गुटबाजी और गणेश परिक्रमा में उलझी झारखंड बीजेपी, जमशेदपुर से लेकर प्रदेश तक संगठन की मजबूती पर सवाल भाग 01
फूलों की लाशों में ताजगी चाहता है….
आदमी बावला है, कुछ भी चाहता है…
(राहगीर)
राष्ट्र संवाद संवाददाता
रांची/जमशेदपुर।झारखंड भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) भले ही ऊपर से एकजुट नजर आती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। पार्टी के भीतर फैली गुटबाजी और “गणेश परिक्रमा” की राजनीति ने न सिर्फ संगठन को कमजोर किया है, बल्कि सत्ता तक पहुंचने की संभावनाओं को भी धुंधला कर दिया है।
प्रदेश स्तर पर बीजेपी कई गुटों में बंटी हुई दिखाई दे रही है। अलग-अलग नेताओं की अपनी कमान है, लेकिन संगठन पर मजबूत और स्पष्ट नियंत्रण का अभाव साफ नजर आता है। यही वजह है कि झारखंड में बीजेपी का संगठन धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जा रहा है। बड़े नेताओं के बीच भले ही सब कुछ सामान्य दिखे, लेकिन जिला स्तर पर हालात काफी गंभीर हैं।
जमशेदपुर और पूर्वी सिंहभूम जिले की स्थिति इस आंतरिक संकट की सबसे बड़ी मिसाल बनकर उभर रही है। सूत्रों के अनुसार, हाल ही में हुई रायशुमारी के दौरान एक बार फिर असंतोष खुलकर सामने आया है। चर्चा है कि जिला अध्यक्ष का पद दोबारा ऐसे व्यक्ति को सौंपे जाने की तैयारी है, जिस पर लंबे समय से “गणेश परिक्रमा” करने के आरोप लगते रहे हैं। इस संभावित फैसले से जमीनी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी है।
कार्यकर्ताओं का कहना है कि संगठन में मेहनत, संघर्ष और समर्पण के बजाय चाटुकारिता और गुट विशेष के प्रति नजदीकी को तरजीह दी जा रही है। इससे ईमानदार और सक्रिय कार्यकर्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं और उनका मनोबल लगातार गिर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर झारखंड बीजेपी को जमशेदपुर समेत पूरे राज्य में दोबारा मजबूत करना है, तो उसे सबसे पहले गुटबाजी और गणेश परिक्रमा की संस्कृति पर सख्ती से लगाम लगानी होगी। जब तक संगठन में पारदर्शिता, अनुशासन और जमीनी कार्यकर्ताओं को सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक पार्टी के लिए न तो संगठन मजबूत होगा और न ही सत्ता की सीढ़ी नजदीक आएगी।
अगले भाग में बंटी बबली की कहानी

