लेखक: देवानंद सिंह
भारतीय लोकतंत्र में महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी राजनीति के बदलते चरित्र की सबसे महत्वपूर्ण तस्वीरों में से एक है। उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ चुनावों के आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं अब केवल मतदान करने वाली संख्या नहीं हैं, बल्कि सत्ता का संतुलन तय करने वाली निर्णायक शक्ति बन चुकी हैं। 2012 में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से आगे निकलना और 2017 व 2022 में भी उनका मतदान पुरुषों से अधिक रहना इस बदलाव की गंभीरता को रेखांकित करता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी महिला मतदान 57.22 प्रतिशत रहा, जबकि पुरुषों का 56.46 प्रतिशत।
महिला मतदाताओं की बढ़ती भागीदारी
यह बदलाव राजनीतिक दलों के लिए स्पष्ट संदेश है। महिला मतदाता को अब पारंपरिक अर्थों में किसी दल का ‘वोट बैंक’ मानना आसान नहीं होगा। वह सरकार की योजनाओं का लाभ भी देख रही है और अपने घर-परिवार, रोजगार, महंगाई, सुरक्षा, शिक्षा तथा स्वास्थ्य से जुड़े सवालों पर भी निर्णय ले रही है। यही कारण है कि चुनाव नजदीक आते ही महिलाओं के खातों में सीधे आर्थिक सहायता पहुंचाने से लेकर मुफ्त या रियायती सुविधाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व तक के वादों की होड़ तेज हो जाती है।
कल्याणकारी योजनाओं का असर
मध्य प्रदेश की ‘लाड़ली बहना’ और महाराष्ट्र की ‘लाडकी बहिन’ जैसी योजनाओं ने यह साबित किया है कि महिला-केंद्रित कल्याणकारी योजनाएं चुनावी राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं। उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक दल इसी दिशा में अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या महिलाओं को केवल आर्थिक सहायता के वादों से हमेशा प्रभावित किया जा सकता है? इसका जवाब इतना सरल नहीं है।
सत्ता पक्ष की जवाबदेही
सत्ता पक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने काम का हिसाब देने की है। सत्ता में रहने वाला दल केवल नई योजनाओं की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकता। उसे बताना होगा कि पहले से चल रही योजनाओं का लाभ कितनी महिलाओं तक पहुंचा, कितनी महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुईं और महिलाओं की सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा तथा स्वास्थ्य की स्थिति में कितना वास्तविक सुधार हुआ। चुनाव के समय खाते में पैसा भेजना आसान राजनीतिक संदेश हो सकता है, लेकिन महिलाओं को स्थायी रूप से सशक्त बनाने के लिए रोजगार, कौशल, उद्यमिता और सुरक्षित वातावरण की जरूरत होती है।
विपक्ष की भूमिका
विपक्ष यदि केवल सत्ता पक्ष की योजनाओं को ‘मुफ्त की राजनीति’ कहकर खारिज करता रहा, तो वह महिला मतदाताओं की वास्तविक अपेक्षाओं को समझने में विफल रहेगा। उसे सरकार की कमियों को उजागर करने के साथ यह भी बताना होगा कि वह सत्ता में आएगा तो महिलाओं के लिए कौन-सी बेहतर, टिकाऊ और प्रभावी नीतियां लागू करेगा। केवल अधिक पैसे देने का वादा स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा नहीं है। जनता को यह भी जानना चाहिए कि उस वादे के लिए संसाधन कहां से आएंगे और उसका दीर्घकालिक परिणाम क्या होगा।
विविध प्राथमिकताएं
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं को एकजुट वोट बैंक समझना राजनीतिक भ्रम होगा। जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र और सामाजिक परिस्थितियों के आधार पर महिलाओं की प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं। किसी के लिए महंगाई बड़ा मुद्दा है तो किसी के लिए रोजगार, किसी के लिए कानून-व्यवस्था और किसी के लिए बच्चों की शिक्षा। इसलिए 2027 का चुनाव महिलाओं के बीच किसी एक दल के पक्ष में स्वतः ध्रुवीकरण का चुनाव नहीं होगा।
लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत
महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या भारतीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है। इससे राजनीतिक दलों पर बेहतर शासन और जवाबदेही का दबाव बढ़ता है। अब जरूरत इस बात की है कि महिलाओं को चुनावी घोषणाओं की लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास और नीति निर्माण की बराबर की भागीदार माना जाए।
महिलाएं अब सत्ता की सीढ़ी नहीं, सत्ता के फैसले की ताकत हैं। राजनीतिक दल जितनी जल्दी इस बदलाव को समझेंगे, लोकतंत्र उतना ही अधिक जवाबदेह और जनकेंद्रित होगा।

