लेखक: देवानंद सिंह
पश्चिम एशिया एक बार फिर अस्थिरता के ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां छोटी सैन्य कार्रवाई भी बड़े संघर्ष का रूप ले सकती है। युद्ध विराम और शांति वार्ता की कोशिशों के बीच अमेरिका द्वारा दक्षिणी ईरान और होर्मुज स्ट्रेट के आसपास “सेल्फ डिफेंस स्ट्राइक” किए जाने ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी सेना ने जिन मिसाइल साइट्स, सैन्य ठिकानों और नौकाओं को निशाना बनाया, उसे वॉशिंगटन ने आत्मरक्षा की कार्रवाई बताया है, लेकिन इस कदम ने अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की खाई को और गहरा कर दिया है।
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, ईरानी सैन्य गतिविधियों से अमेरिकी युद्धपोतों और सैनिकों को खतरा महसूस हो रहा था। यही कारण बताया गया कि दक्षिणी ईरान में कई ठिकानों पर हमला किया गया। अमेरिका का यह भी दावा है कि ईरानी नौकाएं होर्मुज स्ट्रेट में बारूदी सुरंगें बिछाने की तैयारी कर रही थीं, जिससे वैश्विक समुद्री व्यापार और तेल आपूर्ति को गंभीर खतरा हो सकता था। हालांकि, ईरान की ओर से इन आरोपों पर अभी तक कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन तेहरान लंबे समय से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को क्षेत्र की अस्थिरता का प्रमुख कारण बताता रहा है।
दरअसल, होर्मुज स्ट्रेट सिर्फ एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन माना जाता है। दुनिया के कुल तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि यहां तनाव बढ़ता है या सैन्य संघर्ष तेज होता है, तो इसका सीधा असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, व्यापारिक जहाजों की आवाजाही और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है। यही कारण है कि दुनिया के बड़े देश इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य टकराव को लेकर बेहद सतर्क रहते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह हमला ऐसे समय हुआ है, जब दोनों देशों के बीच तनाव कम करने और युद्ध विराम बनाए रखने की कोशिशें जारी थीं। अमेरिका ने भले ही इसे सीमित और आत्मरक्षा के दायरे में की गई कार्रवाई बताया हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि अमेरिका और ईरान के बीच छोटे सैन्य टकराव भी बड़े राजनीतिक और रणनीतिक संकट में बदलते रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई बार ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे पूरे पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात बन गए थे।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले ही यह स्पष्ट कर चुके हैं कि होर्मुज क्षेत्र में किसी भी ईरानी “उकसावे” का जवाब तत्काल और सख्ती से दिया जाएगा। ट्रंप प्रशासन की यह आक्रामक नीति ईरान पर दबाव बनाने की रणनीति मानी जा रही है। अमेरिका का मानना है कि कठोर सैन्य और आर्थिक दबाव के जरिए ईरान को क्षेत्रीय गतिविधियों और परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण के लिए मजबूर किया जा सकता है। दूसरी ओर ईरान इसे अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है। इजरायल, सऊदी अरब और खाड़ी देशों की भूमिका भी इस समीकरण में महत्वपूर्ण हो जाती है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार दोनों देशों से संयम बरतने और कूटनीतिक रास्ता अपनाने की अपील कर रहा है।
आज जरूरत इस बात की है कि सैन्य शक्ति प्रदर्शन के बजाय संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी जाए। युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी का खामियाजा केवल दोनों देशों को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भुगतना पड़ सकता है। वैश्विक तेल संकट, महंगाई, व्यापारिक अस्थिरता और क्षेत्रीय हिंसा जैसी चुनौतियां पहले से ही दुनिया के सामने हैं। ऐसे में पश्चिम एशिया में एक और बड़ा संघर्ष अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को गंभीर संकट में डाल सकता है।
स्पष्ट है कि होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती सैन्य गतिविधियां सिर्फ क्षेत्रीय विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक चिंता का विषय बन चुकी हैं। यदि समय रहते कूटनीतिक प्रयासों को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में हालात और अधिक विस्फोटक हो सकते हैं। दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और ईरान बातचीत का रास्ता चुनेंगे या फिर पश्चिम एशिया एक बार फिर युद्ध की आग में झुलसने को मजबूर होगा।

