जियाडा ने 2006 में आवंटित किया था 30 हजार वर्गफुट भूखंड, 10 जनवरी को दखल दिलाने पहुंची टीम को 40-50 लोगों ने रोका; उद्यमी ने मुख्यमंत्री समेत अधिकारियों से लगाई गुहार
राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर, 4 सितंबर। आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र के थर्ड फेज में मेसर्स टाटानगर इंटरप्राइजेज प्रा. लि. को वर्ष 2006 में आवंटित करीब 30 हजार वर्गफुट भूखंड पर दो दशक बाद भी दखल-कब्जा नहीं मिल सका है। जियाडा के क्षेत्रीय उपनिदेशक कार्यालय की जानकारी के अनुसार बी-50 पी एवं बी-51 पी (पी) नंबर का यह भूखंड कंपनी को 17 जून 2006 को आवंटित किया गया था।
एसडीओ के आदेश के बाद भी नहीं मिला कब्जा
मामले में 9 जनवरी 2026 को सरायकेला के अनुमंडल पदाधिकारी ने प्रखंड सहकारिता पदाधिकारी, गम्हरिया सुनील कुमार चौधरी को दंडाधिकारी प्रतिनियुक्त करते हुए भूखंड का दखल दिलाने का आदेश दिया था। आरआईटी थाना को विधि-व्यवस्था बनाए रखने तथा पर्याप्त पुलिस बल की व्यवस्था करने का निर्देश भी दिया गया था।
निर्देश के अनुपालन में 10 जनवरी को प्रशासनिक टीम आरआईटी थाना प्रभारी के साथ मौके पर पहुंची, लेकिन कार्रवाई पूरी नहीं हो सकी। बताया गया कि मौके पर करीब 40-50 पुरुष एवं महिलाएं पहुंच गए और दखल की कार्रवाई बाधित कर दी। इसके बाद मामला फिर लंबित हो गया।
मुख्यमंत्री से लेकर अधिकारियों तक लगाई गुहार
दखल नहीं मिलने से परेशान कंपनी ने 12 जुलाई 2026 को मुख्यमंत्री, उपायुक्त, अनुमंडल पदाधिकारी सहित अन्य अधिकारियों को ज्ञापन सौंपकर पुनः प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग की है। कंपनी ने कहा है कि दखल दिलाने की कार्रवाई के लिए यदि कोई सरकारी शुल्क निर्धारित है तो वह उसका भुगतान करने को तैयार है। साथ ही पर्याप्त सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती कर भूखंड पर दखल दिलाने की मांग की गई है।
प्रभावशाली कारोबारी के कथित हस्तक्षेप की चर्चा
मामले को लेकर औद्योगिक क्षेत्र में एक प्रभावशाली सफेदपोश कारोबारी के कथित हस्तक्षेप की चर्चा भी है। आरोप है कि उक्त कारोबारी किसी न किसी रूप में भूखंड पर अपना प्रभाव या कब्जा बनाए रखना चाहता है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित कारोबारी का पक्ष भी सामने आना बाकी है।
उद्योग संगठनों की भूमिका पर भी सवाल
मामले ने आदित्यपुर के प्रमुख औद्योगिक संगठनों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। उद्यमी हितों की पैरवी करने वाले संगठनों की ओर से इस मामले में अपेक्षित हस्तक्षेप क्यों नहीं हुआ, इसे लेकर औद्योगिक हलकों में चर्चा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 2006 के वैध आवंटन, प्रशासनिक आदेश और पुलिस बल की तैनाती के निर्देश के बावजूद एक उद्यमी को 20 वर्षों से अपने आवंटित भूखंड पर दखल क्यों नहीं मिल पाया? क्या किसी प्रभावशाली व्यक्ति का दबाव प्रशासनिक कार्रवाई पर भारी पड़ रहा है, या फिर कोई अन्य कानूनी अथवा प्रशासनिक पेच है?
इन सवालों का जवाब अब प्रशासनिक कार्रवाई और निष्पक्ष जांच से ही सामने आएगा।

