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    सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि

    Sponsored By: सोना देवी यूनिवर्सिटीJanuary 2, 2026No Comments6 Mins Read
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    सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2025 में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा करना एक ऐतिहासिक उपलब्धि
    देवानंद सिंह
    भारतीय न्यायपालिका को अक्सर लंबित मामलों, देरी और बोझ के लिए आलोचना का सामना करना पड़ता है। लेकिन यदि हम केवल आंकड़ों के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन करें, तो भारत की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2025 में जो कार्य किया है, वह न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि वैश्विक न्यायिक परिदृश्य में एक असाधारण उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए। एक ही वर्ष में 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा ऐसी संख्या है, जिसकी कल्पना करना भी दुनिया की कई विकसित लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की सर्वोच्च अदालतों के लिए संभव नहीं है।

     

     

    यह सही है कि भारत की विशाल जनसंख्या के संदर्भ में यह संख्या बहुत बड़ी प्रतीत न हो, लेकिन न्यायिक क्षमता का आकलन केवल जनसंख्या से नहीं, बल्कि जनसंख्या और न्यायाधीशों के अनुपात, उपलब्ध संसाधनों और कार्यभार के तुलनात्मक विश्लेषण से किया जाना चाहिए। जब इस दृष्टि से देखा जाए, तो भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट दुनिया के लिए एक मिसाल बनकर उभरती है।

     

     

    यदि, हम अमेरिका की सर्वोच्च अदालत से तुलना करें, तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में हर साल हजारों याचिकाएं दाखिल होती हैं, लेकिन उनमें से केवल 70 से 80 मामलों को ही पूर्ण सुनवाई के लिए स्वीकार किया जाता है। शेष मामलों को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया जाता है। वहां अदालत का मुख्य फोकस संवैधानिक व्याख्या और मिसाल कायम करने वाले मामलों पर होता है।

    ब्रिटेन की सुप्रीम कोर्ट का उदाहरण भी कुछ ऐसा ही है। वर्ष 2024 में, 29 दिसंबर तक, यूके सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लगभग 200 से कुछ अधिक मामले आए, जिनमें से महज 50 के आसपास मामलों में ही अंतिम निर्णय दिया गया। यानी वहां भी न्यायिक हस्तक्षेप अत्यंत चयनात्मक है। इसके विपरीत, भारत का सुप्रीम कोर्ट न केवल संवैधानिक मामलों की सुनवाई करता है, बल्कि अपीलों, विशेष अनुमति याचिकाओं, जनहित याचिकाओं, आपराधिक और दीवानी मामलों के व्यापक दायरे को भी संभालता है। वर्ष 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने करीब 1,400 महत्वपूर्ण फैसले सुनाए और हजारों आदेश पारित कर मामलों का निपटारा किया। यह अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि न्यायिक दर्शन और जिम्मेदारी के विस्तार का भी है। भारतीय न्यायपालिका की सबसे बड़ी चुनौती जजों की भारी कमी है। वर्तमान में भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 21 न्यायाधीश उपलब्ध हैं, जो कि दुनिया में सबसे कम अनुपातों में से एक है। इसकी तुलना में अमेरिका में समान जनसंख्या पर लगभग 150 जज कार्यरत हैं।

     

     

    विडंबना यह है कि यह समस्या नई नहीं है। विधि आयोग ने वर्ष 1987 में ही सिफारिश की थी कि भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर कम से कम 50 जज होने चाहिए। यह संख्या भी अमेरिका जैसे देशों की तुलना में मात्र एक-तिहाई ही होती। इसके बावजूद, दशकों बाद भी स्थिति में कोई क्रांतिकारी सुधार नहीं हुआ।
    यह स्थिति केवल निचली अदालतों या हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में भी यही संकट दिखाई देता है। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 है, जिसे 2019 में बढ़ाया गया था। यदि भारत की जनसंख्या को लगभग 150 करोड़ मान लिया जाए, तो इसका अर्थ यह है कि औसतन 4.5 करोड़ लोगों पर सुप्रीम कोर्ट में केवल एक न्यायाधीश है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अनुपात चिंताजनक ही नहीं, बल्कि खतरनाक भी कहा जा सकता है।

    इन तमाम सीमाओं के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट जिस दक्षता से काम कर रहा है, वह उसकी संस्थागत प्रतिबद्धता, न्यायाधीशों की कार्यक्षमता और न्याय तक पहुंच के प्रति उसकी गंभीरता को दर्शाता है। सीमित संख्या में जज, बढ़ते मामलों का बोझ, जटिल कानूनी ढांचा और सामाजिक विविधता, इन सबके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में मामलों का निपटारा भारतीय न्यायपालिका की मजबूती का प्रमाण है।

