राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों गुरु सुशांत कुमार महापात्र सम्मानित, छऊ के पारंपरिक मुखौटा शिल्प को मिली राष्ट्रीय पहचान
मृत्युंजय बर्मन
राष्ट्र संवाद संवाददाता, सरायकेला
सरायकेला की धरती पर आकार लेने वाले छऊ के रंगीन मुखौटे ने गुरुवार को दिल्ली के विज्ञान भवन में अपनी अलग पहचान दर्ज कराई। पारंपरिक मुखौटा शिल्प के साधक गुरु सुशांत कुमार महापात्र को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया। राष्ट्रपति के हाथों सम्मान ग्रहण करने का क्षण सरायकेला की कला-संस्कृति के लिए गौरवपूर्ण बन गया।
सुशांत महापात्र का जीवन छऊ के मुखौटों को समर्पित रहा है। पारिवारिक परंपरा से मिली इस कला को उन्होंने बचपन से साधना शुरू किया। महज आठ वर्ष की उम्र में मुखौटा निर्माण की बारीकियां सीखने वाले सुशांत ने आगे चलकर इस कला को देश-विदेश तक पहुंचाया।
सरायकेला छऊ में मुखौटा केवल चेहरे को ढकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि चरित्र की आत्मा को मंच पर उभारने वाला माध्यम है। आंखों की बनावट, चेहरे की आकृति, रंगों का संयोजन और अलंकरण, हर रेखा एक भाव और चरित्र को व्यक्त करती है। सुशांत महापात्र ने इसी परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
उनके बनाए मुखौटों की पहचान देश से बाहर भी पहुंची। प्रदर्शनियों और कार्यशालाओं के माध्यम से उन्होंने सरायकेला की इस विशिष्ट कला को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया।
विज्ञान भवन में जब राष्ट्रपति के हाथों उन्होंने पुरस्कार ग्रहण किया, तो वह सिर्फ एक कलाकार का सम्मान नहीं था। वह उन अनगिनत हाथों का सम्मान था, जो मिट्टी, कागज, रंग और कल्पना से सरायकेला की सांस्कृतिक पहचान को चेहरा देते रहे हैं।

