लेखक: महेन्द्र तिवारी
सोडरटालिये शहर की बात की जाए, तो वहां का स्थानीय प्रशासन प्रतिवर्ष सड़कों और पार्कों की मैन्युअल सफाई पर लगभग 20 मिलियन (भारतीय संख्या प्रणाली में 2 करोड़) स्वीडिश क्रोना की विशाल धनराशि खर्च करता है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद छोटे छोटे कोनों से इस कचरे को पूरी तरह साफ करना असंभव हो जाता है। ऐसे में यह नवीन प्रयोग प्रशासन के लिए आर्थिक राहत और स्वच्छता की एक नई किरण बनकर उभरा। इस योजना से जुड़े विशेषज्ञों का दावा था कि यदि इस स्वचालित व्यवस्था को पूरे शहर में बड़े पैमाने पर लागू कर दिया जाए, तो सिगरेट के टुकड़ों को साफ करने की प्रशासनिक लागत में लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक की भारी कमी लाई जा सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि कौवे इंसानी सफाईकर्मियों की तुलना में बहुत अधिक फुर्तीले होते हैं और वे उन संकरी नालियों, दीवारों की दरारों और छिपे हुए स्थानों तक चंद मिनटों में पहुंच सकते हैं जहां इंसानों को पहुंचने में घंटों का समय लग सकता है।
यद्यपि इस अनूठे प्रयोग को वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक सराहना मिली और इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना गया, परंतु इसके साथ ही इस पर कई गंभीर सवाल और आपत्तियां भी दर्ज की गईं। अनेक पशु प्रेमियों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने कौवों के स्वास्थ्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका तर्क था कि सिगरेट के इन टुकड़ों में अत्यधिक जहरीले हानिकारक तत्व और भारी धातुएं पाई जाती हैं। जब बेजुबान पक्षी इन अवशेषों को अपनी चोंच में दबाएंगे, तो वे विषैले तत्व उनके शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे उनकी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है और उनकी अकाल मृत्यु भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त, इस प्रयोग के नैतिक पक्ष पर भी व्यापक बहस छिड़ गई। समाज के एक बड़े वर्ग का मानना था कि मनुष्यों द्वारा फैलाई गई गंदगी और लापरवाही का खामियाजा बेजुबान जीवों को क्यों भुगतना चाहिए। इंसानों के कचरे को साफ करने की जिम्मेदारी पक्षियों पर डालना नैतिक रूप से कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। विभिन्न मंचों और सामाजिक विमर्श में भी इस विषय पर तीखे मतभेद देखने को मिले, जहां कुछ लोगों ने इसे तकनीकी प्रगति कहा, तो वहीं दूसरों ने इसे बेजुबान पशु पक्षियों के अप्रत्यक्ष शोषण की संज्ञा दी।
इन तमाम विवादों और व्यावहारिक कठिनाइयों के बीच यह तथ्य भी सामने आया कि यह संपूर्ण परियोजना केवल एक प्रारंभिक और प्रायोगिक स्तर तक ही सीमित रही। इसे कभी भी सोडरटालिये शहर के बड़े हिस्सों या पूरे स्वीडन में पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। कुछ स्वतंत्र प्रतिवेदनों में यह भी संकेत दिया गया कि स्थानीय नगर प्रशासन ने भविष्य में इस योजना को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय या प्रशासनिक सहयोग जारी नहीं रखा। इसके बावजूद, इस प्रयोग ने दुनिया भर के विचारकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि किस प्रकार आधुनिक तकनीक और पशु व्यवहार विज्ञान के समन्वय से पर्यावरण की गंभीर चुनौतियों के नए विकल्प तलाशे जा सकते हैं। यह प्रयोग वैश्विक समाज के समक्ष एक अत्यंत चुभता हुआ और महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न भी छोड़ जाता है। यदि हम अपनी वैज्ञानिक विधाओं के बल पर आकाश में उड़ने वाले कौवों को कचरा उठाकर एक निश्चित स्थान पर डालना सिखा सकते हैं, तो हम इंसानों को सड़कों पर कचरा न फैलाने की बुनियादी आदत क्यों नहीं सिखा पाते। वास्तव में इस पूरी समस्या की जड़ नगर प्रशासनों की कमी या उपकरणों का अभाव नहीं है, बल्कि स्वयं मनुष्यों की घोर लापरवाही और नागरिक चेतना का शून्य होना है। यदि प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर कचरा और सिगरेट के टुकड़े फेंकना बंद कर दे, तो हमें किसी भी शहर को साफ रखने के लिए बेजुबान पक्षियों या जटिल स्वचालित यंत्रों की सहायता लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। स्वीडन का यह प्रयोग मानव इतिहास में हमेशा एक ऐसी अनोखी मिसाल के रूप में याद किया जाएगा जिसने यह प्रमाणित किया कि प्रकृति का प्रत्येक जीव केवल मूकदर्शक नहीं है, बल्कि यदि मनुष्य अपनी हठधर्मिता छोड़े, तो वे हमारी कई समस्याओं के समाधान में हमारे सबसे बड़े सहयोगी बन सकते हैं।

