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    Home » JPSC-JSSC भर्ती परीक्षा विवाद: लाठी, आंसू गैस और बैरिकेड से नहीं थमेगा युवाओं का आक्रोश
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    JPSC-JSSC भर्ती परीक्षा विवाद: लाठी, आंसू गैस और बैरिकेड से नहीं थमेगा युवाओं का आक्रोश

    Devanand SinghBy Devanand SinghAugust 10, 2026No Comments7 Mins Read
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    JPSC-JSSC
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    लेखक: देवानंद सिंह

    झारखंड में JPSC-JSSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर युवाओं का आक्रोश सोमवार को विधानसभा की चौखट तक पहुंच गया। बैरिकेडिंग टूटी, पुलिस ने लाठीचार्ज किया, वाटर कैनन और आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ। कुछ छात्र और पुलिसकर्मी घायल हुए। विधानसभा के आसपास का इलाका कुछ समय के लिए टकराव का मैदान बन गया। सवाल यह नहीं है कि बैरिकेड किसने तोड़ा और लाठी किसने चलाई। बड़ा सवाल यह है कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिन्होंने राज्य के पढ़े-लिखे युवाओं को अपनी मांगों के लिए सड़क पर उतरने और विधानसभा घेराव की स्थिति तक पहुंचा दिया?

    JPSC-JSSC भर्ती परीक्षाओं पर उठते सवाल

    सरकार और प्रशासन का अपना पक्ष है। ग्रामीण एसपी के अनुसार प्रदर्शनकारियों ने अंतिम बैरिकेडिंग तक पहुंचने की कोशिश की, जहां धारा 163 लागू थी। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीमित बल का इस्तेमाल किया गया और छात्रों से बातचीत भी की जा रही थी। यदि प्रदर्शनकारी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे तो उन्हें रोकना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लोकतंत्र का अर्थ कानून से ऊपर होना नहीं है। आंदोलनकारियों को भी यह समझना होगा कि बैरिकेड तोड़ना और पुलिस पर जूते-चप्पल या बोतलें फेंकना किसी भी लोकतांत्रिक आंदोलन की मर्यादा नहीं हो सकती।

    लेकिन सरकार को भी यह सवाल खुद से पूछना होगा कि युवाओं की शिकायतें आखिर इतनी गंभीर क्यों हो गईं कि संवाद की जगह टकराव की नौबत आ गई? प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर यदि लंबे समय से सवाल उठ रहे हैं, तो केवल पुलिस बल के जरिए उन सवालों को दबाया नहीं जा सकता। युवाओं के हाथ में किताब होनी चाहिए, आंदोलन का झंडा नहीं और इसकी जिम्मेदारी केवल युवाओं की नहीं, व्यवस्था की भी है।

    युवाओं का आक्रोश और विश्वास का संकट

    सोमवार को जो तस्वीरें सामने आईं, उन्होंने सरकार के सामने एक असहज सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। आंदोलन को न कांटेदार तार रोक पाए, न पानी की बौछार और न ही लाठीचार्ज। विधानसभा की कार्रवाई स्थगित होने के बाद भी छात्र परिसर के बाहर डटे रहे। छात्र नेताओं का कहना है कि सरकार के साथ तीन दौर की बातचीत हो चुकी है और अब केवल बातचीत नहीं, ठोस निर्णय चाहिए। दूसरी ओर सरकार ने प्रदर्शनकारियों से घर लौटने की अपील की है।

    यानी टकराव अब केवल सड़क पर नहीं, विश्वास के स्तर पर भी है।

    सरकार ने विधानसभा परिसर तक पहुंचने से रोकने के लिए बैरिकेडिंग, कांटेदार तार, वाटर कैनन और पुलिस बल का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शनकारी कई स्तरों की सुरक्षा व्यवस्था पार करते हुए विधानसभा के काफी करीब पहुंच गए। यह प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था का सवाल है, लेकिन उससे बड़ा सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। क्या सरकार इस आक्रोश की जड़ तक जाएगी या फिर इसे केवल एक दिन के प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था की घटना मानकर आगे बढ़ जाएगी?

    इन घटनाओं के बीच एक बात यह भी सामने आई कि पुलिस बल प्रयोग के दौरान छात्रों को गंभीर चोट न पहुंचे, इसका प्रयास किया गया। वाटर कैनन और बल प्रयोग को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखने की बात प्रशासन की ओर से कही गई है। यदि ऐसा है तो यह सकारात्मक पहल है। लेकिन लोकतंत्र में सबसे बेहतर स्थिति वह होगी, जब पुलिस को बल प्रयोग करने की नौबत ही न आए।

    जांच और जवाबदेही की मांग

    JPSC के पूर्व अध्यक्ष एक खियांग्ते की सीआईडी द्वारा गिरफ्तारी ने मामले को और गंभीर बना दिया है। यदि जांच एजेंसी के पास पर्याप्त आधार और साक्ष्य हैं तो कानून अपना काम करे। लेकिन गिरफ्तारी के साथ ही यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध हो। भर्ती परीक्षाओं से जुड़े किसी भी मामले में कार्रवाई केवल सुर्खियां बनाने के लिए नहीं, बल्कि सच्चाई सामने लाने के लिए होनी चाहिए। छात्रों की मुख्य मांगों में अब मामले की सीबीआई जांच भी शामिल हो गई है। सरकार को इस मांग पर भी तथ्यों और कानून के आधार पर स्पष्ट रुख सामने रखना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए JPSC आधिकारिक वेबसाइट देखें।

