देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति अपने आप में एक ऐसा कैनवस है, जहां हर चुनाव एक नई तस्वीर बनाता है, लेकिन उस तस्वीर के रंग वही पुराने रहते हैं, जाति, धर्म, क्षेत्र और गठबंधन की मजबूती। इस राज्य में राजनीति महज नारों या विकास के वादों पर नहीं चलती, बल्कि हर बार मतदाता यह सोचता है कि उसकी जाति, उसका समुदाय और उसका इलाका सत्ता की हिस्सेदारी में कहां खड़ा होगा। यही कारण है कि बिहार चुनावों को समझने के लिए हमें पहले जातीय गणित में उतरना पड़ता है और फिर गठबंधन राजनीति की बारीकियों को देखना पड़ता है।
हाल ही में आए Ascendia ‘बैटल ऑफ बिहार 2025’ सर्वे ने इसी राजनीति की तहों को उघाड़ने की कोशिश की है। यह सर्वे राज्य के सभी 9 प्रमंडलों में किया गया है, और इसके निष्कर्ष बताते हैं कि इस बार भी बिहार का चुनाव जातीय गणित और दो प्रमुख गठबंधनों एनडीए और महागठबंधन के बीच बंटा रहेगा, लेकिन इस बार का मुकाबला उतना सीधा नहीं है, जितना 2020 में था। वजह है दो नई ताक़तों का उभरना। पहला, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और दूसरा, असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम का उभरना। इन दोनों ने चुनावी बिसात को जटिल बना दिया है, और यही जटिलता इस बार के चुनाव को दिलचस्प भी बना रही है। बिहार में जाति को नजरअंदाज करके कोई भी चुनावी आकलन अधूरा रहता है। यहां की राजनीति का ढांचा ही इस तरह का है कि हर जाति का अपना वोट बैंक है और उसका झुकाव किस ओर है, यह नतीजों को बदल देता है। दलित, अति पिछड़ा वर्ग, ओबीसी और मुस्लिम, ये चार बड़े खंभे हैं, जिन पर बिहार की राजनीति खड़ी है।
बिहार की लगभग 20 प्रतिशत आबादी दलितों की है। इनमें जाटव या राम (5 प्रतिशत), पासवान (5 प्रतिशत) और मुसहर (3 प्रतिशत) प्रमुख जातियां हैं। इस वर्ग का रुझान हमेशा निर्णायक होता है। सर्वे के अनुसार पासवान और मुसहर समुदाय का झुकाव अब भी एनडीए के पक्ष में है। इसका बड़ा कारण लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) का एनडीए में होना और नीतीश कुमार की सरकार द्वारा किए गए कुछ कल्याणकारी कार्यक्रम हैं, लेकिन जाटव या राम समुदाय में हलचल है। इस वर्ग के युवा अब आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर रावण को लेकर दिलचस्पी दिखा रहे हैं। यदि यह आकर्षण वोटों में तब्दील हुआ तो महागठबंधन को फायदा हो सकता है।
अति पिछड़े वर्ग की आबादी लगभग 26 प्रतिशत है और पिछले कई चुनावों से इनका झुकाव एनडीए के पक्ष में रहा है। नीतीश कुमार ने खुद को इस वर्ग का सबसे बड़ा नेता साबित किया है। लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ नहीं होता। महागठबंधन अगर टिकट बंटवारे में इस वर्ग को पर्याप्त हिस्सेदारी देता है, तो उनके भीतर बदलाव की संभावना बनी हुई है। यही वह वर्ग है जो अंतिम समय में नतीजे का रुख बदल सकता है। ओबीसी वर्ग में सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का है। यादव मतदाता आरजेडी के साथ पूरी मजबूती से खड़े दिखते हैं। लालू प्रसाद यादव ने ‘माई समीकरण’—मुस्लिम और यादव—के जरिये जो नींव रखी थी, वह आज भी मजबूत है, लेकिन यादवों से बाहर ओबीसी वर्ग की तस्वीर अलग है। कोइरी और कुर्मी जैसी जातियां ज्यादा झुकाव एनडीए की ओर रखती हैं। नीतीश कुमार कुर्मी समुदाय से आते हैं और बीजेपी भी इन जातियों को अपने पाले में बनाए रखने की लगातार कोशिश करती रही है। हालांकि, कोइरी या कुशवाहा वोट बैंक का एक हिस्सा 2024 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की ओर झुक चुका था और इस बार भी इसकी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
