नई दिल्ली. देश में तेजी से बढ़ रहे साइबर अपराधों की जांच को अधिक प्रभावी और पेशेवर बनाने के लिए केंद्र सरकार बड़ा बदलाव करने की तैयारी में है. केंद्रीय गृह मंत्रालय (एमएचए) ने सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव भेजा है, जिसके तहत साइबर अपराध के मामलों की जांच अब इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर के पुलिस अधिकारियों से कराने का प्रावधान किया जा सकता है. यह जानकारी संसद की गृह मामलों की स्थायी समिति की कार्रवाई रिपोर्ट में सामने आई है, जिसे शुक्रवार को लोकसभा में पेश किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय ने यह संशोधन प्रस्ताव इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को भेजा है. यह कदम संसदीय स्थायी समिति की उस सिफारिश के बाद उठाया गया है, जिसमें कहा गया था कि साइबर अपराधों की जटिल प्रकृति को देखते हुए इन मामलों की जांच केवल वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से कराई जानी चाहिए, ताकि जांच की गुणवत्ता और प्रभावशीलता बढ़ाई जा सके.
संसदीय समिति ने अपनी सिफारिश में यह भी कहा है कि साइबर अपराध की जांच करने वाले अधिकारियों को डिजिटल फॉरेंसिक, साइबर कानून, आधुनिक जांच तकनीकों, साइबर सुरक्षा, साइबर हाइजीन और घटना प्रतिक्रिया (इंसिडेंट रिस्पॉन्स) जैसे विषयों का विशेष ज्ञान होना चाहिए. समिति का मानना है कि प्रशिक्षित और अनुभवी अधिकारी ही साइबर अपराधों की तेजी से जांच कर मामलों का प्रभावी ढंग से निपटारा कर सकेंगे.
वर्तमान में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 78 के तहत इंस्पेक्टर या उससे ऊपर के रैंक का कोई भी पुलिस अधिकारी आईटी अधिनियम के तहत दर्ज मामलों की जांच कर सकता है. अब समिति ने इस प्रावधान में बदलाव की सिफारिश करते हुए कहा है कि जांच का अधिकार केवल इंस्पेक्टर से वरिष्ठ अधिकारियों तक सीमित किया जाए.
गौरतलब है कि वर्ष 2008 में आईटी अधिनियम में संशोधन कर साइबर अपराधों की जांच के लिए आवश्यक न्यूनतम अधिकारी का स्तर उप पुलिस अधीक्षक (डीएसपी) से घटाकर इंस्पेक्टर कर दिया गया था. यह संशोधन वर्ष 2009 से लागू हुआ था. अब लगभग डेढ़ दशक बाद फिर से इस प्रावधान में बदलाव की तैयारी की जा रही है.
गृह मंत्रालय द्वारा संसद की समिति को सौंपी गई कार्रवाई रिपोर्ट में कहा गया है कि आईटी अधिनियम, 2000 में संशोधन का प्रस्ताव पहले ही इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भेजा जा चुका है. हालांकि रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि प्रस्तावित संशोधन केवल जांच अधिकारी की रैंक बढ़ाने तक सीमित है या आईटी अधिनियम के अन्य प्रावधानों में भी बदलाव का सुझाव दिया गया है.
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख नहीं किया गया है कि इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने गृह मंत्रालय के इस प्रस्ताव पर कोई निर्णय लिया है या नहीं. मंत्रालय की ओर से इस संबंध में तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया भी सामने नहीं आई है.
विशेषज्ञों का मानना है कि देश में ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी, डिजिटल फ्रॉड, डेटा चोरी, साइबर हमलों और अन्य तकनीकी अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है. ऐसे मामलों की जांच में तकनीकी विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है. यदि प्रस्तावित संशोधन लागू होता है तो साइबर अपराध की जांच अधिक प्रशिक्षित और वरिष्ठ अधिकारियों के हाथों में होगी, जिससे मामलों की जांच की गुणवत्ता, पारदर्शिता और दोषियों तक पहुंचने की क्षमता में सुधार होने की उम्मीद है. फिलहाल इस प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा संशोधन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही लिया जाएगा.

