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    Home » सुलगता समाज, बंटता देश: कब टूटेगी जाति की जंजीर !
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    सुलगता समाज, बंटता देश: कब टूटेगी जाति की जंजीर !

    Devanand SinghBy Devanand SinghMarch 19, 2026No Comments3 Mins Read
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    सुलगता समाज
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    सुलगता समाज, बंटता देश: कब टूटेगी जाति की जंजीर !
    राष्ट्र संवाद
    मुंबई (इंद्र यादव) यह एक कड़वा सच है कि जिसे हम ‘परंपरा’ मानकर ढो रहे हैं, वह असल में समाज की नसों में फैला हुआ ‘जातिगत जहर’ है। यह जहर धीरे-धीरे हमारे भाईचारे और तरक्की को खत्म कर रहा है।
    जातिवाद: एक सामाजिक जहर जो हमें अंदर से खोखला कर रहा है

    पहचान का भ्रम और ‘ऊंच-नीच’ की दीवार

    इंसान की पहचान उसके काम, व्यवहार और योग्यता से होनी चाहिए। लेकिन जातिवाद ने हमें जन्म के आधार पर खानों में बांट दिया है। यह जहर हमें सिखाता है कि कोई ‘ऊंचा’ है और कोई ‘नीचा’। जब मन में यह ऊंच-नीच बैठ जाती है, तो इंसानियत मर जाती है और सिर्फ अहंकार या हीन भावना बचती है।

    रिश्तों में दरार और नफरत की खेती

    जातिवाद का जहर सबसे पहले हमारे रिश्तों पर हमला करता है। आज भी कई गांवों और शहरों में लोग एक-दूसरे के साथ खाने-पीने या मेलजोल रखने से कतराते हैं। यह ‘दूरी’ समाज को एकजुट नहीं होने देती। जब हम एक-दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं, तो देश की एकता कमजोर होती है।

    युवाओं का भटकना: डिजिटल युग में पुरानी बेड़ियाँ

    आज के दौर में युवाओं को तकनीक, विज्ञान और नए बिजनेस की बातें करनी चाहिए। लेकिन सोशल मीडिया पर हम देखते हैं कि युवा अपनी ‘जाति का झंडा’ बुलंद करने में लगे हैं। दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी जाति को श्रेष्ठ बताना एक मानसिक बीमारी की तरह फैल रहा है। यह जहर युवाओं की रचनात्मक ऊर्जा को बर्बाद कर रहा है।

    तरक्की का सबसे बड़ा दुश्मन

    सोचिए, अगर किसी टीम में खिलाड़ी को उसकी काबिलियत के बजाय उसकी जाति देखकर चुना जाए, तो क्या वह टीम कभी जीत पाएगी? बिल्कुल नहीं। यही हमारे समाज के साथ हो रहा है। जब नौकरियों, व्यापार और राजनीति में योग्यता (Talent) की जगह जाति को महत्व दिया जाता है, तो देश पिछड़ जाता है।

    डर और असुरक्षा का माहौल

    जातिवाद के कारण समाज का एक बड़ा हिस्सा हमेशा डर और अपमान में जीता है। जब किसी के साथ सिर्फ उसकी जाति की वजह से भेदभाव होता है, तो उसके मन में समाज के प्रति गुस्सा और नफरत पैदा होती है। यही गुस्सा आगे चलकर हिंसा और झगड़ों का रूप ले लेता है।

    इस जहर का ‘एंटीडोट’ (इलाज) क्या है

    इस जहर को खत्म करने के लिए हमें किसी चमत्कार का इंतज़ार नहीं करना है, बल्कि खुद छोटे कदम उठाने होंगे.
    सोच बदलें: बच्चों को सिखाएं कि दुनिया में सिर्फ दो ही जातियां हैं—एक ‘अच्छे इंसान’ और दूसरे ‘बुरे इंसान’।
    दूरी मिटाएं: साथ बैठकर खाना खाने, त्यौहार मनाने और सुख-दुख साझा करने से जाति की दीवारें गिरती हैं।
    योग्यता का सम्मान: जाति के बजाय इंसान की मेहनत और उसके हुनर को अहमियत दें।
    राजनीति से दूरी: उन नेताओं को नकारें जो धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगते हैं और विकास की बात नहीं करते।

    परिणाम: जातिवाद वह दीमक है जो उस घर को खा जाता है जिसमें वह रहता है। यदि हमें एक मजबूत और आधुनिक भारत बनाना है, तो इस ‘जातिगत जहर’ की शीशी को फेंककर ‘इंसानियत’ का अमृत अपनाना होगा।

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