लेखक: देवानंद सिंह
झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की 14वीं संयुक्त असैनिक सेवा प्रारंभिक परीक्षा को लेकर उठा विवाद अब केवल एक भर्ती परीक्षा का मामला नहीं रह गया है। यह युवाओं के भरोसे, सरकारी संस्थाओं की विश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। जब हजारों अभ्यर्थी वर्षों की मेहनत के बाद परीक्षा देते हैं, तब परिणामों पर उठने वाला हर सवाल केवल अंक या कट-ऑफ का नहीं, बल्कि उनके भविष्य और व्यवस्था में विश्वास का होता है।
जेपीएससी पर उठते सवाल
छात्रों ने परिणाम घोषित होने के बाद कट-ऑफ सार्वजनिक नहीं किए जाने, मेरिट सूची की प्रक्रिया और सोशल मीडिया पर वायरल हुई कथित ओएमआर शीटों के आधार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की सत्यता जांच का विषय है और बिना जांच किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि यदि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होती तो शायद इतने बड़े स्तर पर अविश्वास की स्थिति पैदा ही नहीं होती।
सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच सीआईडी को सौंपी है, एसआईटी का गठन किया गया है और कई गिरफ्तारियां भी हुई हैं। यह दर्शाता है कि प्रथम दृष्टया कुछ ऐसे तथ्य सामने आए जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन केवल गिरफ्तारियां कर देना पर्याप्त नहीं है। जनता और अभ्यर्थियों का विश्वास तभी लौटेगा जब जांच निष्पक्ष, समयबद्ध और पूरी तरह पारदर्शी होगी तथा दोषी चाहे किसी भी पद या प्रभाव वाले हों, उन पर समान रूप से कार्रवाई होगी।
दूसरी ओर विपक्ष की भूमिका भी सवालों के घेरे से बाहर नहीं है। यदि विपक्ष वास्तव में युवाओं के भविष्य को लेकर गंभीर है तो उसे इस मुद्दे को केवल राजनीतिक अवसर में बदलने के बजाय ठोस सुधारों की मांग और समाधान प्रस्तुत करने चाहिए। हर विवाद को केवल सरकार पर हमला करने का माध्यम बना देना लोकतांत्रिक दायित्व का निर्वहन नहीं है। विपक्ष की जिम्मेदारी वैकल्पिक व्यवस्था और संस्थागत सुधारों का स्पष्ट रोडमैप देने की भी है।
सत्ता पक्ष को भी आत्ममंथन करना होगा। भर्ती परीक्षाओं में बार-बार उठते विवाद यह संकेत देते हैं कि केवल जांच बैठा देना स्थायी समाधान नहीं है। परीक्षा एजेंसियों के चयन से लेकर प्रश्नपत्र की सुरक्षा, मूल्यांकन, ओएमआर की उपलब्धता, कट-ऑफ और मेरिट सूची के प्रकाशन तक पूरी प्रक्रिया को तकनीकी और प्रशासनिक रूप से अधिक पारदर्शी बनाना होगा। हर अभ्यर्थी को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उसकी मेहनत का मूल्यांकन केवल योग्यता के आधार पर होगा।
छात्रों के आंदोलन को भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर आगे बढ़ना चाहिए। शांतिपूर्ण विरोध उनका संवैधानिक अधिकार है, लेकिन किसी भी निष्कर्ष पर जांच पूरी होने से पहले पहुंच जाना न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। आंदोलन का उद्देश्य व्यवस्था में सुधार होना चाहिए, न कि केवल टकराव।
झारखंड जैसे युवा राज्य में सरकारी नौकरियां लाखों परिवारों की आशाओं से जुड़ी हैं। इसलिए जेपीएससी जैसी संवैधानिक संस्था की विश्वसनीयता पर उठने वाला हर सवाल पूरे शासन तंत्र पर प्रश्नचिह्न लगा देता है। इस विवाद का समाधान केवल एक परीक्षा रद्द करने या न करने में नहीं, बल्कि ऐसी भर्ती व्यवस्था बनाने में है जिस पर किसी भी अभ्यर्थी को संदेह न हो।
बहरहाल यह समय राजनीति करने का नहीं, बल्कि व्यवस्था सुधारने का है। यदि सरकार पारदर्शी जांच सुनिश्चित करे, विपक्ष रचनात्मक सहयोग दे और आयोग अपनी कार्यप्रणाली में व्यापक सुधार लागू करे, तभी युवाओं का टूटा हुआ विश्वास फिर से कायम हो सकेगा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसके युवाओं का भरोसा है; यदि वही डगमगा जाए तो किसी भी सरकार या विपक्ष की जीत का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

