‘समाजसेवी’ का चोला और सफेदपोश पाखंड का काला सच
राष्ट्र संवाद संवाददाता
मुंबई (इंद्र यादव) आज के दौर में ‘समाजसेवी’ शब्द सम्मान का कम और संदेह का प्रतीक ज्यादा बन गया है। गली-कूचों से लेकर सोशल मीडिया के गलियारों तक, सफेद कुर्ता पहने और चेहरे पर बनावटी मुस्कान लिए ‘समाजसेवियों’ की एक ऐसी फौज खड़ी हो गई है, जिनका समाज से कोई लेना-देना नहीं है, बल्कि उनका असली मकसद सिर्फ़ ‘स्व-सेवा’ है।
वेश्यावृत्ति का दलदल और तथाकथित मसीहा
एक कड़वा सच यह है कि हमारे समाज के सबसे अंधेरे कोनों में, जहाँ मजबूर बेटियों को धोखे से, गरीबी से या डरा-धमकाकर देह व्यापार के दलदल में धकेला जाता है, वहाँ ये ‘समाजसेवी’ कभी नजर नहीं आते। वेश्यावृत्ति की मंडियों में जब मासूम जिंदगियां नीलाम होती हैं, तब इन सफेदपोशों की नैतिकता सो जाती है। क्या कभी किसी बड़े ‘समाजसेवी’ ने उन बड़े माफियाओं के खिलाफ मोर्चा खोला है जो इंसानों की तस्करी करते हैं? जवाब है— नहीं। क्योंकि वहाँ जान का खतरा है और फोटो खिंचवाने के लिए सुंदर बैकग्राउंड नहीं मिलता।
फुटपाथ के बेघर बनाम एयरकंडीशंड दफ्तर
सर्द रातों में जब फुटपाथ पर कोई बुजुर्ग ठिठुर कर दम तोड़ देता है, तब ये समाजसेवी अपने गरम बिस्तरों में ‘गरीबी हटाओ’ के प्रोजेक्ट लिख रहे होते हैं। इनके पास करोड़ों का फंड आता है, लेकिन वह पैसा फुटपाथ पर रहने वालों तक पहुँचने से पहले दफ्तरों के रिनोवेशन और बड़ी गाड़ियों के डीजल में खर्च हो जाता है। ये समाजसेवी तभी दिखते हैं जब हाथ में पाँच रुपये का कंबल हो और साथ में दस कैमरामैन हों। बिना कैमरे के की गई मदद इन्हें ‘अधूरी’ लगती है।
नशे की दुकानें और मौन सहमति
देश की युवा पीढ़ी को खोखला करने वाले नशे के सौदागर आज हर शहर के कोने-कोने में अपनी दुकान सजाए बैठे हैं। शराब से लेकर सिंथेटिक ड्रग्स तक, पीढ़ियां बर्बाद हो रही हैं। लेकिन ताज्जुब की बात है कि नशे के खिलाफ बड़े-बड़े भाषण देने वाले इन समाजसेवियों की हिम्मत कभी उन दुकानों के सामने प्रदर्शन करने की नहीं होती। आखिर क्यों? क्योंकि उन दुकानों के पीछे अक्सर वही रसूखदार लोग होते हैं, जिनके साथ ये समाजसेवी शाम को चाय पीते हैं या जिनसे अपनी एनजीओ (NGO) के लिए चंदा वसूलते हैं।
एक गहरा षड्यंत्र
यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है। ‘समाजसेवा’ अब सेवा नहीं, बल्कि एक बिजनेस मॉडल बन चुकी है।
दिखावा: केवल उन मुद्दों को उठाना जो चर्चा में हों।
सेफ जोन: कभी भी ताकतवर माफिया या सिस्टम से सीधी टक्कर न लेना।
फंडिंग का खेल: समाज के दर्द को बाजार में बेचकर विदेशी और सरकारी फंड डकारना।
जो समाजसेवी वेश्यावृत्ति के दलदल में सिसकती औरतों की आवाज न बन सके, जो नशे की दुकानों के सामने खड़ा न हो सके और जिसे केवल कैमरे के सामने ही गरीबों का दर्द महसूस हो, वह समाजसेवी नहीं बल्कि ‘समाज का परजीवी’ है। वक्त आ गया है कि हम इन सफेदपोश ठगों के चेहरे से नकाब उतारें और असली सेवा को पहचानें जो बिना शोर-शराबे और स्वार्थ के की जाती है।

