__स्मृति शेष__
प्रेरणा स्रोत बाबूजी श्रद्धेय रामेश्वर राय को विनम्र श्रद्धांजलि
आज अभिभावक बाबूजी और अभिभावक सदृश कौशल किशोर सिंह दोनों ही स्मृति शेष हैं, पर उनका स्वप्न राष्ट्र संवाद के रूप में जीवित है
देवानंद सिंह
“हम अथक – निडर चल रहे हैं लेखनी की मशाल लिए,
आपसे मिले हौसले ने मुझे कभी रुकने नहीं दिया,”
हमारे पूज्य बाबूजी, राष्ट्र संवाद के प्रेरणा स्रोत, श्रद्धेय रामेश्वर राय की पुण्यतिथि पर राष्ट्र संवाद परिवार कृतज्ञता, श्रद्धा और संकल्प के साथ उन्हें नमन करता है। समय अपनी गति और प्रवृत्ति के अनुसार आगे बढ़ता चला जाता है पर हमारे अभिभावकों का आशीर्वाद एक मजबूत सुरक्षा कवच की तरह जीवन पर्यंत हमें सहारा देता है। आज महसूस होता है कि बाबूजी का जीवन हम सभी के लिए केवल पारिवारिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक धरोहर की तरह था। उनका कर्मशील जीवन स्वयं में एक जीवंत मार्गदर्शिका रहा, जिसने न केवल हमें बल्कि अनेक लोगों को सही दिशा दिखाई।
बाबूजी का अटल विश्वास था कि पत्रकारिता केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज निर्माण की दिशा में एक महती जिम्मेदारी है। जब हिंदी दैनिक अखबार “आवाज” जमशेदपुर से बंद हुआ, तब निराशा के उस दौर में उन्होंने धैर्यपूर्वक समझाया “बेटा, कुछ ऐसा करो कि अपने साथ-साथ दूसरों को भी इस क्षेत्र में रोजगार मिले।” यह वाक्य मात्र सलाह नहीं थी, बल्कि जीवन भर की साधना और अनुभव से निकली एक वैचारिक पूंजी थी, जो आज राष्ट्र संवाद के रूप में साकार दिखाई देती है।
लगभग दो वर्षों के संघर्ष, असमंजस और आत्ममंथन के बाद पत्रिका के रूप में इस सपने को आकार दिया जा रहा था, उसी दौरान 31 दिसंबर 2002 की वह रात आई, जब बाबूजी का साया हम सबके सिर से उठ गया। अपने शिवनगर बेगूसराय पहुँचने पर उनका पहला प्रश्न “पत्रिका का विमोचन हो गया?” यह दर्शाता है कि अंतिम क्षणों तक उनका मन परिवार से ज्यादा इसी विचार और मिशन में रमा रहा, जिसे वे समाज के लिए आवश्यक मानते थे।

एक समाजसेवी अभिभावक कौशल किशोर सिंह के सहयोग से पत्रिका का काम पूरा हो चुका था, यह सुनकर बाबूजी के चेहरे पर संतोष था। दुर्भाग्यवश, ईश्वर को कुछ और ही स्वीकार था और वे उस विमोचन के साक्षी नहीं बन सके।
उस दिवस की घटना आज भी स्मृति पटल पर कौंधती है।
बाबूजी से रात्रि 8:00 बजे जब मैंने कहा कि “गाड़ी ठीक करते हैं और आपको लेकर चलते हैं।” पर शायद उन्हें इस जीवन यात्रा के समाप्त होने का पूर्वाभास हो चुका था और वे बड़े शांतता के साथ उमाकांत झा की ओर देखते हुए बोले कि “अब यहीं तक साथ था।”
आज अभिभावक बाबूजी और अभिभावक सदृश कौशल किशोर सिंह दोनों ही स्मृति शेष हैं, पर उनका स्वप्न राष्ट्र संवाद के रूप में जीवित है।
मासिक पत्रिका से साप्ताहिक, पाक्षिक और फिर दैनिक तक का सफर आसान नहीं रहा। यह यात्रा उलझनों, आर्थिक दबावों और सामाजिक चुनौतियों से भरा रहा, पर बाबूजी के कहे शब्द, उनके आदर्श और आशीर्वाद हर मोड़ पर संबल की तरह हमारे काम आया। कंटीले रास्तों पर चलते हुए, झंझावातों से दो-दो हाथ करते हुए भी यह समूह आगे बढ़ रहा है, यही सच्ची श्रद्धांजलि है।
श्रद्धेय बाबूजी, आपका जीवन, आपके विचार और आपकी सीख आज भी हमारा पथ आलोकित कर रहे हैं। राष्ट्र संवाद परिवार यह संकल्प दोहराता है कि हम सब आपकी सोच, आपकी सादगी और आपकी सामाजिक प्रतिबद्धता को अक्षुण्ण रखते हुए सत्य, साहस और जनपक्षधर पत्रकारिता की मशाल जलाए रखेंगे।
आप सदैव हमारे प्रेरणा स्रोत रहेंगे।
विनम्र श्रद्धांजलि।

