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    Home » राधा की अष्टसखियां: ब्रज प्रेम का दिव्य स्वरूप
    धर्म मेहमान का पन्ना साहित्य

    राधा की अष्टसखियां: ब्रज प्रेम का दिव्य स्वरूप

    Nikunj GuptaBy Nikunj GuptaMay 24, 2026No Comments7 Mins Read
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    राधा की अष्टसखियां
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    लेखक: डाक्टर दीपक गोस्वामी

    शब्द राधे राधे अपने आप में अनन्य अनंत प्रेम की निधि है।जब किसी भक्त के शरीर पर बरसाना की रज लगती है तो रोम-रोम में एक ही नाम गूंजता है, राधे-राधे। ब्रज की माटी का कण-कण राधारानी की भक्ति से सना है और उसी भक्ति की अष्ट-धाराओं के रूप में ये आठ सखियाँ अनादिकाल से राधा जू की सेवा में लीन हैं।

    ऊँचा गाँव की ललिता सखी, जो राधारानी की परम प्रिय, उनकी अंतरंग सखी, मान की दूतिका, प्रेम की प्रथम आचार्या हैं। जिस दिन राधारानी का मान बढ़ता है उस दिन ललिता सखी ही श्रीकृष्ण को मनाकर लाती हैं। ललिता का अर्थ ही है जो क्रीड़ा में निपुण हो, और राधा-माधव की नित्य-निकुंज लीला का सम्पादन ललिता के संकेत बिना संभव नहीं। ऊँचा गाँव आज भी ऊँचा है क्योंकि वहाँ प्रेम की सबसे ऊँची अवस्था ने जन्म लिया।

    अंजलोक की विशाखा सखी तो राधारानी की ही छाया हैं। शास्त्र कहते हैं विशाखा का जन्म राधारानी के जन्म नक्षत्र में ही हुआ, रूप-गुण-वय में वे राधा के समान ही हैं। जब राधारानी के नेत्रों से अश्रु बहते हैं तो विशाखा ही उन्हें अंचल से पोंछती हैं, जब श्रीकृष्ण वंशी बजाते हैं तो विशाखा ही राधा को संकेत कर निकुंज तक ले जाती हैं। अंजलोक की भूमि पर आज भी वही अनुराग की सुगंध है जहाँ विशाखा ने राधा-प्रेम को जिया।

    करहपुर की चम्पकलता सखी, जिनके अंग से चम्पा की सुगंध आती है, जो राधारानी के श्रृंगार की अधिष्ठात्री हैं। केशों में गजरा, माँग में सिंदूर, हाथों में मेहंदी, चरणों में महावर, ये सब चम्पकलता के कोमल हाथों की देन है। वे जानती हैं कि राधारानी को कौन सा रंग प्रिय है, कौन सा पुष्प उनके जूड़े को शोभित करेगा। करहपुर की वायु में आज भी वह सेवा-भाव तैरता है जहाँ चम्पकलता ने अपने कर-कमलों से राधा को सजाया।

    चिकसौली की चित्रा सखी, जो चित्र-विद्या में प्रवीण, ज्योतिष और आयुर्वेद की ज्ञाता हैं। जब राधारानी के मन का चित्र कोई नहीं पढ़ पाता तब चित्रा सखी उसे पढ़ लेती हैं। वन में कौन सा कंद-मूल राधारानी के योग्य होगा, कौन सी जड़ी उनके स्वास्थ्य हेतु हितकारी होगी, यह सब चित्रा को ज्ञात है। चिकसौली के कण-कण में वह ममता बसी है जहाँ चित्रा ने राधा के तन-मन की सुधि ली।

    कमई गाँव की तुंगविद्या सखी, जो संगीत-नृत्य-काव्य की आचार्या, चौंसठ कलाओं में निपुण हैं। राधारानी के समक्ष जब श्रीकृष्ण मुरली बजाते हैं तो तुंगविद्या ही मृदंग पर थाप देती हैं, जब निकुंज में रास होता है तो तुंगविद्या ही गीत की ध्रुव-पंक्ति उठाती हैं। उनका ज्ञान इतना तुंग है कि देवांगनाएँ भी उनसे सीखने आती हैं। कमई गाँव की प्रतिध्वनि में आज भी वही राग-रागिनी बसती है।

