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    Home » आज भी ‘गुलामी जिंदा है’: मुजफ्फरनगर में 13 मजदूरों की दहला देने वाली आपबीती
    अपराध उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय संपादकीय

    आज भी ‘गुलामी जिंदा है’: मुजफ्फरनगर में 13 मजदूरों की दहला देने वाली आपबीती

    Devanand SinghBy Devanand SinghJune 27, 2026No Comments3 Mins Read
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    गुलामी जिंदा है
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    लेखक: इंद्र यादव

    मुजफ्फरनगर की यह हृदय विदारक घटना इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि आज भी **गुलामी जिंदा है**। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जो हुआ, उसे पढ़कर कलेजा मुंह को आ जाता है। **13 मजदूर**, जो अपनी रोजी-रोटी के लिए निकले थे, उन्हें **डेढ़ साल** तक एक ऐसी फैक्ट्री में बंधक बनाकर रखा गया, जो फैक्ट्री कम, यमराज का अड्डा ज्यादा लग रही थी। शरीर पे पेचकस से छेद, हड्डियों का ढांचा और पेट में भूख की आग—ये कोई फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि हमारे समाज के पिछवाड़े में चल रहा नंगा सच है।

    शिक्षा का अभाव: साज़िश या सिस्टम की नाकामी!

    इन मजदूरों को जोड़े रखा गया क्योंकि वे गरीब थे, अनपढ़ थे और सिस्टम की पहुंच से कोसों दूर थे। ये कोई इत्तफाक नहीं है, ये एक सोची-समझी साज़िश है।

    जब आप गरीब को ‘अ’ से अनार नहीं पढ़ाते, तो उसे ‘अ’ से अपनी औकात का पता नहीं चलता। जनता को अगर कायदे से शिक्षा मिली होती, तो कोई **अंकित बालियान** या **प्रदीप बालियान** उनकी आँखों में धूल नहीं झोंक सकता था।

    ये लोग ‘शिक्षा’ को दुश्मन मानते हैं, क्योंकि पढ़ा-लिखा आदमी सवाल करता है, और मालिक को तो वो चाहिए जो बिना बोले मार सहे और काम करे।

    आधार कार्ड जलवा दिए, पहचान मिटा दी!

    मालिकों ने उनके सरकारी दस्तावेज तक जला दिए। अरे, पहचान ही तो मिटा दी! ताकि ये कल को कहीं जाकर अपनी शिकायत न लिखवा सकें, कहीं वोट न दे सकें, कहीं सरकारी मदद न मांग सकें।

    ये ‘आधुनिक गुलामी’ है। ये लोग कागज जलाकर ये बताना चाहते थे कि ‘तुम अब सरकारी रिकॉर्ड में हो ही नहीं, तुम सिर्फ मेरी मशीन के पुर्जे हो।

    कानून की नींद और मानवाधिकार का मजाक

    एक मजदूर **विक्रम** दीवार फांदकर भागता है, तब जाकर पुलिस की नींद खुलती है। सवाल ये है कि डेढ़ साल तक ये फैक्ट्री क्या हवा में चल रही थी! स्थानीय प्रशासन क्या अंधेरे में था!

    जब मजदूर के शरीर पर पेचकस के निशान थे, जब वो हड्डी का ढांचा बन चुका था, तब क्या किसी पड़ोसी को, किसी सरकारी मुलाजिम को वहां के चीखने की आवाज नहीं सुनाई दी!

    ये मानवाधिकार का सीधा-सीधा कत्ल है। संविधान हमें ‘गरिमा के साथ जीने’ का हक देता है, लेकिन यहां तो गरिमा तो दूर, जान की भी कोई गारंटी नहीं थी। आप मानवाधिकारों के बारे में अधिक जानकारी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट पर पा सकते हैं।

    क्या सच में ‘गुलामी जिंदा है’?

    हम आज इस पर लिख रहे हैं, कल कोई और खबर आएगी। लेकिन जब तक हम उस ‘शिक्षा के षड्यंत्र’ को नहीं तोड़ेंगे, जो गरीब को सिर्फ लेबर बनकर रहने पर मजबूर करता है, तब तक ये **अंकित बालियान** पैदा होते रहेंगे।

    हमें इन मजदूरों को सिर्फ आज़ाद नहीं कराना है, हमें उस व्यवस्था को उखाड़ फेंकना है जो इंसान को सामान की तरह खरीदने और बेचने की हिम्मत रखती है।

    जिन लोगों ने इन मजदूरों के शरीर पर पेचकस चलाए हैं, उनके लिए जेल की सलाखें छोटी पड़नी चाहिए। और समाज को ये पूछना चाहिए—क्या हमने शिक्षा को इतना महंगा और मुश्किल कर दिया है कि आज भी एक इंसान पेट के लिए गुलामी की दहलीज पर खड़ा होने को मजबूर है!

    मुजफ्फरनगर का ये कांड सिर्फ एक फैक्ट्री का मामला नहीं है, ये इस बात का सबूत है कि अभी भी **गुलामी जिंदा है**—बस तरीका थोड़ा बदल गया है।

    एक सवाल आप सभी से: जब तक हमारे सिस्टम में गरीबी और अशिक्षा का यह खतरनाक गठजोड़ बना रहेगा, क्या हम वास्तव में एक स्वतंत्र समाज होने का दावा कर सकते हैं? [INTERNAL_LINK_HOLDER]

    बंधुआ मजदूरी मजदूर गुलामी मानवाधिकार हनन मुजफ्फरनगर कांड शिक्षा का अभाव
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