डिजिटल युग में शिक्षकों की अनिवार्यता पर एक दृष्टि
यह एक प्रश्न अक्सर मेरे मन में कौंध जाता है कि क्या इस डिजिटल युग में भी शिक्षकों की अनिवार्यता बनी हुई है ?
कुछ वर्ष पहले जब मैं एक प्राइवेट विद्यालय में पढ़ाया करती थी और हमारे जीवन में स्मार्टफोन, व्हाट्सएप और फेसबुक का नया-नया आगमन हुआ था तो मैंने कई लोगों को बोलते हुए सुना कि अब समाज में शिक्षकों की आवश्यकता घट जाएगी। ज्ञान का अथाह सागर अब सोशल नेटवर्क पर है। मुझे आज भी याद है उस समय बच्चों की पुस्तकों के साथ साथ बुक पब्लिशर्स सीडी भी दिया करते थे ताकि स्टूडेंट किसी पाठ को समझना चाहे तो सी डी के सहारे भी ऑडियो विजुअल देखकर चैप्टर को समझ सकें। आज इस बात को गुजरे लगभग 10 वर्ष हो चुके हैं। पर आज भी शिक्षकों की आवश्यकता बनी हुई है और मैं तो यह कहूंगी कि पहले से भी अधिक आवश्यक है आज शिक्षकों का समाज में होना ।
गूगल बनाम गुरु: ज्ञान और अनुभूति का अंतर
यह सच है कि आज ज्ञान मुट्ठी में बंद है, मोबाइल में समाया है। गूगल हर सवाल का जवाब एक सेकंड में देता है, चैट जीपीटी निबंध लिख देता है, पीपीटी बना देता है तो शिक्षक की जरूरत कितनी रही है ? यह सवाल है तो बहुत समसामयिक पर इसका उत्तर सनातन है ।
“गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिले ना मोक्ष”
हम यह मान भी लें कि गूगल ने ज्ञान के अहंकार को तोड़ा है पर शिक्षक को हम एकमात्र ज्ञान का सूत्र नहीं कह सकते। जब भी हम शिक्षा के साथ – साथ संस्कार और संवेदना की बात करेंगे तो वहां विद्यार्थियों के लिए शिक्षकों की अनिवार्यता को स्वीकार किया ही जाएगा। आज के विद्यार्थी रटते नहीं हैं ,वह तुरंत तथ्य और सत्य की जांच करते हैं। सोशल नेटवर्क सूचनाओं का अथाह भंडार तो है पर सूचनाओं में सत्य और असत्य की पहचान करने की परिपक्वता विद्यार्थियों में नहीं होती और यहीं शिक्षकों की भूमिका सशक्त रूप में सामने आती है ।
आज विद्यार्थी सोशल नेटवर्क के माध्यम से बहुत सारी अपडेटेड जानकारी रखते हैं और यह हम शिक्षकों के लिए एक अवसर ही है। पर इस आधार पर हम शिक्षक समुदाय गूगल को अपना प्रतिद्वंद्वी ना समझें । सर्च इंजन के पास सूचनाएं हो सकती हैं पर हम शिक्षकों के पास अनुभूति है।
गूगल बताता है चंद्रशेखर आजाद ने इस राष्ट्र के लिए क्या किया ,उनकी जीवनी क्या थी, पर आजाद जी की जीवनी को पढ़ाते वक्त जो गुरु की आंखों में नमी आती है वह गूगल कभी नहीं ला सकता। ज्ञान सिर्फ हमारे मस्तिष्क के तरंगों को स्पर्श करता है पर शिक्षक उस ज्ञान के साथ-साथ उससे जुड़ी अनुभूतियों को भी विद्यार्थियों की आत्मा में प्रवेश कराता है । गूगल हमें उत्तर देता है पर उस उत्तर के लिए जिस तरह के प्रश्न पूछने की आवश्यकता है वह हमें शिक्षकों के मार्गदर्शन से ही मिल पाता है।
