव’ और ‘विशेषाधिकार से साझेदारी’ की बात रखी है, वह आने वाले वर्षों की दिशा तय कर सकती है। दुनिया में शक्ति का संतुलन बदल रहा है और वैश्विक दक्षिण अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। इस परिवर्तन के बीच भारत के पास नेतृत्व की एक बड़ी संभावना है।
नई दिल्ली घोषणापत्र की सर्वसम्मति भारत की कूटनीतिक सफलता का प्रमाण है, लेकिन इतिहास भारत को इस बात से याद रखेगा कि उसने इस सहमति का इस्तेमाल दुनिया को कितना अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और सहयोगात्मक बनाने में किया। सम्मेलन समाप्त हो जाएगा, घोषणाएं भी सुर्खियों से हट जाएंगी, लेकिन भारत के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वह ब्रिक्स की सामूहिक शक्ति को वास्तविक वैश्विक प्रभाव में बदल पाएगा? यही नई दिल्ली सम्मेलन की असली कसौटी होगी।

