आज भारत का स्वास्थ्य तंत्र एक दोधारी तलवार पर खड़ा है। एक तरफ सफेद कोट पहने वे हाथ हैं जो मरते को जीवन दे देते हैं, और दूसरी तरफ उसी सफेद कोट की आड़ में झोले से निकली नकली उपाधि और कालातीत औषधियाँ हैं जो जिंदगी को मौत में बदल देती हैं। सवाल सीधा है: चिकित्सक देवदूत हैं या कलंक? इस गंभीर बहस के बीच, एक सच्चाई जो हमें स्वीकार करनी होगी, वह है **झोला छाप चिकित्सक** का बढ़ता जाल। ये वे लोग हैं जिनके पास न तो उचित पंजीकरण है और न ही वैध उपाधि, फिर भी वे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मरीजों का ‘इलाज’ कर रहे हैं, अक्सर घातक परिणाम देते हुए। डॉक्टर दीपक गोस्वामी, एक मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक, इस जटिल समस्या की गहराइयों में उतरते हुए बताते हैं कि कैसे हमारा स्वास्थ्य तंत्र इस विरोधाभास में उलझा हुआ है।
आंकड़ों की कसौटी पर भारत का स्वास्थ्य तंत्र: **झोला छाप चिकित्सक** की हकीकत
कागज पर, भारत का चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मानक से बेहतर दिखता है। 10 फरवरी 2026 तक भारत में 13,88,185 पंजीकृत आधुनिक चिकित्सक और 7,51,768 पंजीकृत आयुष चिकित्सक हैं। सरकार के अनुसार, इनमें से 80 प्रतिशत ही सक्रिय हैं, जिसके आधार पर चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात 1:811 बैठता है, जो WHO के 1:1000 के मानक से बेहतर है। लेकिन क्या यह आंकड़ा जमीनी सच्चाई को दर्शाता है?
जमीन का सच तो कुछ और ही कहानी कहता है। भारतीय चिकित्सा परिषद ने चौंकाने वाली रिपोर्ट दी है कि देश भर में 50 प्रतिशत से अधिक चिकित्सक ‘झोला छाप’ हैं—यानी न तो वे पंजीकृत हैं और न ही उनके पास कोई वैध उपाधि है। शहरी क्षेत्रों में भले ही 58 प्रतिशत योग्य चिकित्सक हों, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 19 प्रतिशत से भी कम है। इसका सीधा मतलब है कि गांव में रहने वाले भारत के अंतिम जन के पास असली चिकित्सक नहीं, बल्कि नीम-हकीम ही पहुंच पाते हैं, जो अक्सर अनजाने में बड़े खतरों को न्योता देते हैं।
बुनियादी ढांचे का अभाव: देवदूत आएगा कहां से?
चिकित्सकों की कमी के साथ-साथ, बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे की हालत भी बेहद कड़वी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि प्रति 1000 आबादी पर 3.5 बिस्तर होने चाहिए। वहीं, भारत में उपलब्ध बिस्तरों का घनत्व प्रति 1,000 जनसंख्या पर मात्र 0.7 है, जो वैश्विक औसत 2.6 से काफी कम है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सक और अन्य कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं। जब बिस्तर नहीं, योग्य चिकित्सक नहीं, और बुनियादी दवाएं भी नहीं, तो कोई भी देवदूत भला आएगा कहां से? मरीज इलाज के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
मजबूरी की उपज: क्यों फलते-फूलते हैं **झोला छाप चिकित्सक**?
इस विकट स्थिति में, **झोला छाप चिकित्सक** मजबूरी की उपज बन जाते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत के 1.3 अरब लोगों के लिए देश में सिर्फ 10 लाख पंजीकृत चिकित्सक हैं। इस हिसाब से प्रत्येक 13000 नागरिकों पर मात्र 1 चिकित्सक मौजूद है। जब 108 वाहन सेवा 2 घंटे में पहुंचे और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र 30 किलोमीटर दूर हो, तो बुखार में तड़पता बच्चा 50 रुपये वाले झोला छाप के पास ही जाएगा। तत्काल आराम मिलने की उम्मीद में वह ‘डॉक्टर’ मरीज के लिए प्राणवायु सा प्रतीत होता है। यह एक कड़वा सच है, जो दिखाता है कि कैसे हमारे सिस्टम की विफलता ने ऐसे अनधिकृत चिकित्सकों को पनपने का मौका दिया है।
लेकिन यह ‘प्राणवायु’ धीरे-धीरे विष बनती है। बिना जांच बलवर्धक दवाएं देना, बिना जरूरत के प्रतिजैविक (एंटीबायोटिक) का अत्यधिक प्रयोग, और गलत शिरा में सुई लगाना—ये सभी गुर्दा खराब होने, यकृत क्षति और प्रतिजैविक प्रतिरोध बढ़ाने जैसे गंभीर परिणाम देते हैं। एक **झोला छाप चिकित्सक** भले ही आज का दर्द मिटाता हो, पर वह अक्सर कल की मौत की रसीद काट देता है, इसलिए उन्हें मौत का सौदागर कहना भी गलत नहीं होगा।
