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    भारत की राजनीति का अपराधीकरण : आर.के. सिंह का इस्तीफा लोकतंत्र के लिए चेतावनी की घंटी

    News DeskBy News DeskNovember 17, 2025No Comments3 Mins Read
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    भारत की राजनीति का अपराधीकरण : आर.के. सिंह का इस्तीफा लोकतंत्र के लिए चेतावनी की घंटी
    इंदिरा यादव
    भारत की राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर पूर्व केंद्रीय मंत्री आर.के. सिंह का इस्तीफा एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या सच बोलना अब ‘एंटी-पार्टी’ गतिविधि माना जाने लगा है? पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने वाले आर.के. सिंह ने केवल इतना कहा कि मतदाता अपराधी पृष्ठभूमि वाले नेताओं को वोट न दें। उनकी यह अपील न केवल लोकतंत्र के हित में थी बल्कि समाज की सुरक्षा और राजनीतिक शुचिता का प्रश्न भी थी।

     

     

    आईएएस अधिकारी से केंद्रीय मंत्री तक का सफर तय कर चुके आर.के. सिंह प्रशासनिक ईमानदारी और कठोर कार्यशैली के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन जब उन्होंने राजनीति के अपराधीकरण पर आवाज उठाई, तो उन्हें शो-कॉज नोटिस और सस्पेंशन का सामना करना पड़ा। इससे बड़ा विडंबनापूर्ण संदेश क्या हो सकता है कि अपराधियों को टिकट देना “पार्टी लाइन” है लेकिन उनके खिलाफ बोलना “पार्टी विरोध”?

     

     

    आर.के. सिंह के मुताबिक यह बयान न तो किसी नेता के खिलाफ था और न ही किसी पार्टी के। उनका कहना था कि अपराधीकरण रोकना राष्ट्रहित में आवश्यक है। इसके बावजूद, उनके सुझावों को असहज करार दिया गया, जैसे राजनीति का अपराधीकरण अब व्यवस्था का हिस्सा बन चुका हो। यह वही भारत है जहाँ संसद और विधानसभाओं में कई जनप्रतिनिधियों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं—हत्या, बलात्कार, अपहरण, भ्रष्टाचार जैसे आरोपों तक के साथ।

     

     

    समाज के लिए यह स्थिति खतरनाक है। युवाओं के सामने गलत संदेश जाता है कि पढ़ाई और ईमानदारी नहीं, बल्कि मांसपेशियों और पैसे से सत्ता हासिल की जा सकती है। महिलाएँ उन नेताओं को चुनने पर मजबूर हैं जिन पर स्वयं गंभीर आरोप हैं। किसान, मजदूर, आम नागरिक—हर कोई इस विषैली राजनीति की कीमत चुका रहा है।

    आर.के. सिंह का इस्तीफ़ा एक चेतावनी है। एक चीख है कि लोकतंत्र का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ रहा है। लेकिन इसे सिर्फ एक व्यक्ति की लड़ाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह जनता की लड़ाई है—जिसे तय करना है कि वह अपराधियों को चुनकर सत्ता सौंपती है या ईमानदार नेतृत्व को मौका देती है।
    समाधान एक ही है—वोटरों की जागरूकता, चुनाव सुधार, टिकट वितरण में पारदर्शिता और अपराधी पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की कड़ी प्रतिरोध।

     

     

    आर.के. सिंह की आवाज को अनसुना करना आसान है, लेकिन उसके असर से बचना असंभव। अगर जनता अब भी चुप रही, तो ऐसे हर इस्तीफ़े से लोकतंत्र की जड़ों में एक और कील ठोक दी जाएगी।

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