लेखक: देवानंद सिंह
बैंकों का पैसा आखिर किसका है? बैंक का, उद्योगपति का या उस आम आदमी का, जो अपनी जिंदगी की कमाई बैंक में जमा करता है? यह सवाल आज फिर सामने है। सुभाष चंद्रा से जुड़े मामले में एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ द्वारा पहले के आदेश पर रोक लगाए जाने के बाद विवाद भले ही फिलहाल न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में हो, लेकिन इसने भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के उस पुराने और बेहद असहज सवाल को फिर जिंदा कर दिया है बड़े कर्जदारों और छोटे कर्जदारों के साथ व्यवस्था का व्यवहार एक जैसा क्यों नहीं होता?
करीब 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज की गारंटी और उसके सामने लगभग साढ़े छह करोड़ रुपये के भुगतान से मामला निपटाने की कोशिश की खबर ने स्वाभाविक रूप से लोगों को चौंकाया। बाद में पांच सदस्यीय पीठ ने उस कथित आदेश की वैधानिक स्थिति पर ही सवाल खड़ा करते हुए रोक लगा दी और संपत्तियों के हस्तांतरण पर भी पाबंदी लगाई। अब इस मामले में अंतिम रूप से क्या सही है और क्या गलत, यह न्यायिक प्रक्रिया तय करेगी। लेकिन जनता का सवाल न्यायालय के फैसले से अलग है।
अगर किसी बड़े कर्जदार से हजारों करोड़ की देनदारी के सामने बहुत छोटी रकम स्वीकार करने का प्रस्ताव सामने आता है, तो आखिर ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होती है?
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर ‘हेयरकट’ अपने आप में गलत नहीं है। 2016 में बने Insolvency and Bankruptcy Code का उद्देश्य ही यह था कि डूबती कंपनियों को समयबद्ध समाधान मिले, कारोबार बचा रहे और लेनदारों को जितना संभव हो उतना पैसा वापस मिले। कई मामलों में इस व्यवस्था ने उल्लेखनीय वसूली भी कराई है। एस्सार स्टील इसका उदाहरण है, जहां बड़ी देनदारी के मुकाबले उल्लेखनीय राशि वापस आई।
लेकिन समस्या वहां शुरू होती है जहां हेयरकट इतना बड़ा हो जाए कि सवाल उठने लगे वसूली की जा रही है या नुकसान को कानूनी भाषा में स्वीकार किया जा रहा है?
लैन्को थर्मल जैसे मामलों में हजारों करोड़ की देनदारी के सामने बेहद कम वसूली हुई। कुछ अन्य बड़े मामलों में भी 80, 90 प्रतिशत या उससे अधिक तक के हेयरकट देखने को मिले। हो सकता है कि व्यावसायिक और कानूनी परिस्थितियों में यही सबसे व्यावहारिक रास्ता रहा हो। लेकिन यदि ऐसा है तो उसका पूरा तर्क जनता के सामने होना चाहिए।
क्योंकि आखिरकार नुकसान बैंक का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसके पीछे आम जमाकर्ता खड़ा है।
यह भी उतना ही जरूरी है कि एनपीए और राइट-ऑफ के आंकड़ों को राजनीतिक चश्मे से न देखा जाए। बड़े पैमाने पर डूबे कर्जों की पहचान उस प्रक्रिया में हुई जो पिछली सरकारों के समय दिए गए कर्जों की वास्तविक स्थिति सामने आने के बाद तेज हुई। इसलिए हर राइट-ऑफ को मौजूदा सरकार द्वारा दिए गए कर्ज की माफी कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
पुरानी सरकारों की गलती बताकर नई सरकार अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकती।
अगर कर्ज पहले गलत तरीके से दिए गए थे, तो उनकी वसूली कौन करेगा? अगर हजारों करोड़ का कर्ज डूब गया, तो जिम्मेदार कौन है? अगर किसी कंपनी को कर्ज देने में बैंकिंग व्यवस्था ने जोखिम का सही आकलन नहीं किया, तो उस गलती की कीमत कौन चुकाएगा?और सबसे बड़ा सवाल कर्ज देने वालों की जवाबदेही कब तय होगी?
भारत में अक्सर बहस कर्ज लेने वाले पर होती है। होनी भी चाहिए। जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। लेकिन कर्ज देने वाले बैंक अधिकारियों, बोर्डों और संस्थागत निर्णय प्रक्रिया की जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है। आखिर हजारों करोड़ रुपये किसी व्यक्ति को एक दिन में नहीं दिए जाते। उसके पीछे पूरी बैंकिंग प्रक्रिया होती है।
फिर आम आदमी की स्थिति देखिए।
एक छोटा व्यापारी कुछ लाख रुपये का कर्ज लेता है। कारोबार में नुकसान हो गया, बीमारी आ गई, नौकरी चली गई या बाजार बैठ गया किश्त में थोड़ी देरी हुई नहीं कि फोन शुरू। फिर नोटिस। फिर रिकवरी एजेंट। कई बार घर-दुकान तक पहुंचकर दबाव। सामाजिक प्रतिष्ठा अलग दांव पर।
दूसरी ओर हजारों करोड़ के कॉरपोरेट कर्ज में वर्षों तक पुनर्गठन, समाधान योजना, कानूनी प्रक्रिया और हेयरकट की लंबी व्यवस्था।
क्यों?