सरकारी प्रयास और टूटता भरोसा
सरकार दावा करती है कि चिकित्सकों की संख्या बढ़ रही है। 2014 में 387 चिकित्सा महाविद्यालय थे, अब यह संख्या बढ़कर 780 हो गई है। स्नातक चिकित्सा की सीटें भी 51,348 से बढ़कर 1,18,137 हो गईं। संसद में बताया गया कि नवंबर 2024 तक 13,86,145 आधुनिक चिकित्सक पंजीकृत थे। 2030 तक 18 लाख सक्रिय चिकित्सक होने का अनुमान है।
फिर भी लोगों का भरोसा क्यों टूट रहा है? इसके कई कारण हैं:
- महंगी पढ़ाई: निजी संस्थानों की चिकित्सा शिक्षा की लागत तेजी से बढ़ रही है, जो करोड़ों तक पहुंच गई है। 1 करोड़ खर्च करके निकला चिकित्सक 5 रुपये की पर्ची पर इलाज नहीं कर पाएगा, यह एक आर्थिक सच्चाई है।
- शहरीकरण: लगभग 80 प्रतिशत चिकित्सक शहरों में ही केंद्रित हैं। गांव में नियुक्ति से बचने की जुगाड़ चलती है, जिससे ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा चरमरा जाती है।
- हिंसा: चिकित्सकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा भी एक बड़ा कारण है। आधे से ज्यादा राज्यों में चिकित्सक सुरक्षा अधिनियम लागू हैं, फिर भी घटनाएं नहीं रुक रहीं क्योंकि कानूनों का सही कार्यान्वयन नहीं हो रहा।
- आंकड़ों का घालमेल: राष्ट्रीय आयोग और राज्य परिषद के आंकड़ों में 41,000 चिकित्सकों का अंतर एक गंभीर चिंता का विषय है, जो पारदर्शिता पर सवाल उठाता है। यह स्थिति World Health Organization (WHO) के लक्ष्यों को प्राप्त करने में भी बाधा डालती है।
उपचार क्या है? चार कड़वी खुराक
सच यह है कि चिकित्सक व्यवस्था का चेहरा है, जड़ नहीं। देवदूत वह चिकित्सक है जो कर्मचारियों की कमी में भी रात 2 बजे प्रसव कराता है। कलंक वह तंत्र है जो न दवा देता है, न कर्मचारी, न सुरक्षा। **झोला छाप चिकित्सक** खुद एक कलंक हैं, पर वे रोग नहीं, बल्कि इस बीमार स्वास्थ्य तंत्र के लक्षण हैं। रोग है— 0.7 बिस्तर प्रति 1000, 19 प्रतिशत ग्रामीण योग्य चिकित्सक, और करोड़ों की डिग्री का व्यापार। जब तक गांव में 1:1000 वाला असली चिकित्सक, 30 मिनट में वाहन सेवा और सस्ती दवा नहीं पहुंचेगी, तब तक **झोला छाप चिकित्सक** ही ‘भगवान’ बने रहेंगे।
इस समस्या से निपटने के लिए चार कड़वी खुराक अपनाने की जरूरत है:
- ग्रामीण सेवा अनिवार्य: स्नातक के बाद 3 साल ग्रामीण सेवा अनिवार्य की जाए। बदले में स्नातकोत्तर में वरीयता और ऋण माफी जैसे प्रोत्साहन दिए जाएं।
- झोला छाप का नियमन: दसवीं पास को 2 साल का सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता पाठ्यक्रम दिया जाए। उन्हें 20 रोग और 30 दवाओं के उपचार की शिक्षा दी जाए, और गंभीर मामलों में भेजने की प्रक्रिया सिखाई जाए। निगरानी के साथ उनकी सीमित सेवा को वैध करना चाहिए, क्योंकि पूरा प्रतिबंध अव्यावहारिक है।
- अंकीय सेतु: दूर-चिकित्सा (telemedicine) और उड़न-यंत्र (ड्रोन) से दवा पहुंचाना जैसे अंकीय समाधानों को बढ़ावा दिया जाए। हर प्राथमिक केंद्र में स्नातक चिकित्सक आभासी रोगी देखभाल (virtual patient care) करे।
- आंकड़ों की शुद्धि: राष्ट्रीय आयोग और राज्य परिषद का जीवंत, पहचान-पत्र से जुड़ा पंजीयन हो ताकि चिकित्सकों की सही संख्या और उनकी योग्यता का पता चल सके।
चिकित्सक देवदूत है जब तंत्र उसे देवदूत बनने देता है। कलंक तब बनता है जब मजबूरी, लालच और लापरवाही उसे झोले वाले से भी बदतर बना देती है। आंकड़े बताते हैं कि चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात 1:811 है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के 1:1000 से बेहतर है। पर जब तक 50 प्रतिशत झोला छाप का सच और 0.7 बिस्तर का सच नहीं बदलता, तब तक भारत के अंतिम जन के लिए चिकित्सक आधा प्राणवायु, आधा मौत का सौदागर ही रहेगा।
200 प्रतिशत शुद्ध सच यही है: हमें चिकित्सक नहीं, एक ईमानदार स्वास्थ्य नीति चाहिए। वरना सफेद कोट का रंग खून से लाल होता रहेगा, और हम पूछते रहेंगे— देवदूत कहां है? अधिक जानकारी के लिए, आप विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की वेबसाइट पर वैश्विक स्वास्थ्य नीतियों के बारे में पढ़ सकते हैं।