हम गूगल के माध्यम से परीक्षा में पास कर सकते हैं पर जीवन की परीक्षा के लिए जो चरित्र और मानवीय मूल्य हमें चाहिए उसका कोई डाउनलोड लिंक नहीं है गूगल के पास। उसके लिए तो एक मात्र माध्यम शिक्षकों का सानिध्य और मार्गदर्शन है ।
शिक्षकों की अनिवार्यता: संस्कार और जीवन दृष्टि के स्रोत
गूगल के पास हम सबों के लिए एक जैसा जवाब रहता है पर गुरु को मालूम है कि वह हर शिष्य के लिए किस तरह की गति, रुचि और बुद्धि का प्रयोग करे । यह जो व्यक्तिगत स्पर्श हमें शिक्षकों के द्वारा मिलता है सच पूछिए तो यह स्नेहिल भाव ही शिक्षा का आधारभूत अंग है।
तभी तो लोग कहते हैं कि गूगल से आप ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं ,सूचनाओं को ले सकते हैं पर संस्कार देने का कार्य आज भी शिक्षकों के ही पास है।
एक समय था जब कक्षाओं में शिक्षक के बोले हुए ज्ञान को विद्यार्थी ब्रह्म वाक्य मानकर नोट करता था रट लेता था पर आज विद्यार्थी के हाथ में गूगल सर्च इंजन नामक एक जादूई यंत्र है जो उसके हर सवाल का जवाब देता है, पर उस जवाब को समझाने की जो क्षमता है या कौशल है वह शिक्षक ही कर पाता है ।
गूगल के पास सूचनाएं हैं समझ नहीं। गूगल हमें बताता है कि द्वितीय विश्व युद्ध कब हुआ पर वह यह नहीं बता सकता कि उस लड़ाई से मानव समुदाय को क्या सीखना चाहिए ?
ज्ञान को विवेक में बदलने का काम आज भी शिक्षक करता है गूगल नहीं और एक यह बात भी है कि गूगल तो तभी आपको बतायेगा जब आप उससे कुछ पूछेंगे पर पूछने की जो ललक है जो जिज्ञासा है , जानने की भूख है वह आज भी हमारे अंदर शिक्षकों के द्वारा ही उत्पन्न होता है ।
गूगल डेटा संग्रह है पर शिक्षक के पास जीवन दृष्टि है । जीवन में, व्यवहार में नैतिकता, मानवीय मूल्य, पारिवारिक संस्कार ,जीवन के अंधेरे और उतार-चढ़ाव में भी खुद को संभाल लेना, सफलता में भी विनम्र बने रहना ये सारे गुण भला कोई सर्च इंजन कैसे सीखा सकता है। यह तो आज भी शिक्षकों को ही करना होगा। इसलिए आज के शिक्षक गूगल को अपना प्रतिद्वंद्वी नहीं मानते बल्कि अपना सहयोगी मानते हैं।
जो शिक्षक विद्यार्थियों की चेतना में ज्ञान की पिपासा और जिज्ञासा की शक्ति जगाएगा उसे भला यह गूगल कैसे हरा पायेगा। तभी तो तकनीक के इस दौर में भी गुरु की प्रासंगिकता बनी हुई है बल्कि और अधिक बढ़ गई है ।आज जब चारों ओर सूचनाओं का विशाल कचरा बिखरा पड़ा है तो उस कचरे में से मोती चुनना जो हमें सिखाते हैं वह शिक्षक ही तो हैं।
गूगल विद्यार्थियों को दुनिया भर की जानकारी दे सकता है पर शिक्षक की आंखों में विद्यार्थियों के भविष्य को लेकर जो चिंता झलकती है , यही चिंता शिक्षकों को आज भी गूगल से महान बनाती है।
अधिक जानकारी के लिए यूनेस्को शिक्षा पहल देखें।
लेखक: डॉ कल्याणी कबीर
डॉ कल्याणी कबीर
प्रिंसिपल
रंभा कॉलेज, गीतिलता
जमशेदपुर

