लेखक: राष्ट्र संवाद संवाददाता
जमशेदपुर: बर्मामाइंस स्थित रजक समाज की ओर से पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ आषाढ़ी पूजा का आयोजन किया गया।
आषाढ़ी पूजा का धार्मिक और सामाजिक महत्व
आषाढ़ी पूजा झारखंड के जनजातीय और ग्रामीण समाज में मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है जो आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष में आता है। यह पर्व मुख्य रूप से कृषि चक्र की शुरुआत और मानसून के आगमन से जुड़ा हुआ है। किसान और ग्रामीण समुदाय इस समय ईश्वर से अच्छी वर्षा, फसलों की रक्षा और अन्न के भंडार भरे रहने की प्रार्थना करते हैं। इस पूजा का आयोजन सामूहिक रूप से होता है जिसमें गांव या मोहल्ले के सभी लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का सशक्त माध्यम भी है।
झारखंड में आषाढ़ माह की विशेषता
झारखंड प्रदेश अपनी समृद्ध जनजातीय संस्कृति और लोक परंपराओं के लिए विश्वविख्यात है। यहां आषाढ़ माह को कृषि कार्य का आरंभिक काल माना जाता है। इस माह में धान की रोपनी का कार्य प्रारंभ होता है जिसके लिए पर्याप्त वर्षा अनिवार्य होती है। रजक समाज सहित विभिन्न समुदाय इस समय प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने और आने वाले कृषि सत्र की सफलता के लिए विशेष अनुष्ठान करते हैं। झारखंड की संस्कृति में प्रकृति पूजा का विशेष स्थान है और आषाढ़ी पूजा इसी परंपरा का एक अभिन्न अंग है।
रजक समाज में पूजा की परंपरा
बर्मामाइंस स्थित रजक समाज द्वारा आयोजित इस पूजा में समाज के सभी आयु वर्ग के लोगों ने भाग लिया। समाज के वरिष्ठ सदस्यों ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। पूजा के दौरान पारंपरिक गीतों और नृत्य का भी आयोजन किया गया जिसमें महिलाओं ने विशेष रूप से भाग लिया। समाज के सदस्य नेहाल ने बताया कि यह पूजा झारखंड की लोक आस्था, कृषि संस्कृति और पूर्वजों की परंपरा का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में भी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और इन परंपराओं को जीवित रखना अपना कर्तव्य मानता है।
सात देवियों और एक देवता की आराधना
इस पूजा की एक विशिष्ट विशेषता सात देवियों और एक देवता की सामूहिक आराधना है। ग्रामीण मान्यता के अनुसार ये आठ शक्तियां प्रकृति के विभिन्न तत्वों और कृषि कार्यों की अधिष्ठात्री देवी-देवता हैं। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान पूर्वक इनकी पूजा-अर्चना कर अच्छी वर्षा, भरपूर फसल, सुख-समृद्धि और समाज की खुशहाली की कामना की। पूजन सामग्री में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध फल, फूल, धान की बाली, दूब घास और पारंपरिक पकवान शामिल थे। पुजारी ने वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूजा संपन्न कराई।
कृषि संस्कृति से जुड़ाव और सामाजिक एकता
पूजा के बाद प्रसाद वितरण किया गया जिसमें सैकड़ों श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। ग्रामीणों ने कहा कि आषाढ़ी पूजा सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति के प्रति आस्था को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर समाज के गणमान्य व्यक्तियों ने युवा पीढ़ी से अपील की कि वे अपनी संस्कृति और परंपराओं को सहेज कर रखें। [INTERNAL_LINK_HOLDER] इस आयोजन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि शहरीकरण के बीच भी ग्रामीण मूल्यों और परंपराओं की महक बरकरार है।

