ब्रह्मर्षि विकास मंच: समाज का मंच या गुटबाजी का अखाड़ा?
पत्रकार लेखक देवानंद सिंह ने भी धृतराष्ट्र की भूमिका निभाई
भाग 01
देवानंद सिंह
“जो समाज की पीड़ा से कभी सरोकार नहीं रखता,
उस मंच को मैं मंच नहीं मानता।
जो जनहित की आवाज़ न बन सके,
उस दरबार को दरबार नहीं मानता।”
किसी भी सामाजिक संगठन की पहचान उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से होती है। यदि संगठन समाज के हित, शिक्षा, युवाओं के भविष्य और सामाजिक एकता जैसे मूल उद्देश्यों से भटककर व्यक्तिगत वर्चस्व, गुटबाजी और पद की राजनीति में उलझ जाए, तो उसकी विश्वसनीयता स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है।
जमशेदपुर में ब्रह्मर्षि विकास मंच को लेकर जिस प्रकार लगातार विवाद, आरोप-प्रत्यारोप और दो गुटों के बीच खींचतान सामने आ रही है, उसने समाज के लोगों को निराश किया है। समाज यह जानना चाहता है कि मंच का उद्देश्य समाज को जोड़ना है या समाज को अलग-अलग खेमों में बांटना।
यह समय किसी एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करने का नहीं, बल्कि सामूहिक आत्ममंथन का है। संगठन से जुड़े सभी वरिष्ठ और सक्रिय लोगों की जिम्मेदारी बनती है कि वे व्यक्तिगत मतभेदों से ऊपर उठकर समाज के हित को सर्वोपरि रखें। यदि संवाद और पारदर्शिता का अभाव रहेगा तो संगठन की साख प्रभावित होगी।
समाज के लोग नेतृत्व से यह अपेक्षा रखते हैं कि वह जवाबदेही स्वीकार करे, मतभेदों का समाधान निकाले और मंच को उसके मूल उद्देश्य सामाजिक एकता, शिक्षा, युवा सशक्तिकरण और जनहित की ओर वापस ले जाए।
बहरहाल इतिहास यह नहीं देखता कि कौन किस गुट में था, बल्कि यह याद रखता है कि कठिन समय में किसने समाज को जोड़ा और किसने उसे विभाजित किया। ब्रह्मर्षि विकास मंच के लिए भी यही सबसे बड़ी कसौटी है।
*बॉक्स*
ब्रह्मर्षि विकास मंच के विभाजन की जिम्मेदारी आखिर किसकी?
जमशेदपुर में ब्रह्मर्षि विकास मंच आज दो गुटों में बंटा दिखाई देता है। इस स्थिति के लिए संगठन के सभी प्रमुख पदाधिकारी और प्रभावशाली चेहरे नैतिक रूप से जवाबदेह हैं। समाज यह जानना चाहता है कि चंद्रमाधव सिंह,राज किशोर सिंह, विकास सिंह, अनिल ठाकुर, देवानंद सिंह, उमा नाथ सिंह चुलबुल,राम उदय प्रसाद सिंह, भाष्कर सिंह,दीपू सिंह,राम प्रकाश पांडेय, सुधीर सिंह, राम नारायण शर्मा , अनिल सिंह, स्वर्गीय मनमोहन चौधरी, तथा झारखंड के पूर्व मंत्री रविंद्र राय के साथ पूर्व पुलिस उपाध्यक्ष अरविंद सिंह , डॉ अनीता शर्मा और बिमला सिंह ने संगठन को एकजुट रखने के लिए क्या प्रयास किए? यदि प्रयास हुए तो वे सफल क्यों नहीं हुए? यदि नहीं हुए तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
समाज का सवाल किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि पूरे नेतृत्व से है। जब संगठन टूटता है तो उसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। ऐसे में सभी वरिष्ठ नेताओं और पदाधिकारियों को सामने आकर अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए और समाज को बताना चाहिए कि विभाजन की नौबत क्यों आई तथा इसे समाप्त करने के लिए वे क्या कदम उठा रहे हैं।
मैं मानता हूं इसके बाद उंगलियां मेरे ऊपर उठेगी इसलिए पहली किस्त में अपने ऊपर लिखा 16 किस्त मैंने बनाई है
पहली किश्त में पढ़े देवानंद सिंह ने धृतराष्ट्र की भूमिका निभाई