    राँकोली की इन्दुलेखा सखी, जिनके हाथों में छहों ऋतुओं के पुष्प खिलते हैं, जो राधारानी के लिए माला गूँथती हैं, हार सजाती हैं, भूमि पर पुष्प-शय्या रचती हैं। इन्दुलेखा जानती हैं कि राधारानी के मान को कौन सा श्वेत कमल शांत करेगा, उनके प्रेम को कौन सा लाल गुलाब व्यक्त करेगा। राँकोली की माटी में आज भी वही रंग है, वही सुगंध है जो इन्दुलेखा के भाव से प्रकट हुई।

    डबारा गाँव की रंगदेवी सखी, जिनका नाम ही रंग है, जो राधारानी के चित्त को रंगों से भर देती हैं। वसंत में पलाश, वर्षा में कदम्ब, शरद में शेफाली, हेमंत में कुंद, ये सब रंगदेवी के संकेत पर खिलते हैं। वे राधारानी के वस्त्रों का रंग चुनती हैं, उनके कक्ष की रंगोली सजाती हैं, उनके प्रेम को इन्द्रधनुषी छटा देती हैं। डबारा गाँव में आज भी वही उत्सव का भाव है जहाँ रंगदेवी ने प्रेम को रंग दिया।

    सुनहरावन की सुदेवी सखी, जो सुंदरता की मूर्ति, सुगंध की खान, जो राधारानी के लिए इत्र बनाती हैं, उबटन तैयार करती हैं, केशों को सुवासित करती हैं। सुदेवी के पास वह कला है जिससे राधारानी के अंग-प्रत्यंग से दिव्य सुगंध प्रस्फुटित होती है, जिसकी एक झोंक से श्रीकृष्ण सुध-बुध खो बैठते हैं। सुनहरावन सचमुच सुनहरा है क्योंकि वहाँ सुदेवी का सेवा-भाव चमकता है।

    ये आठों सखियाँ कोई साधारण गोपी नहीं, ये राधारानी की कायव्यूह स्वरूपा हैं, उनकी आठों अंगभूता शक्तियाँ हैं। पुराण कहते हैं कि जैसे भगवान की अष्ट-महिषी होती हैं वैसे ही आह्लादिनी शक्ति राधारानी की अष्ट-सखी हैं। इनके बिना निकुंज-लीला अधूरी, इनके बिना मान-लीला अधूरी, इनके बिना रास अधूरा। श्रीबरसाना धाम के चारों ओर बसे इन आठ गाँवों में आज भी मन्दिर हैं, जन्म-स्थली हैं, सेवा-कुंज हैं। यहाँ की रज में लोटने से भाव-शुद्धि होती है, यहाँ की वायु में श्वास लेने से हृदय प्रेम से भर जाता है। इसीलिए वैदिक साहित्य में ब्रज-रज की महिमा गाई गई, भागवत में गोपी-प्रेम को सर्वोच्च बताया गया। ऋषि-मुनि भी जिस प्रेम के लिए तरसते हैं वह प्रेम इन सखियों ने अपनी सेवा से, अपने समर्पण से पाया।

    ब्रज की यात्रा केवल भूमि की यात्रा नहीं, भाव की यात्रा है। इसीलिए यहाँ आकर ऐश्वर्य दिखाना व्यर्थ है। जिसके पास प्रेम-धन है वही यहाँ का राजा है। यहाँ के कण-कण में श्रीकृष्ण हैं, यहाँ के पत्ते-पत्ते पर राधा नाम लिखा है। यहाँ आकर प्रपंच में पड़ना, झगड़े-झंझट में उलझना, अपनी ही हानि करना है। ब्रज तो दीनता की भूमि है, जहाँ दास बनकर ही स्वामिनी की कृपा मिलती है। ललिता-दास, विशाखा-दास, यही तो यहाँ की पहचान है। दान-दक्षिणा भी यहाँ दिखावे के लिए नहीं होती। गुप्त-दान ही यहाँ की रीति है, क्योंकि देने वाला भी वही है और लेने वाला भी वही। हम तो केवल निमित्त मात्र हैं। धन की शुद्धि तब है जब दाहिना हाथ दे और बाएँ हाथ को पता न चले। ब्रजवासी आज भी यही करते हैं, अतिथि को राधारानी का स्वरूप मानकर जिमाते हैं, संत को ठाकुर मानकर सेवा करते हैं।

