लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी
उम्र पचास का मतलब अंत नहीं है, बल्कि यह एक नई शुरुआत है। पचास की उम्र के बाद जीवन को कैसे एक नई दिशा दी जाए, यही इस लेख का मुख्य विषय है। यह उस किसान की तरह है जिसने बीज बोने में पूरी उम्र लगा दी और अब फसल काटने से पहले खेत सूखा देख रहा है। बच्चों की कॉपी, घर की किश्त, माता पिता की दवा में जवानी खर्च हो गई। अब खाता खोलो तो हाथ काँपते हैं। सच्चाई यह है कि कोई सरकार, कोई कंपनी, कोई बेटा बचाने नहीं आएगा। पेंशन का जमाना लद गया। मशीन ने नौकरी की कुर्सी खींच ली। महंगाई मुँह फाड़े खड़ी है। पर खेल खत्म नहीं हुआ। केवल नियम बदल गए।
पचास की उम्र के बाद: वित्तीय सुरक्षा का सच
पहला सच रुपया का है। एजेंट बारह प्रतिशत का सपना दिखाता है। जमीन पर आठ प्रतिशत मिल जाए वही बड़ी बात है, वह भी कर काटकर। दूसरी तरफ इलाज की महंगाई चौदह प्रतिशत भाग रही है। आज पाँच लाख का ऑपरेशन दस साल बाद अठारह लाख का होगा। वरिष्ठ नागरिक योजना से मिले अड़सठ हजार कर बाद सैंतालीस हजार रह जाते हैं। सात साल में उनकी ताकत आधी हो जाती है। इसलिए डेढ़ करोड़ का बोझ दिमाग से उतारो। नया सवाल यह है कि सत्तर साल तक चालीस हजार महीना कहाँ से पक्का आएगा।
स्वास्थ्य काया का सच
दूसरा सच काया का है। मधुमेह, रक्तचाप, घुटने की पीड़ा अब साथी हैं। दस लाख का स्वास्थ्य बीमा ढाल है। पर सबसे बड़ी दवा पैदल चलना है। रोज पैंतालीस मिनट चलो। नहीं तो जमा पूँजी अस्पताल खा जाएगा। नमक कम, चीनी कम, तेल कम। सादा भोजन, भरपूर नींद। शरीर रहेगा तो लड़ाई लड़ोगे।
मन की शांति का सच
तीसरा सच मन का है। सेवा निवृत्ति का अर्थ घर में बंद होना नहीं। खाली मन दुख की खान है। अट्ठावन पर रुकना मत। अड़सठ तक हल्का काम पकड़ो। चौकीदार, हिसाब लिखने वाला, पुस्तकालय सहायक, स्कूल वाहन चालक। पच्चीस हजार महीना भी दस साल में तीस लाख बना देता है। साथ में सम्मान भी मिलता है। यही दवा की महंगाई का असली बीमा है।
रिश्तों और नातों का सच
चौथा सच नातों का है। बेटा बैंक जमा नहीं है। ब्याह पढ़ाई तक साथ दो। पर अब साफ कह दो कि हर महीने पैसा नहीं दूँगा। पत्नी घर पर है तो उसके पैंसठ से पचासी तक के बीस साल का खर्च भी तुम्हारे हिस्से आएगा। माँ पचहत्तर की हैं तो दवा के बीस हजार अलग निकालो। भावना के जाल में फँसे तो बेटा परदेस में होगा और तुम लाइन में।
समाज से जुड़े रहने का सच
पाँचवाँ सच समाज का है। चुनाव में बूढ़े याद आते हैं। बजट में भूल जाते हैं। कर में थोड़ी राहत मिलती है पर इज्जत नहीं मिलती। इसलिए अपना हक खुद पढ़ो। वरिष्ठ नागरिक योजना, डाकघर मासिक आय योजना, आयुष्मान कार्ड। कागज खुद भरो। किसी के भरोसे मत रहो।
जुगत और संपर्क का सच
छठा सच जुगत का है। मित्र कम रखो पर सच्चे रखो। पुराने साथी से बात करो। व्हाट्सएप केवल नमस्ते के लिए नहीं है। वहाँ काम की बात करो। अपना हुनर बताओ। माँगने में शर्म मत करो। आज तुम मदद करोगे, कल कोई तुम्हारी करेगा।
बाजार और निवेश का सच
सातवाँ सच बाजार का है। बाजार गिरेगा। दो हजार आठ में गिरा था। दो हजार बीस में गिरा था। फिर उठा भी। इसलिए डरकर पैसा मत निकालो। पर पूरा पैसा बाजार में भी मत डालो। बाँट दो। छह महीने का खर्च बैंक में। आधा पैसा सरकारी योजना में जो हर माह दे। बचा हुआ थोड़ा संतुलित कोष में जो आठ साल न छुओ।
आत्मा और कर्म का सच
आठवाँ सच आत्मा का है। गीता कहती है कर्म करो। कलियुग कहता है कर्म के साथ रोकड़ भी देखो। पूजा करो पर पासबुक भी देखो। डर को ताकत बनाओ। हर सुबह तीन सवाल करो। तन के लिए क्या किया। धन के लिए क्या किया। मन के लिए क्या किया।
खर्च प्रबंधन और बचत की राह
रास्ता सीधा है। खर्च का ऑपरेशन करो। पचास हजार का घर खर्च पैंतीस हजार पर लाओ। दिखावे की गाड़ी, क्लब, बड़ा घर का मोह छोड़ो। कर्ज बंद करना तीस हजार की बचत के बराबर है। जो बचे उसे तीन हिस्से करो। आपात निधि, मासिक आय, बढ़त निधि।
अनुभव, धैर्य और संपर्क: आपके नए हथियार
अब उम्मीद की बात। पचास के बाद तुम्हारे पास तीन हथियार हैं। अनुभव, धैर्य, संपर्क। इन्हें बेचो। परामर्श न मिले तो बच्चों को पढ़ाओ। लिख सको तो लिखो। खाना बना सको तो डिब्बा सेवा शुरू करो। हुनर को छोटा मत समझो। आज बावन साल का व्यक्ति खेती सिखाकर लाख कमा रहा है। छप्पन साल की महिला अचार बेचकर घर चला रही है।
अंतिम बात। सबसे बड़ी जंग खुद से है। बीते कल का रोना और आने वाले कल का डर छोड़ो। आज जो समय है वही सच है। पचास वाली पारी शतक के लिए नहीं है। इज्जत से टिके रहने के लिए है। योजना उम्मीद पर नहीं, सबसे बुरे दिन पर बनाओ। क्योंकि जब विकेट गिरता है तो ताली लोग नहीं, खाता बजाता है।
देर हुई है पर बहुत देर नहीं। आज शुरू करो। खर्च घटाओ। बीमा लो। चलो। छोटा काम पकड़ो। थका पाँव भी मंजिल पा लेता है यदि आँख खुली हो और राह सीधी हो।[INTERNAL_LINK_HOLDER]

