नई दिल्ली: नीट प्रश्नपत्र लीक विवाद को लेकर शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक ऐसा मामला नहीं है, जब 2014 में सत्ता में आने के बाद से नरेन्द्र मोदी सरकार को लगातार बने राजनीतिक या जनता के दबाव के आगे झुकना पड़ा हो। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे जनआंदोलन और विपक्षी एकजुटता बड़े फैसलों को पलटने पर मजबूर कर सकती है।
पृष्ठभूमि: नीट विवाद और मंत्री पर बढ़ता दबाव
मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट-यूजी 2024 के प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों के बाद देशभर के छात्रों और अभिभावकों में भारी रोष व्याप्त था। विपक्षी दलों ने इसे शिक्षा मंत्रालय की विफलता बताते हुए लगातार जांच और जवाबदेही की मांग की थी। सड़क से लेकर संसद तक चले विरोध-प्रदर्शनों ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया था।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा: घटनाक्रम और प्रभाव
नीट प्रश्नपत्र लीक विवाद को लेकर शनिवार को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक ऐसा मामला नहीं है, जब 2014 में सत्ता में आने के बाद से नरेन्द्र मोदी सरकार को लगातार बने राजनीतिक या जनता के दबाव के आगे झुकना पड़ा हो।
सरकार के पीछे हटने का पहला बड़ा मामला 2015 में सामने आया था, जब बुनियादी ढांचे और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए जमीन अधिग्रहण को आसान बनाने के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करने की कोशिश की गई थी।
इस कदम का किसान संगठनों, विपक्षी दलों और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के कई सहयोगी दलों ने व्यापक विरोध किया था। उनका तर्क था कि इन बदलावों से मौजूदा प्रावधान कमजोर हो जाएंगे और यह जनविरोधी कदम है। अंतत: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घोषणा करनी पड़ी थी कि मौजूदा कानून में कोई बदलाव नहीं किया जायेगा।
इसके तीन साल बाद, जनता के दबाव के कारण किसी मंत्री के इस्तीफे का पहला बड़ा मामला सामने आया।
तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री एम. जे. अकबर ने अक्टूबर 2018 में ‘मी टू’ अभियान के दौरान तब इस्तीफा दे दिया था, जब कुछ महिलाओं ने उन पर संपादक के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। अकबर ने इन आरोपों का खंडन किया था, लेकिन उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।
सरकार का फैसला वापस लेने का सबसे बड़ा कदम नवंबर, 2021 में सामने आया था, जब प्रधानमंत्री मोदी ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी।
इन कानूनों के खिलाफ लगभग एक साल तक आंदोलन चला था, जिसमें हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले रहे और इन्हें वापस लेने की मांग करते रहे। हालांकि सरकार लगातार इन सुधारों का बचाव करती रही, लेकिन अंततः उसे झुकना पड़ा।
अगस्त 2024 में, केंद्र सरकार ने नौकरशाही में विशेषज्ञों की सीधी भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के एक विज्ञापन को वापस ले लिया था। यह कदम विपक्षी दलों और राजग की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की आपत्तियों के बाद उठाया गया था, क्योंकि इस भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण के प्रावधान शामिल नहीं थे।
इसके बाद नवंबर 2025 में सरकार को एक और कदम पीछे हटाना पड़ा था, जब उसने संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश नहीं करने का फैसला किया। यह निर्णय खासकर पंजाब के राजनीतिक दलों के कड़े विरोध के बाद लिया गया था, जिनका कहना था कि इस प्रस्ताव से राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आएगी।
शनिवार को धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दबाव के आगे सरकार के झुकने का एक और मामला है।
नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ कई दिनों तक चले विरोध-प्रदर्शनों के बाद प्रधान ने शनिवार को इस्तीफा दे दिया।
कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के नेतृत्व में हुए प्रदर्शन के दौरान धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी मुख्य मांग बना लिया था। प्रदर्शनकारियों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद केंद्र सरकार ने अंततः यह मांग स्वीकार कर ली।
विश्लेषण: जवाबदेही और शासन की चुनौतियां
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण क्षण है। जहां पूर्व के मामलों में सरकार ने विधेयक वापस लिए या विज्ञापन रद्द किए, वहीं इस बार एक कैबिनेट मंत्री की बलि ली गई है। यह दर्शाता है कि युवा मतदाताओं और छात्रों का आक्रोश चुनावी राजनीति पर सीधा असर डाल सकता है।
शिक्षा क्षेत्र में पारदर्शिता और परीक्षा प्रणाली की पवित्रता बनाए रखना किसी भी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। नीट विवाद ने न केवल राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली में सुधार की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित किया है। आगे यह देखना होगा कि नए शिक्षा मंत्री इस विश्वास को कैसे बहाल करते हैं।
अधिक जानकारी के लिए आप पीआईबी की आधिकारिक वेबसाइट पर सरकारी विज्ञप्तियां देख सकते हैं।

