“किताबें ज्ञान देती हैं, तकनीक जानकारी देती है,लेकिन जीवन जीने की कला एक शिक्षक ही सिखाते हैं।”
शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों को सम्मान देने का दिन नहीं, बल्कि शिक्षा के बदलते स्वरूप और शिक्षक की बदलती भूमिका पर विचार करने का अवसर भी है। आज हम ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ बच्चों की रचनात्मकता बढ़ रही है, तकनीक उनकी कल्पनाओं को नए पंख दे रही है, लेकिन दूसरी ओर नैतिक मूल्यों का क्षरण भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।आज का बच्चा पहले से अधिक जिज्ञासु है। उसके हाथ में मोबाइल है, सामने इंटरनेट है और उसकी उंगलियों पर दुनिया की जानकारी उपलब्ध है। AI यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता निश्चित रूप से रचनात्मकता के लिए एक सुनहरा अवसर है।
लेकिन प्रश्न यह है—क्या जानकारी ही शिक्षा है?यदि बच्चा यह जानता है कि किसी प्रश्न का उत्तर इंटरनेट या AI से कैसे प्राप्त करना है, लेकिन यह नहीं जानता कि उस ज्ञान का उपयोग कितना करना है।आज हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि मूल्यों की कमी है।बच्चे तेज हैं, लेकिन क्या वे धैर्यवान हैं?वे आत्मविश्वासी हैं, लेकिन क्या वे विनम्र हैं?वे प्रतिस्पर्धी हैं, लेकिन क्या वे सहयोग करना जानते हैं?वे अधिकारों की बात करते हैं, लेकिन क्या वे अपने कर्तव्यों को भी समझते हैं?
AI के दौर में शिक्षकों की भूमिका
ऐसी परिस्थिति में शिक्षक की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।AI कविता लिख सकता है, लेकिन कविता के पीछे छिपी संवेदना को जीना शिक्षक सिखाता है। AI इतिहास बता सकता है, लेकिन इतिहास से सीख लेकर चरित्र निर्माण करना शिक्षक सिखाता है।इसलिए AI शिक्षकों का सहयोगी हो सकता हैविकल्प नहीं।
तकनीक को अपनाने की आवश्यकता
यह सत्य है कि आने वाले समय में शिक्षा में AI की भूमिका लगातार बढ़ेगी। शिक्षकों को भी तकनीक से डरने की नहीं, बल्कि उसे समझने और सकारात्मक रूप से अपनाने की आवश्यकता है। एक अच्छा शिक्षक AI की सहायता से अपनी शिक्षण प्रक्रिया को अधिक रोचक, व्यक्तिगत और रचनात्मक बना सकता है।
मानवीय स्पर्श का महत्व
लेकिन शिक्षक की असली शक्ति किसी मशीन में नहीं, उसके मानवीय स्पर्श में है।एक शिक्षक बच्चे की आँखों में छिपी उदासी पढ़ सकता है।उसकी चुप्पी में छिपी परेशानी समझ सकता है।और उसकी असफलता में उसका हाथ पकड़कर कह सकता है— “कोशिश करते रहो, तुम कर सकते हो।”
आज आवश्यकता ऐसे विद्यालयों की है जहाँ AI और शिक्षक आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ खड़े हों। AI ज्ञान और संसाधनों को व्यापक बनाए तथा शिक्षक उस ज्ञान को विवेक, संस्कार, संवेदना और नैतिकता से जोड़ें।क्योंकि हमें केवल जानकार बच्चे नहीं, जिम्मेदार नागरिक चाहिए। हमें केवल प्रतिभाशाली विद्यार्थी नहीं चरित्रवान मनुष्य चाहिए।हमें केवल रचनात्मक दिमाग नहीं, संवेदनशील हृदय चाहिए। और इस निर्माण में शिक्षक की भूमिका सदैव केंद्रीय रहेगी।
“तकनीक हाथों को गति दे सकती है, ज्ञान मस्तिष्क को प्रकाश दे सकता है, लेकिन संस्कारों की रोशनी एक शिक्षक ही जला सकता है।”
शिक्षक दिवस पर हमें शिक्षकों को केवल माला पहनाकर या सम्मान-पत्र देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं समझनी चाहिए। हमें यह भी सोचना होगा कि हम अपने शिक्षकों को ऐसा वातावरण दें जहाँ वे केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी न होकर राष्ट्र के भावी नागरिकों के निर्माता बन सकें।समय बदलेगा, तकनीक बदलेगी, AI और अधिक शक्तिशाली होगा। शायद आने वाले समय में मशीनें आज की कल्पना से भी अधिक काम करने लगेंगी।लेकिन बच्चे को मनुष्य बनाने का काम—मनुष्य ही करेगा। कबीरदास जी की पंक्तियां सदैव प्रासंगिक ही रहेंगी– गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपनो गोविंद दियो बताय।। डॉ अनिता शर्मा शिक्षाविद,साहित्यकार
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