दुर्गा पूजा में भीड़ का मेला, आस्था से लेकर राजनीति और अर्थव्यवस्था तक
पूजा का असली धर्मार्थ पक्ष पीछे छूट रहा है, आगे आ रहा है सिर्फ प्रचार और लोकप्रियता।
युवा वर्ग की मानसिकता, “चलो पंडाल देखने चलते हैं” सवाल है पूजा देखने क्यों नहीं?
राष्ट्र संवाद संवाददाता
गांव शहर की गलियों से लेकर महानगरों की व्यस्त सड़कों तक, महा सप्तमी से लेकर विजयादशमी और प्रतिमा विसर्जन तक दुर्गा पूजा में उमड़ने वाली भीड़ हर वर्ष अपने ही रिकॉर्ड तोड़ती है। पूजा पंडाल न केवल श्रद्धा और आस्था के केंद्र बनते हैं, बल्कि राजनीति, व्यवसाय, प्रशासन और समाज की तस्वीर भी इनके इर्द-गिर्द उभरकर सामने आती है। दुर्गा पूजा अब धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर “बहुआयामी आयोजन” बन गई है, जहाँ धर्म, राजनीति, प्रशासन, कला और अर्थव्यवस्था सब एक साथ सक्रिय होते हैं। लेकिन जरूरत है कि इस संतुलन को बनाए रखते हुए पूजा के असली स्वरूप, आस्था और समाज की एकजुटता को बरकरार रखा जाए।
अधिकांश पूजा समितियां अपने पंडालों का उद्घाटन किसी विधायक, सांसद या स्थानीय राजनीतिक नेता से कराती हैं। आयोजकों का मानना है कि इससे आयोजन की “प्रतिष्ठा” बढ़ती है और आर्थिक सहयोग जुटाना आसान हो जाता है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि जहाँ उद्घाटन समारोह में नेता मौजूद रहते हैं, वहीं प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा जैसे मूल धार्मिक अनुष्ठानों में उनकी उपस्थिति नगण्य रहती है। कई पुजारी इस पर टिप्पणी करते हैं कि “पूजा का असली धर्मार्थ पक्ष पीछे छूट रहा है, आगे आ रहा है सिर्फ प्रचार और लोकप्रियता।”
युवा पीढ़ी के लिए दुर्गा पूजा आज एक सांस्कृतिक कार्निवाल का रूप ले चुकी है। वे कहते हैं “चलो पंडाल देखने चलें।” देवी की आराधना के बजाय थीम, लाइटिंग, सजावट और भीड़भाड़ उनके आकर्षण का केंद्र हैं। सामाजिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव शहरी जीवनशैली और बदलती प्राथमिकताओं का परिणाम है। हालांकि, इससे कारीगरों और कलाकारों को नई पहचान और रोजगार मिला है।
भारी भीड़ के बीच जेबकतरी, छेड़छाड़, शराबबाजी और झगड़े जैसी घटनाओं का खतरा हमेशा मंडराता है। इसे रोकने के लिए प्रशासन हर साल हजारों पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाता है। कई जगहों पर ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी की भी निगरानी होती है। लेकिन सवाल यह है कि जब पूरा समाज पूजा का आनंद ले रहा होता है, तब इन अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के परिवारों के लिए क्या यही “त्योहार” है? पुलिसकर्मी अक्सर शिकायत करते हैं कि वे अपने घर में माँ दुर्गा की आराधना तक में शामिल नहीं हो पाते।
पूजा पंडालों के आसपास अस्थायी बाजार सज जाते हैं। खोमचे, फुचका, खिलौने, झूले और हस्तशिल्प बेचने वाले अतिलघु व्यापारी वर्ग के लिए यही साल का सबसे बड़ा अवसर होता है। कई लोग कहते हैं “पूजा हमारे लिए देवी के दर्शन नहीं, बल्कि रोज़ी-रोटी का साधन है।” आंकड़ों के अनुसार, महानगरों में दुर्गा पूजा सीज़न में करोड़ों रुपये का टर्नओवर सिर्फ इन छोटे व्यवसायों के जरिये होता है
आज एक ही इलाके में कई पंडालों का निर्माण होता है, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। पंडालों की प्रतिस्पर्धा कि कौन बड़ा, कौन सुंदर और कौन ज्यादा “वायरल” यह प्रश्न समिति की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि एक या दो भव्य पंडाल बनाकर सामूहिक पूजा की जाए, तो लाखों-करोड़ों रुपये की बचत हो सकती है, जिन्हें अस्पताल, स्कूल या स्थायी सांस्कृतिक केंद्रों पर खर्च किया जा सकता है।

