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    Home » त्रिकोणीय जंग में उत्तराखंड की राजनीति का भविष्य
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    त्रिकोणीय जंग में उत्तराखंड की राजनीति का भविष्य

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaJune 21, 2026No Comments6 Mins Read
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    उत्तराखंड की राजनीति
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    लेखक: अजय कुमार

    उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी पारा चढ़ चुका है। पहाड़ी राज्य में विधानसभा चुनाव में अब आठ महीने से भी कम वक्त बचा है और हर दल अपनी-अपनी सियासी बिसात बिछाने में जुटा है। सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी जहां इतिहास रचने के मंसूबे के साथ मैदान में डटी है, वहीं कांग्रेस अपने दस साल पुराने वनवास को खत्म करने के लिए जोर लगा रही है। इसी बीच क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति करने वाला उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) भी अपनी खोई जमीन वापस पाने की जुगत में है। सत्तर सीटों वाले इस राज्य में मुकाबला अब त्रिकोणीय होता दिख रहा है, हालांकि असली लड़ाई अब भी बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही केंद्रित नजर आ रही है। पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो 2022 में बीजेपी ने उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार सत्ता परिवर्तन की परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। पार्टी को 44.33 फीसदी वोट मिले और उसने 47 सीटों पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस के खाते में 37.91 फीसदी वोट आए, लेकिन सीटों के मामले में वह सिर्फ 19 पर सिमट गई। बसपा और निर्दलीयों ने दो-दो सीटें जीतीं। आम आदमी पार्टी ने कर्नल अजय कोठियाल को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर पूरे दमखम से चुनाव लड़ा था, लेकिन उसे सिर्फ 3.3 फीसदी वोट मिले और खाता भी नहीं खुल सका। दिलचस्प यह भी रहा कि उस चुनाव में दो बड़े कद्दावर नेता अपनी ही सीट से हार गए थे। कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत लालकुआं से हार गए थे, जबकि तब के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपनी परंपरागत खटीमा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी भुवन कापड़ी से चुनाव हार बैठे थे। हालांकि भाजपा आलाकमान ने धामी पर भरोसा बनाए रखा और बाद में चंपावत सीट से उपचुनाव जिताकर उन्हें फिर मुख्यमंत्री पद पर बैठाया।

    उत्तराखंड की राजनीति: गढ़वाल और कुमाऊं का चुनावी गणित

    उत्तराखंड की राजनीति को समझने के लिए कुमाऊं और गढ़वाल मंडल का गणित जानना जरूरी है। गढ़वाल मंडल में 41 और कुमाऊं मंडल में 29 सीटें आती हैं। पिछली बार गढ़वाल में बीजेपी का दबदबा एकतरफा रहा था, जहां पार्टी ने 29 सीटें जीती थीं और कांग्रेस सिर्फ 8 पर सिमट गई थी। लेकिन कुमाऊं मंडल में तस्वीर अलग थी, यहां बीजेपी को 18 और कांग्रेस को 11 सीटें मिली थीं, यानी कांग्रेस ने यहां कड़ी टक्कर दी थी। यही वजह है कि इस बार दोनों ही पार्टियां इन इलाकों में अपनी पूरी ताकत झोंकने में जुटी हैं। राहुल गांधी की हाल में कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों में रैलियां प्रस्तावित थीं। अल्मोड़ा में भारी भीड़ जुटी, पर खराब मौसम के चलते वह खुद नहीं पहुंच सके और फोन तथा वर्चुअल माध्यम से कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल भी लगातार राज्यभर का दौरा कर लोगों से सीधा संपर्क साध रहे हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी राज्य के इतिहास में पहले ऐसे भाजपा मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं जो अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। एंटी इंकंबेंसी से निपटने के लिए बीजेपी ने माइक्रो लेवल पर रणनीति बनानी शुरू कर दी है। 13 से 16 जून के बीच पार्टी ने एक बड़ा अभियान चलाया, जिसमें लोकसभा सांसद, राज्यसभा सदस्य और कोर ग्रुप के नेताओं को उन 23 सीटों पर भेजा गया, जहां पार्टी पिछली बार हार गई थी। ये नेता वहां रात भी रुके, ताकि स्थानीय संगठन की हकीकत और हार की वजहों को करीब से समझा जा सके। चुनावी मुद्दों की बात करें तो बीजेपी इस बार बुनियादी ढांचे के विकास, यूनिफॉर्म सिविल कोड और धार्मिक पर्यटन, खासकर चारधाम यात्रा और मानसखंड मंदिर माला मिशन को आगे रखकर वोट मांगने की तैयारी में है। 2027 में हरिद्वार में लगने वाला कुंभ मेला भी पार्टी के लिए अपनी प्रशासनिक छवि चमकाने का बड़ा मौका साबित हो सकता है।

