कविता
मेरे होंठों की
जलकर खत्म होती मटमैली रंग
जो बोलती है ,
वह बात झूठ नहीं ।
तुम ही हो
वह डांवाडोल
जो मेरी कविता में तुफानी मचाते हो ।
यह चाहत झूठी नहीं
यह अवाक स्वप्न ,
यह बेचैनी झूठी नहीं ।
झूठी नहीं तुम्हारी कदमों की आहट
झूठी नहीं लंबी रातो की ज़ज्बात
यह नाटक झूठ नही
यह उपलब्धि भी झूठ नही कि
जीवन है एक
अपार व्यर्थ विचार ।
बारिश की ये राते झूठे नहीं
आवेश का यूं उतार-चढ़ाव भी झूठ नहीं
यह सोच भी कतई झूठ नहीं कि
मैं हूं एक विध्वस्त नारी ।
लेखिका : मनीषा शर्मा
पता : जालूकबारी , गुवाहाटी
फोन न. : 7663026301

