लेखक: देवानंद सिंह
पश्चिम बंगाल में 60 हजार बच्चियों का छिना बचपन एक गंभीर सामाजिक संकट का संकेत है, जहां जनवरी से जून 2026 के बीच 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की करीब 60 हजार अस्पताल में डिलीवरी के मामले सामने आए हैं। यह आंकड़ा बाल विवाह, स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
पश्चिम बंगाल में जनवरी से जून 2026 के बीच 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों की करीब 60 हजार अस्पताल में हुई डिलीवरी का आंकड़ा सामने आना महज एक प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं है। यह उस सामाजिक संकट का आईना है, जिसमें बचपन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा—चारों एक साथ खतरे में दिखाई देते हैं। सबसे अधिक 12,847 मामले मुर्शिदाबाद से सामने आना और साउथ 24 परगना तथा पूर्व बर्धमान जैसे जिलों का भी आंकड़ों में ऊपर रहना बताता है कि समस्या किसी एक परिवार या समुदाय तक सीमित नहीं है।
60 हजार बच्चियों का छिना बचपन: आंकड़ों की गवाही
सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अस्पतालों में दर्ज अंडरएज डिलीवरी के आंकड़ों को सीधे बाल विवाह या राज्य में किशोर गर्भधारण की कुल दर नहीं माना जा सकता। फिर भी छह महीने में करीब 60 हजार मामलों का सामने आना इतना गंभीर है कि इसे महज आंकड़ों की तकनीकी बहस में दबाया नहीं जा सकता।
नाबालिग उम्र में गर्भावस्था का सीधा असर लड़की के स्वास्थ्य पर पड़ता है। उसका शरीर मातृत्व के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होता और प्रसव के दौरान गंभीर स्वास्थ्य जोखिम बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही उसकी पढ़ाई छूटने, आर्थिक निर्भरता बढ़ने और सामाजिक अवसर सीमित होने की आशंका भी रहती है। यानी एक बच्ची का कम उम्र में मां बनना केवल एक परिवार की समस्या नहीं, बल्कि आने वाली पूरी पीढ़ी के विकास से जुड़ा सवाल है।
सरकार की घर-घर जाकर नाबालिग विवाह और गर्भावस्था की पहचान करने की तैयारी स्वागत योग्य है। लेकिन अभियान केवल सर्वेक्षण और नोटिस तक सीमित नहीं रहना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग, पुलिस, बाल संरक्षण इकाइयों और पंचायत स्तर के तंत्र के बीच वास्तविक समन्वय जरूरी है। जहां किसी नाबालिग की शादी या गर्भावस्था सामने आए, वहां केवल जिम्मेदार व्यक्ति की तलाश नहीं, बल्कि उस बच्ची की सुरक्षा, चिकित्सा, शिक्षा और पुनर्वास भी प्राथमिकता होनी चाहिए। अधिक जानकारी के लिए UNICEF India देखें।
मुख्य चुनौतियां और समाधान
- कानूनी क्रियान्वयन: बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम का सख्ती से पालन।
- अंतरविभागीय समन्वय: स्वास्थ्य, शिक्षा, पुलिस और पंचायतों में तालमेल।
- पुनर्वास: पीड़ित बच्चियों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका सुनिश्चित करना।
- जागरूकता: समुदाय स्तर पर अभियान चलाकर मानसिकता बदलना।
बाल विवाह रोकने के लिए कानून पहले से मौजूद हैं। चुनौती कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। विवाह कराने वालों, सहयोग करने वालों और नाबालिगों के शोषण से लाभ उठाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन साथ ही परिवारों में जागरूकता और आर्थिक-सामाजिक सहायता भी बढ़ानी होगी।
मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में विशेष अभियान चलाने की जरूरत है। स्कूल छोड़ चुकी किशोरियों की पहचान, नियमित स्वास्थ्य जांच, आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका तथा पंचायत स्तर पर निगरानी को मजबूत किया जाना चाहिए।
बंगाल के सामने अब सवाल यह नहीं है कि आंकड़े कितने हैं। सवाल यह है कि इन आंकड़ों के पीछे छिपी हजारों बच्चियों का भविष्य कौन बचाएगा। सरकार यदि इस चुनौती को केवल कानून-व्यवस्था का विषय न मानकर बाल अधिकार और सामाजिक सुधार का अभियान बनाए, तभी इन भयावह आंकड़ों में वास्तविक बदलाव संभव होगा।
समाज के हर वर्ग को मिलकर इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठानी होगी, तभी हम 60 हजार बच्चियों का छिना बचपन लौटाने की दिशा में कदम बढ़ा पाएंगे। सरकार, नागरिक संगठन और मीडिया की साझा पहल ही इस संकट का स्थायी समाधान निकाल सकती है।

