आनंद सिंह की तीन चार लाईना
राष्ट्र संवाद संवाददाता
फकत रुठने और मनाने में,
खर्च होती जा रही है जिंदगी।
तुम्हारे मान जाने का मुझे,
कोई रास्ता अभी दिखता नहीं।
दागदार चंदा को देख कर,
मुंह पर क्रीम लगाने वालों।
दिल पर जो दाग लगा है,
उसे तुम कैसे छुड़ाओगे।
माना कि जिंदगी में दुश्वारियां हैं बहुत,
पर ये जो रंजोगम की स्याही पसरी है।
इसी से मीर, ‘मीर’ हो गए और गालिब ‘गालिब’,
जमाने से अभी उजियारा खत्म हुआ तो नहीं है।