    आंदोलन की दिशा और राजनीतिक विमर्श

    दूसरी ओर आंदोलन के नेताओं को भी अपने आंदोलन की दिशा पर आत्ममंथन करना होगा। सरकार पर दबाव बनाना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हिंसक या उग्र व्यवहार उस नैतिक आधार को कमजोर करता है जिस पर आंदोलन खड़ा है। पुलिस पर वस्तुएं फेंकना, बैरिकेड तोड़ना या कानून-व्यवस्था को चुनौती देना किसी भी कीमत पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। यदि मांगें जायज हैं तो उन्हें मजबूत करने का रास्ता अनुशासन और तथ्यों से होकर जाता है, अराजकता से नहीं।

    इस पूरे घटनाक्रम का एक राजनीतिक पक्ष भी है। भाजपा नेताओं और विपक्षी विधायकों का मुख्यमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन तथा हिरासत में लिया जाना बताता है कि छात्र आंदोलन अब राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ चुका है। विपक्ष को सरकार को घेरने का अधिकार है, लेकिन छात्रों का भविष्य राजनीतिक दलों के शक्ति प्रदर्शन का मंच नहीं बनना चाहिए। सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि छात्रों की वास्तविक समस्याएं राजनीतिक शोर में दब न जाएं।

    संवाद की गुंजाइश और समाधान का रास्ता

    इसके बावजूद सोमवार के आंदोलन की तस्वीरों में एक अलग संदेश भी दिखाई दिया। कई छात्रों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को उनके जन्मदिन पर बधाई दी। प्रदर्शन के बीच अनेक छात्रों के हाथों में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की तस्वीरें भी दिखाई दीं। यह संकेत महत्वपूर्ण है। विरोध के बावजूद आंदोलनकारियों के भीतर राजनीतिक संवाद की गुंजाइश अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सरकार चाहे तो इसी गुंजाइश को संवाद की शुरुआत का आधार बना सकती है।

    झारखंड में बेरोजगारी और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता बेहद संवेदनशील विषय हैं। एक युवा वर्षों तक तैयारी करता है, परिवार अपनी क्षमता के अनुसार पैसा खर्च करता है और परीक्षा को भविष्य की उम्मीद मानता है। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल उठना केवल प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के भरोसे पर चोट है।

    अब सरकार के सामने रास्ता साफ है। पहला बल प्रयोग को अंतिम विकल्प बनाया जाए। दूसरा छात्र प्रतिनिधियों से खुले और सार्थक संवाद की शुरुआत हो। तीसरा JPSC-JSSC से जुड़ी शिकायतों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो। चौथा जहां अनियमितता सिद्ध हो, वहां जिम्मेदारी तय हो। पांचवां भर्ती परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया को इतना पारदर्शी बनाया जाए कि भविष्य में छात्रों को सड़क पर उतरने की जरूरत ही न पड़े।

    और सबसे महत्वपूर्ण सरकार को छात्रों की मांगों पर सिर्फ बातचीत नहीं, निर्णय देना होगा। यदि तीन दौर की बातचीत के बाद भी छात्र यह कह रहे हैं कि अब बातचीत नहीं, समाधान चाहिए, तो यह सरकार के लिए गंभीर संकेत है।

    सोमवार की घटना को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानना आसान होगा, लेकिन यह उससे कहीं बड़ा संकेत है। क्रांति के शोले भड़क चुके हैं उन्हें पानी की बौछार, कांटेदार तार या लाठी से लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। इन शोले को शांत करने का रास्ता केवल संवाद, पारदर्शिता और न्याय से होकर जाता है।

    लाठी से भीड़ को पीछे किया जा सकता है, युवाओं के सवालों को नहीं। दूसरी तरफ आक्रोश के नाम पर कानून तोड़कर कोई आंदोलन अपनी विश्वसनीयता कायम नहीं रख सकता। सरकार को ताकत दिखाने के बजाय भरोसा दिखाना होगा और छात्रों को आक्रोश के बजाय अनुशासन।

    क्योंकि यह लड़ाई सरकार बनाम छात्र की नहीं, बल्कि व्यवस्था में भरोसा बनाम अविश्वास की है। सोमवार को असली परीक्षा छात्रों की नहीं, सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति की हुई है। अब देखना यह है कि सरकार इस आक्रोश को दबाने का रास्ता चुनती है या उसके कारणों को समझकर समाधान का रास्ता।

    क्योंकि झारखंड के युवा सिर्फ नौकरी नहीं मांग रहे वे अपनी मेहनत, अपने भविष्य और व्यवस्था पर अपने भरोसे का जवाब मांग रहे हैं।

    JPSC JSSC छात्र आंदोलन भर्ती परीक्षा युवा आक्रोश
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