नई दिल्ली. केरल का आधिकारिक नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की दिशा में संसद की प्रक्रिया बुधवार को पूरी हो गई. राज्यसभा ने बुधवार को केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 को ध्वनिमत से पारित कर दिया. इससे पहले मंगलवार को लोकसभा ने भी इस विधेयक को बिना चर्चा के मंजूरी दे दी थी. विधेयक के पारित होने के साथ ही संविधान की पहली अनुसूची में दर्ज राज्य के नाम को ‘केरल’ से बदलकर ‘केरलम’ करने का रास्ता साफ हो गया है. हालांकि संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे की औपचारिकताओं के बाद ही नाम परिवर्तन प्रभावी होगा.
राज्यसभा में विधेयक पेश करते हुए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि राज्य का नाम केवल किसी भौगोलिक क्षेत्र की पहचान बदलने तक सीमित विषय नहीं है. उन्होंने कहा कि मलयालम भाषा में ‘केरलम’ शब्द राज्य की संस्कृति, सभ्यता और लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है. उनके मुताबिक केरल को ‘केरलम’ नाम देना राज्य के लोगों के साथ-साथ सभी भारतीयों के लिए गर्व, सम्मान और आत्मसम्मान का विषय है.
केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026 का मुख्य उद्देश्य संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन करना है. संविधान की पहली अनुसूची में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के नाम दर्ज हैं. विधेयक के कानून बनने के बाद संबंधित संवैधानिक प्रावधानों में केरल की जगह ‘केरलम’ नाम दर्ज किया जाएगा. इस बदलाव के बाद केंद्र और राज्य सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों, संवैधानिक संदर्भों और अन्य सरकारी प्रक्रियाओं में नए नाम के इस्तेमाल का रास्ता तैयार होगा.
राज्य का नाम बदलने की मांग अचानक सामने नहीं आई है. इसके पीछे केरल विधानसभा का 2024 में पारित वह प्रस्ताव महत्वपूर्ण आधार रहा, जिसमें केंद्र सरकार से राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के लिए आवश्यक संवैधानिक कदम उठाने का अनुरोध किया गया था. विधानसभा ने अपने प्रस्ताव में मलयालम भाषी लोगों के लिए एकीकृत केरल के गठन की ऐतिहासिक मांग का भी उल्लेख किया था. प्रस्ताव में कहा गया था कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही मलयालम भाषी लोगों के लिए एक संयुक्त केरल के गठन की मजबूत मांग रही है.
केरल विधानसभा ने सर्वसम्मति से केंद्र सरकार से संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य के नाम में आवश्यक बदलाव के लिए तत्काल कदम उठाने की अपील की थी. इसी राजनीतिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने नाम परिवर्तन से संबंधित विधेयक संसद में लाया. अब दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के बाद राज्य का नाम ‘केरलम’ किए जाने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण चरण में पहुंच गई है.
राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी सांसदों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी और उनके द्वारा विधेयक पेश किए जाने की मांग भी उठाई. विपक्ष का तर्क था कि कार्यसूची में गृह मंत्री का नाम होने के कारण उन्हें स्वयं विधेयक को सदन में आगे बढ़ाना चाहिए. हालांकि सरकार ने इस मांग को स्वीकार नहीं किया और केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को आगे बढ़ाया.
वरिष्ठ भाजपा नेता जेपी नड्डा ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि नित्यानंद राय सदन में मौजूद हैं और उनके द्वारा विधेयक को आगे बढ़ाना संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रिया के अनुरूप है. इस दौरान विपक्ष की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से अन्य मुद्दों पर भी जवाब देने की मांग की गई. विपक्षी सांसद जुलाई में जंतर-मंतर पर छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर भी गृह मंत्री के बयान की मांग कर रहे हैं.
राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान पीठासीन अधिकारी सस्मित पात्रा ने सांसदों से विधेयक के सामान्य सिद्धांतों तक अपनी बात सीमित रखने की अपील की. उन्होंने सदस्यों को संसदीय नियमों का हवाला देते हुए कहा कि बहस के दौरान अप्रासंगिक मुद्दों और बार-बार दोहराए जा रहे तर्कों से बचना चाहिए. उन्होंने नियम 110, 124 और 240 का उल्लेख करते हुए सदस्यों से सदन की कार्यवाही को निर्धारित नियमों के अनुरूप चलाने का आग्रह किया.
नाम परिवर्तन के समर्थकों का कहना है कि ‘केरलम’ राज्य की स्थानीय भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के अधिक करीब है. मलयालम भाषा में राज्य का प्रचलित नाम ‘केरलम’ ही है और लंबे समय से स्थानीय स्तर पर इसी नाम के इस्तेमाल की मांग होती रही है. समर्थकों के अनुसार संवैधानिक दस्तावेजों में भी यही नाम दर्ज होने से राज्य की भाषाई पहचान को औपचारिक मान्यता मिलेगी.
विधेयक के पारित होने के बाद अब प्रशासनिक स्तर पर भी कई बदलावों की आवश्यकता होगी. राज्य और केंद्र सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड, विभागीय दस्तावेज, वेबसाइट, अधिसूचनाएं, संचार सामग्री और विभिन्न संस्थागत रिकॉर्ड में राज्य के नए नाम को लागू करने के लिए आवश्यक प्रक्रिया अपनानी होगी. हालांकि इन बदलावों का क्रियान्वयन संबंधित संवैधानिक और प्रशासनिक औपचारिकताओं के पूरा होने के बाद किया जाएगा.
केरल का नाम बदलने का मुद्दा राज्य की भाषाई पहचान और राजनीतिक इतिहास से भी जुड़ा हुआ है. राज्य का गठन मुख्य रूप से मलयालम भाषी क्षेत्रों को एक साथ लाने की प्रक्रिया के तहत हुआ था. इसलिए ‘केरलम’ नाम को लेकर समर्थकों का मानना है कि यह राज्य की स्थानीय भाषा और सांस्कृतिक विरासत को अधिक स्पष्ट रूप से दर्शाता है.
संसद के दोनों सदनों से विधेयक को मंजूरी मिलना इस प्रक्रिया में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. लोकसभा ने मंगलवार को इसे बिना चर्चा के पारित किया था, जबकि राज्यसभा में बुधवार को ध्वनिमत से विधेयक पारित हुआ. सदन में उस समय हंगामे के बीच विधेयक को मंजूरी दी गई. इसके साथ ही केंद्र सरकार की ओर से राज्य का संवैधानिक नाम बदलने की पहल को संसदीय समर्थन मिल गया है.
अब ‘केरल’ से ‘केरलम’ नाम परिवर्तन केवल भाषाई बदलाव नहीं रहेगा, बल्कि यह संविधान की पहली अनुसूची में भी दर्ज होने वाला परिवर्तन होगा. नाम बदलने के बाद राज्य की पहचान से जुड़े आधिकारिक संदर्भों में ‘केरलम’ का इस्तेमाल किया जाएगा. हालांकि आम बोलचाल और पुराने दस्तावेजों में ‘केरल’ नाम का इस्तेमाल लंबे समय तक दिखाई दे सकता है.
राज्य के नाम में बदलाव को लेकर संसद में हुई प्रक्रिया ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि भारत में किसी राज्य का नाम बदलना केवल राजनीतिक घोषणा का विषय नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा कदम है. केरल विधानसभा के प्रस्ताव से शुरू हुई यह प्रक्रिया अब संसद के दोनों सदनों की मंजूरी तक पहुंच चुकी है. ‘केरलम’ नाम को संवैधानिक पहचान मिलने के साथ राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक स्वरूप देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है.

