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    Home » उजागर रातों की कविता: अस्तित्व और मौन का संवाद
    राष्ट्रीय संपादकीय साहित्य

    उजागर रातों की कविता: अस्तित्व और मौन का संवाद

    Devanand SinghBy Devanand SinghFebruary 16, 2026No Comments2 Mins Read
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    उजागर रातों की कविता
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    उजागर रातों की कविता
    ​————————————–

    ​आज मुझे जागते रहने दो
    उस मद्धम चीख के साथ
    रेलगाड़ी में सवार हो
    मेरी अपलक आँखों के सामने से
    इस रात को गुजर जाने दो।
    ​आज मुझे अंधेरे में बैठे रहने दो
    दीयों को बुझाकर तारों को
    आसमान की गोद में सो जाने दो
    रोशनी को आज दूर ही रहने दो।
    ​आज सन्नाटे को भी चुपचाप रहने दो
    शब्दों को मौन ही रहने दो
    परिंदों से कहो कि आज प्रहर भूल जाएँ
    रात के फूलों को आज अपनी सुगंध समेट लेने दो।
    ​आज मुझे शून्य में तैरने दो
    विस्तार मेरा कालातीत हो जाने दो
    आज काल के रथ के पहिए को चार उँगल धँस जाने दो
    अजेय जानकर भी क्षण भर के लिए उसे विचलित हो जाने दो।
    ​आज मुझे अपनी साँसें उतार कर रख देने दो
    मेरे निष्पंद सीने में मौत को मर जाने दो
    आज जीने का ये भ्रम जीवनातीत हो जाने दो।
    ​आज नदियों को पत्थर पर काट दिया जाए
    इससे पहले कि वे बह निकलें
    आँसुओं को भाप बनकर उड़ जाने दो
    किसी सूखे कुएँ की तलहटी से गूँजने दो अनंत का
    एक स्तब्ध स्वर।
    ​आज रद्द हो जाए हर वापसी की यात्रा
    कदम हवा में ही लटके रह जाएँ
    अपनी ही उँगलियों की उलझन में फँस जाए
    हवा का हर कंपन।
    ​आज कुछ ऐसा हो जो कभी न हुआ हो
    कोई अनहोनी आज स्तब्ध कर दे
    काल के इस उद्दंड प्रवाह को
    ये रिक्त नैमित्तिकता विलीन हो जाए
    किसी दूसरी ही महाजगत में।
    ​आज मुझे जागते रहने दो
    मौन नीरवता में विलीन हो जाने दो चराचर विश्व को
    मेरी निद्रा-अनिद्रा, प्रकाश-अंधकार, शब्द-निशब्द
    जीवन-मृत्यु, अर्थ-अनर्थ, मेरी आकांक्षा-अनुराग
    मेरी स्थिरता-अस्थिरता, स्वप्न और स्वप्नहीनता।
    ​सबके ऊपर फैल जाने को
    अगणित अक्षौहिणी की अबाधित गति से
    तुम उतर आओ
    अकेले…
    ​तुम्हारे लिए रास्ता छोड़ दे
    पुरानी दुनिया की ये फटी हुई शामियाना
    ये म्लान और उदास आकाश।

     

    मनीषा शर्मा
    अनुवादक:– रितेश शर्मा
    पता- जलुकबाड़ी, गुवाहाटी

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