लेखक: इंद्र यादव
NEET के प्रैशर में महाराष्ट्र की अंकिता ने दी जान
NEET के प्रैशर में महाराष्ट्र की अंकिता ने दी जान। डॉक्टर बनने का सपना टूटा, तो घर में फंदे से झूल गई छात्रा।
कड़वा सच: शिक्षा प्रणाली बनी जानलेवा चक्की
राष्ट्र संवाद संवाददाता इंद्र यादव/मुंबई/अहिल्यानगर,क्या एक परीक्षा का पर्चा तय करेगा कि इंसान जिंदा रहने के काबिल है या नहीं! क्या कुछ नंबर कम आ जाने पर जिंदगी की किताब को बीच में ही फाड़कर फेंक देना चाहिए!
महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (कर्जत) की यह खबर इस कड़वे और डरावने सच से पर्दा उठाती है कि हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली अब ‘ज्ञान का मंदिर’ नहीं, बल्कि बच्चों की जान लेने वाली चक्की बन चुकी है। कर्जत के जलालपुर गांव की रहने वाली एक होनहार छात्रा अंकिता सांगले ने NEET की परीक्षा में मनमुताबिक नंबर न आने पर अपने ही घर में फांसी लगाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।
सपनों का बोझ और 166 अंक का दबाव
अंकिता डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी। इसके लिए उसने दिन-रात एक करके NEET की दोबारा परीक्षा दी थी। जब रिजल्ट आया, तो उसके खाते में 166 अंक आए—एक ऐसा स्कोर जो अपने आप में मेहनत का गवाह है। लेकिन इस अंधी और गलाकाट प्रतियोगिता के दबाव में अंकिता के लिए यह स्कोर नाकाफी साबित हुआ।
उसे लगा कि उसने अपने सपनों का गला घोंट दिया है और समाज व परिवार की उम्मीदों को तोड़ दिया है। इसी गहरे मानसिक तनाव (डिप्रेशन) के आगोश में आकर रविवार शाम करीब 4:30 बजे उसने अपने स्टडी रूम में फांसी लगा ली। जब तक घरवाले कुछ समझ पाते या दरवाजा तोड़कर अंदर पहुंचते, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। सुसाइड नोट में भी परीक्षा के तनाव का जिक्र मिलने की बात सामने आ रही है। कर्जत पुलिस अब मामले की गहराई से छानबीन कर रही है।
यह कोई पहली घटना नहीं
यह कोई पहली घटना नहीं है। कोटा से लेकर महाराष्ट्र के छोटे-छोटे गांवों तक, हर साल हज़ारों छात्र इस सिस्टम की भेंट चढ़ रहे हैं। इस दुखद हादसे ने समाज के सामने कुछ कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं!
मार्क्सशीट से तौलता समाज
हमने अपने बच्चों को मशीन समझ लिया है। क्या सफलता का पैमाना सिर्फ डॉक्टर या इंजीनियर बनना ही रह गया है? क्या कला, खेल, या अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने वाले युवाओं का कोई वजूद नहीं है?
अदृश्य और भारी मानसिक दबाव
माता-पिता की अनकही उम्मीदें, रिश्तेदारों के ताने और हर वक्त टॉप करने का पागलपन—बच्चों के कोमल कंधों पर इतना भारी बोझ लाद दिया जाता है कि उनका दिमाग इस दबाव को झेलने से इनकार कर देता है।
कमजोर होती सहनशक्ति
आज के युवाओं के पास असफलता को पचाने की ताकत खत्म होती जा रही है। उनके पास ऐसा कोई हमदर्द नहीं है जिससे वे खुलकर कह सकें— मुझसे इस बार नहीं हुआ, पर मैं टूटूंगा नहीं।
हम सबकी विफलता
अंकिता की मौत महज़ एक छात्रा का आत्महत्या करना नहीं है, बल्कि यह हम सबकी विफलता है। अगर हमने अब भी आंखें नहीं खोलीं, तो हमारे घरों के चिराग इसी तरह सिस्टम की आंधी में बुझते रहेंगे।
अंक कभी भी इंसान की काबिलियत या उसकी पूरी जिंदगी से बड़े नहीं हो सकते। हर माता-पिता को अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि जिंदगी इम्तिहान से बहुत बड़ी है, और यदि एक दरवाजा बंद होता है, तो कायनात में सफलता के हज़ारों रास्ते खुलते हैं।
मदद के लिए यहां संपर्क करें
यदि आप या आपका कोई अपना कभी अत्यधिक तनाव या निराशा के दौर से गुजरे, तो अकेले न रहें। अपनों से बात करें, मदद मांगें—क्योंकि आपकी सांसें और आपका जीवन किसी भी स्कोरकार्ड से अनमोल है। आप अंतरराष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम संघ या स्थानीय हेल्पलाइन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं।