    जन-जन की आस्था इन गाँवों से जुड़ी है क्योंकि यहाँ की हर लीला लोक-कल्याण के लिए है। ललिता का मान-मनौवल हमें सिखाता है कि प्रेम में मान भी होता है और मनुहार भी। विशाखा की सख्य-भक्ति बताती है कि मित्रता में तन-मन-धन सब अर्पण होता है। चम्पकलता का श्रृंगार कहता है कि तन की शोभा मन की पवित्रता से है। चित्रा का ज्ञान दर्शाता है कि विद्या वही जो सेवा में लगे। तुंगविद्या का संगीत समझाता है कि कला वही जो प्रभु को रिझाए। इन्दुलेखा के पुष्प बोलते हैं कि सुंदरता वही जो चरणों में चढ़े। रंगदेवी के रंग कहते हैं कि जीवन उत्सव है यदि राधा-नाम संग हो। सुदेवी की सुगंध सिखाती है कि चरित्र की सुवास सबसे बड़ी है।

    आज का मनुष्य भाग रहा है, पर कहाँ पहुँच रहा है यह नहीं जानता। उसे शांति चाहिए, पर शांति के धाम ब्रज से दूर भाग रहा है। इन आठ गाँवों की परिक्रमा केवल पगों से नहीं, हृदय से होती है। जब मन ऊँचा गाँव सा ऊँचा हो जाए, जब दृष्टि अंजलोक सी अंजलि भर प्रेम ले ले, जब कर्म करहपुर सा सुगंधित हो जाए, जब बुद्धि चिकसौली सी चित्र-ग्राहिणी हो जाए, जब विद्या कमई सी तुंग हो जाए, जब जीवन राँकोली सा इन्दु-शीतल हो जाए, जब भाव डबारा सा रंगीन हो जाए, जब चरित्र सुनहरावन सा सुनहरा हो जाए, तब समझो कि अष्ट-सखी की कृपा हो गई।

    इस कलियुग में जहाँ संबंध स्वार्थ से बँधे हैं वहाँ ये सखियाँ निःस्वार्थ प्रेम का आदर्श हैं। इनकी कथा सुनना ही सत्संग है, इनके गाँव की रज माथे लगाना ही तीर्थ है, इनके भाव को धारण करना ही भक्ति है। समय निकालकर, सब काम छोड़कर, एक बार इन गाँवों में आना, यहाँ की सीढ़ियों पर बैठना, यहाँ की गायों को सहलाना, यहाँ के बालकों से राधे-राधे सुनना। तब देखना कि मन कैसे भर आता है, आँखें कैसे बरस पड़ती हैं, वाणी कैसे केवल राधा-नाम ही बोलती है।

    हे राधारानी, आपकी इन अष्ट-सखियों की चरण-रज मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाए। ललिता की दृढ़ता, विशाखा की ममता, चम्पकलता की सेवा, चित्रा की मधुरता, तुंगविद्या की निपुणता, इन्दुलेखा की कोमलता, रंगदेवी की उमंग, सुदेवी की पवित्रता, ये आठों भाव हमारे हृदय में बस जाएँ। ब्रज की यह संस्कृति, यह आस्था, यह प्रेम-धारा युगों-युगों तक बहती रहे, और हर जीव आपकी शरण में आकर कृतार्थ हो जाए। राधे-राधे, राधे-राधे, राधे-राधे।

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