क्या इसलिए कि बड़े कर्जदार के पीछे बड़ी कंपनी, बड़े वकील और बड़ी आर्थिक ताकत होती है?
क्या छोटे कर्जदार के पास आवाज नहीं है, इसलिए उसकी परेशानी व्यवस्था को दिखाई नहीं देती?
यही वह असमानता है जो लोगों के भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करती है।
कर्ज माफी और कर्ज का राइट-ऑफ भी अलग-अलग चीजें हैं। राइट-ऑफ का मतलब यह नहीं कि कर्जदार की देनदारी स्वतः समाप्त हो गई। बैंक वसूली की प्रक्रिया जारी रख सकते हैं। लेकिन जनता को यह जानने का अधिकार जरूर है कि राइट-ऑफ के बाद वास्तविक वसूली कितनी हुई।
दस हजार करोड़ का कर्ज था कितना वापस आया?
किससे वापस आया?
कितने समय में आया?
कितना नहीं आया और क्यों नहीं आया?
इन सवालों के जवाब आंकड़ों में नहीं, जवाबदेही में मिलने चाहिए।
यह बहस कांग्रेस बनाम भाजपा की भी नहीं होनी चाहिए। यूपीए सरकार के समय बड़े कॉरपोरेट कर्ज दिए गए, एनपीए बढ़े यह तथ्य है। लेकिन मोदी सरकार के दौरान भी बड़े पैमाने पर एनपीए की सफाई हुई और राइट-ऑफ हुए यह भी तथ्य है।
इसलिए जनता को यह बताने के बजाय कि गलती उनकी थी या उनकी, राजनीतिक दलों को यह बताना चाहिए कि आगे ऐसी गलती न हो, इसके लिए व्यवस्था में क्या बदला गया है।
IBC आया, यह अच्छी बात है। बैंकिंग व्यवस्था में सुधार हुए, यह भी अच्छी बात है। लेकिन कानून का होना पर्याप्त नहीं। कानून का निष्पक्ष और पारदर्शी इस्तेमाल उससे भी ज्यादा जरूरी है।
सुभाष चंद्रा मामले में न्यायिक प्रक्रिया
सुभाष चंद्रा मामले में अब न्यायिक प्रक्रिया अपना रास्ता तय करेगी। किसी व्यक्ति को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं। लेकिन किसी बड़े नाम के कारण सवाल पूछना भी बंद नहीं किया जा सकता।
22 हजार करोड़ के सामने साढ़े छह करोड़ का सवाल इसलिए बड़ा है क्योंकि यह केवल एक कारोबारी का मामला नहीं रह जाता। यह उस व्यवस्था का आईना बन जाता है जिसमें कर्ज जनता के पैसे से दिया जाता है, जोखिम बैंक उठाता है और अंततः नुकसान का बोझ भी उसी व्यवस्था पर आता है।
और इसी आईने में आम आदमी अपना चेहरा भी देखता है।
वह पूछता है
जब मैं बैंक का छोटा कर्ज नहीं चुका पाता तो मेरी इज्जत क्यों नीलाम होती है और जब कोई बड़ा कर्जदार हजारों करोड़ का बोझ लेकर खड़ा होता है तो समाधान के नाम पर करोड़ों-अरबों का ‘हेयरकट’ क्यों संभव हो जाता है?
बड़े उद्योग बचने चाहिए। कंपनियां बंद नहीं होनी चाहिए। रोजगार बचना चाहिए। आर्थिक गतिविधियां चलनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि कानून बड़े और छोटे के लिए अलग-अलग दरवाजे न बनाए।
बैंकिंग व्यवस्था का पहला धर्म वसूली है, दूसरा धर्म आर्थिक गतिविधियों को बचाना और तीसरा धर्म निष्पक्षता।
अगर इन तीनों में संतुलन बिगड़ गया तो समस्या सिर्फ किसी एक सुभाष चंद्रा की नहीं रहेगी।
समस्या यह होगी कि आम आदमी बैंक में अपना पैसा जमा तो करेगा, लेकिन उसके मन में यह सवाल हमेशा रहेगा क्या इस पैसे की कीमत भी उतनी ही है, जितनी किसी बड़े कर्जदार की पहुंच?
यही सवाल आज व्यवस्था के सामने खड़ा है।
और इसका जवाब सिर्फ एनसीएलटी के फैसले से नहीं, पूरी बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही से मिलेगा।