    कांग्रेस की चुनौतियां और यूकेडी का पुनरुत्थान

    दूसरी तरफ कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी नहीं है, लेकिन अंदरूनी गुटबाजी उसकी सबसे बड़ी मुश्किल बनी हुई है। प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल लगातार जमीन पर मेहनत कर रहे हैं, लेकिन सात महीने बीत जाने के बाद भी प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया है। हाल ही में पार्टी की उत्तराखंड प्रभारी कुमारी शैलजा दो दिन के दौरे पर आई थीं, लेकिन एक ही दिन में कामकाज निपटाकर दिल्ली लौट गईं, जिससे स्थानीय नेताओं में संगठन को लेकर बेचैनी और बढ़ गई। हरीश रावत के कुछ समय पहले ‘मौन अवकाश’ पर जाने से भी सियासी गलियारों में अटकलें तेज हो गई थीं, हालांकि बाद में उन्होंने साफ कर दिया कि वह कांग्रेस को जिताने के लिए पूरी ताकत से मैदान में उतरेंगे। गणेश गोदियाल का कहना है कि कांग्रेस अपने शासन काल की उपलब्धियों और मौजूदा सरकार की नाकामियों को साथ रखकर जनता के सामने जाएगी। पार्टी इस बार बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक मामलों, अंकिता भंडारी हत्याकांड, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और जंगली जानवरों से हो रहे जान माल के नुकसान जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठाने की तैयारी में है। इस बीच राज्य आंदोलन से जुड़ा उत्तराखंड क्रांति दल भी खुद को मजबूत करने में लगा है। पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष आशुतोष नेगी और युवा प्रकोष्ठ अध्यक्ष आशीष नेगी लगातार जिलों में जनसभाएं कर रहे हैं। यूकेडी का सबसे बड़ा मुद्दा पहाड़ में स्थायी राजधानी बनाने की मांग है। पार्टी का मानना है कि जब तक मुख्यमंत्री और विधायक पहाड़ में नहीं बैठेंगे, तब तक पहाड़ का असली विकास संभव नहीं है।

    यूकेडी की प्रमुख मांगें और चुनावी प्रभाव

    इसके अलावा यूकेडी 1950 से राज्य में रह रहे लोगों को मूल निवासी का दर्जा देने और सख्त भू-कानून बनाने की मांग पर भी मुखर है। पार्टी का कहना है कि अगर उनकी सरकार बनी और कोई पेपर लीक हुआ तो इसकी सीधी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री की होगी और उन्हें इस्तीफा देना होगा। आशुतोष नेगी के मुताबिक पार्टी अभी 30 से 35 सीटों पर मजबूत स्थिति में काम कर रही है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो यूकेडी जितनी मजबूत होगी, उसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा, क्योंकि भाजपा का कोर वोटर अब भी काफी हद तक उसके साथ बना हुआ है। हालांकि सरकार के खिलाफ नाराजगी जरूर है, लेकिन विपक्ष के पास अभी पुष्कर सिंह धामी की टक्कर का कोई बड़ा चेहरा नहीं दिख रहा। कुमाऊं मंडल में मुकाबला कांटे का रहने की उम्मीद है और अगर कांग्रेस अपनी अंदरूनी खींचतान खत्म कर सही टिकट बंटवारा कर पाई, तो उसे फायदा मिल सकता है। फिलहाल तस्वीर यही बताती है कि भाजपा विकास और संगठन की ताकत पर सत्ता बचाने में जुटी है, कांग्रेस सरकार की नाकामियों को मुद्दा बनाकर वापसी का रास्ता तलाश रही है और यूकेडी पुराने सवालों को फिर सुर्खियों में लाने की कोशिश कर रही है। आने वाले महीनों में उत्तराखंड की सियासत और भी दिलचस्प मोड़ ले सकती है, और यही बात इस चुनाव को पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प बना रही है।

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