इस्लामाबाद धमाका: जब आग घर तक पहुँच जाए
देवानंद सिंह
इस्लामाबाद में हुआ आत्मघाती धमाका सिर्फ एक आतंकी वारदात नहीं है, यह पाकिस्तान की भीतर तक सड़ चुकी व्यवस्था, विफल सुरक्षा तंत्र और वर्षों से पाले गए आतंक के राक्षस का आईना है। मस्जिद के गेट पर सुसाइड डंपर से किया गया यह विस्फोट, जिसमें अब तक 70 लोगों की मौत और 250 से अधिक के घायल होने की पुष्टि हो चुकी है, यह साफ संकेत देता है कि पाकिस्तान आज खुद अपने ही बनाए दलदल में धंस चुका है। मृतकों और घायलों की संख्या अभी और बढ़ सकती है, लेकिन उससे पहले जो बढ़ चुका है वह है पूरे देश में फैली दहशत।

धमाके के बाद सिर्फ इस्लामाबाद नहीं, पूरा पाकिस्तान रेड अलर्ट पर है। सुरक्षा एजेंसियां मौके पर पहुँच चुकी हैं, बयान जारी हो रहे हैं, और वही पुराना रटा-रटाया वाक्य दोहराया जा रहा है “किसी को भी किसी की जान लेने की इजाजत नहीं दी जाएगी।” सवाल यह है कि क्या आतंकी किसी से इजाजत लेकर हमला करते हैं? और अगर नहीं, तो फिर ऐसे खोखले बयान किसे दिलासा देने के लिए हैं?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि पाकिस्तानी मीडिया ने इस भयावह हमले को करीब डेढ़ से दो घंटे तक दबाए रखा। जबकि उसी दौरान अंतरराष्ट्रीय मीडिया और कुछ पाकिस्तानी पत्रकार सोशल मीडिया व विदेशी चैनलों पर घटना की भयावह सच्चाई बता रहे थे। आखिर ऐसा क्यों?
क्या यह सिर्फ “जिम्मेदार पत्रकारिता” का नाम लेकर सच्चाई छुपाने की कोशिश थी, या फिर सत्ता और फौज के दबाव में मीडिया को चुप रहना पड़ा?
पाकिस्तान में यह कोई नई बात नहीं है। जब भी कोई घटना सेना, ISI या सरकार की नाकामी को उजागर करती है, सबसे पहले मीडिया को नियंत्रित किया जाता है। सूचना प्रवाह रोका जाता है, ताकि गुस्सा सड़कों पर न उतरे और सवाल सीधे सत्ता के दरवाजे तक न पहुँचें। लेकिन आज का पाकिस्तान 90 के दशक का पाकिस्तान नहीं है। सोशल मीडिया, स्वतंत्र पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मंच पर बैठे पाकिस्तानी आवाज़ें अब उस पर्दे को बार-बार फाड़ रही हैं।
जो बोया था, वही काट रहे हैं
पाकिस्तान दशकों तक आतंकवाद को “रणनीतिक हथियार” की तरह इस्तेमाल करता रहा। पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाने, कश्मीर जैसे मुद्दों को जिंदा रखने और अंतरराष्ट्रीय सौदेबाज़ी में अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए उसने आतंकी संगठनों को पनपने दिया, उन्हें प्रशिक्षण दिया, फंडिंग की, और वैचारिक खाद दी।
आज वही संगठन, वही मानसिकता, वही हिंसा पाकिस्तान के भीतर लौट आई है।
अब हालत यह है कि आतंकी किसी सीमा की परवाह नहीं कर रहे मस्जिद, बाजार, सेना, पुलिस, आम नागरिक सब निशाने पर हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पाकिस्तान ने जिन संगठनों को कभी रिमोट कंट्रोल से चलाने की कोशिश की थी, वे अब उसके हाथ से पूरी तरह निकल चुके हैं।
मस्जिद जैसे धार्मिक स्थल पर फिदायीन हमला इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पाकिस्तान की कानून व्यवस्था लगभग ध्वस्त हो चुकी है। जब नमाज़ अदा करते लोग भी सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक खुद को कहाँ सुरक्षित माने?
यह हमला सिर्फ जान-माल का नुकसान नहीं है, यह उस सामाजिक ताने-बाने पर भी हमला है जिसे पाकिस्तान बार-बार “इस्लामी राष्ट्र” के नाम पर पेश करता रहा है।
सांप्रदायिक नफरत की आग शिया को काफिर कहे जाने की मानसिकता, अल्पसंख्यकों पर हमले, और कट्टरपंथ का महिमामंडन आज उसी राष्ट्र को निगलने लगी है। एक ऐसी पीढ़ी तैयार की गई, जिसे शिक्षा, विज्ञान, विकास से ज्यादा नफरत और जिहाद के नारे सिखाए गए। नतीजा सामने है।
सबसे बड़ा सवाल यही उठता है क्या पाकिस्तानी एजेंसियों को इस हमले की कोई भनक नहीं थी? और अगर थी, तो उन्होंने क्या कदम उठाए?
इस्लामाबाद जैसे हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में, मस्जिद के गेट तक एक सुसाइड डंपर पहुँचना, यह महज़ चूक नहीं हो सकती। यह या तो घोर अक्षमता है या फिर अंदरूनी सड़ांध का नतीजा।
आज पाकिस्तान भारत की चिंता में जितनी ऊर्जा लगाता है, उतनी अपने नागरिकों की सुरक्षा में क्यों नहीं? भारत-विरोधी बयानबाज़ी से न तो विस्फोट रुकते हैं और न ही लाशें कम होती हैं। हकीकत यह है कि पाकिस्तान की एजेंसियां इस समय कई मोर्चों पर फेल हैं आतंकवाद, बलूच विद्रोह, आर्थिक संकट और जनता का गुस्सा।
बलूचिस्तान पहले से ही पाकिस्तान के लिए सिरदर्द बना हुआ है। वहाँ सेना के जवान लड़ने में झिझक रहे हैं, क्योंकि यह सिर्फ सुरक्षा ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और नैतिक संकट बन चुका है।
अब जब आतंकी हमले दिल-ए-पाकिस्तान यानी इस्लामाबाद तक पहुँच गए हैं, तो यह मान लेना गलत नहीं होगा कि आग अब चारदीवारी के भीतर है।
इन सबके बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है जनरल असीम मुनीर कहाँ हैं?
जिस पाकिस्तान में सेना हर मुद्दे पर आगे आकर बयान देती है, वहाँ इस खामोशी को लोग कमजोरी के तौर पर देख रहे हैं। क्या यह मान लिया जाए कि मुनीर का दौर ढलान पर है?
जनता सवाल पूछ रही है, और जब जनता सवाल पूछने लगे, तो किसी भी सत्ता के लिए वह सबसे खतरनाक मोड़ होता है।
इस्लामाबाद धमाका एक चेतावनी है सिर्फ पाकिस्तान के लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए जो यह मानते हैं कि आतंकवाद को पालकर, पोसकर और दिशा देकर इस्तेमाल किया जा सकता है।
आतंक कभी वफादार नहीं होता। वह अंततः उसी को निगलता है जिसने उसे जन्म दिया।
आज पाकिस्तान खुद खतरे में है अपने ही हाथों से बनाए गए खतरों से। सवाल यह नहीं है कि अगला धमाका कहाँ होगा, सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अब भी सच्चाई का सामना करने का साहस जुटा पाएगा, या फिर हर बार की तरह मीडिया की चुप्पी, खोखले बयानों और सेना की परछाई में सच को दबाता रहेगा।