     

    पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ भी यह स्वीकार कर चुके हैं कि न्यायपालिका की मौजूदा चुनौतियों का स्थायी समाधान केवल एक है। जजों की संख्या में सीधी और ठोस वृद्धि। उनके शब्दों में, “हमें और ज्यादा जजों की आवश्यकता है और हम इस दिशा में सरकार के साथ निरंतर संवाद में हैं।” यह बयान न्यायपालिका की आत्मस्वीकृति भी है और सरकार के लिए एक स्पष्ट संकेत भी। इसी पृष्ठभूमि में हाल ही में आयोजित ‘एक्सप्लोरिंग द एफिशिएंसी एंड रीच ऑफ मीडिएशन’ नामक राष्ट्रीय सम्मेलन में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का बयान अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि बढ़ते मुकदमों के पारंपरिक समाधान अब पर्याप्त नहीं हैं और न्याय प्रणाली को नए, व्यवहारिक विकल्पों की ओर देखना होगा। उनके अनुसार, मीडिएशन (मध्यस्थता) ऐसा ही एक प्रभावी तरीका है।

    मीडिएशन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें दोनों पक्षों को आपसी सहमति से समाधान निकालने का अवसर मिलता है। यह प्रक्रिया न केवल समय और धन की बचत करती है, बल्कि रिश्तों को पूरी तरह टूटने से भी बचाती है। अदालतों में वर्षों तक चलने वाली कानूनी लड़ाई के बजाय, मीडिएशन संवाद और समझौते को प्राथमिकता देता है। देश के अनेक वरिष्ठ कानूनविद् भी इस मत से सहमत हैं कि यदि मीडिएशन को संस्थागत रूप से मजबूत किया जाए, तो न्यायपालिका पर बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेष रूप से दीवानी, पारिवारिक, वाणिज्यिक और श्रम विवादों में मीडिएशन अत्यंत प्रभावी सिद्ध हो सकता है।

     

     

    भारतीय सुप्रीम कोर्ट की एक खास विशेषता यह है कि वह न्याय तक पहुंच को अत्यधिक व्यापक रूप में परिभाषित करता है। जनहित याचिकाएं, स्वतः संज्ञान  और विशेष अनुमति याचिकाएं इसी सोच का परिणाम हैं। लेकिन यही विशेषता समय के साथ न्यायिक अति-भार का कारण भी बनती जा रही है। सवाल यह नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट काम नहीं कर रहा—सवाल यह है कि क्या वह जरूरत से ज्यादा काम कर रहा है? क्या हर विवाद का अंतिम समाधान सुप्रीम कोर्ट में ही होना चाहिए? क्या हाई कोर्ट और निचली अदालतों को और सशक्त नहीं बनाया जाना चाहिए?
    इन प्रश्नों का उत्तर केवल न्यायपालिका नहीं, बल्कि सरकार, विधायिका और समाज, तीनों को मिलकर देना होगा। भारतीय न्यायपालिका आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां उसकी उपलब्धियां भी ऐतिहासिक हैं और चुनौतियां भी गंभीर। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 75,000 से अधिक मामलों का निपटारा यह साबित करता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद संस्थागत इच्छाशक्ति क्या कर सकती है, लेकिन यह भी स्पष्ट है कि यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है। आवश्यक है कि सभी स्तरों पर जजों की संख्या में त्वरित और पर्याप्त वृद्धि की जाए, मीडिएशन और वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को मुख्यधारा में लाया जाए। हाई कोर्ट और निचली अदालतों को अधिक अधिकार और संसाधन दिए जाएं। सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को अधिक रणनीतिक और संवैधानिक मामलों तक सीमित करने पर गंभीर विमर्श हो। यदि, इन सुधारों को समय रहते लागू नहीं किया गया, तो आज जो उपलब्धि गर्व का विषय है, वह कल प्रणालीगत थकान का कारण बन सकती है।

     

     

    कुल मिलाकर, भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने यह सिद्ध कर दिया है कि सीमित संसाधनों में भी असाधारण परिणाम संभव हैं। अब जिम्मेदारी सरकार और नीति-निर्माताओं की है कि वे इस संस्थागत क्षमता को स्थायी मजबूती प्रदान करें। न्याय केवल तेज़ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि टिकाऊ और संतुलित भी होना चाहिए, यही भारतीय लोकतंत्र की असली कसौटी है।

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