बिहार का मुस्लिम वोट बैंक हमेशा से चुनावी गणित का सबसे अहम हिस्सा रहा है। लगभग 17 प्रतिशत आबादी वाला यह वर्ग लंबे समय तक महागठबंधन, खासकर आरजेडी का अडिग समर्थक रहा। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में इस वोट बैंक के भीतर भी हलचल देखी गई है। 2020 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम ने सीमांचल क्षेत्र में सेंध लगाई थी और करीब 17 प्रतिशत मुस्लिम वोट उसने अपनी ओर खींच लिए थे। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में यह तस्वीर बदली और लगभग 83 प्रतिशत मुस्लिम वोट महागठबंधन के खाते में चले गए। लेकिन ताज़ा सर्वे एक नई बेचैनी की ओर इशारा करता है।
मुस्लिम मतदाता अब भी महागठबंधन को प्राथमिकता दे सकते हैं, लेकिन उनमें असंतोष भी है। यह असंतोष मुख्य रूप से सीमांचल इलाके में गहरा है, जहां मुसलमानों की आबादी आधे से भी ज्यादा है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में मुस्लिम नेताओं को अपेक्षित प्रमुखता न मिलना इस असंतोष की जड़ है। मुस्लिम मतदाता अब केवल गठबंधन की औपचारिक सदस्यता से संतुष्ट नहीं हैं, वे ज्यादा टिकट और सत्ता में सीधी हिस्सेदारी चाहते हैं। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री पद की मांग भी खुलकर सामने आ रही है।
इसी पृष्ठभूमि में ओवैसी की सक्रियता महागठबंधन के लिए चुनौती बन जाती है। सीमांचल में उनकी मौजूदगी पहले ही साबित हो चुकी है। अगर, महागठबंधन ने मुस्लिम नेतृत्व की आकांक्षाओं की अनदेखी की, तो ओवैसी इस असंतोष को राजनीतिक पूंजी में बदल सकते हैं। प्रशांत किशोर, जो लंबे समय तक देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकार रहे, अब अपनी पार्टी जन सुराज के साथ मैदान में हैं। सर्वे यह संकेत देता है कि जन सुराज पार्टी एक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती है। खासकर, दक्षिण बिहार में इसका असर महसूस हो रहा है, जबकि उत्तर बिहार में अभी इसकी पकड़ कमजोर है।
जन सुराज पार्टी उन मतदाताओं को आकर्षित कर सकती है जो पारंपरिक गठबंधनों से ऊब चुके हैं और एक नए विकल्प की तलाश में हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में केवल ‘परिवर्तन’ का नारा काफी नहीं होता। यहां सफलता पाने के लिए जातीय समीकरणों की पकड़ जरूरी है। फिलहाल, पीके का सबसे बड़ा संघर्ष यही है कि वे इस जटिल जातीय गणित में अपनी जगह कैसे बनाते हैं। सर्वे ने राज्य के तिरहुत, दरभंगा, सारण, कोसी, पूर्णिया, मगध, मुंगेर, पटना और भागलपुर प्रमंडलों के अलावा भोजपुर क्षेत्र का भी विश्लेषण किया है।
मगध और भोजपुर में महागठबंधन को नुकसान होने का अनुमान है। पूर्णिया और सीमांचल में महागठबंधन को सीटों का फायदा हो सकता है, लेकिन ओवैसी फैक्टर यहां उन्हें मुश्किल में डाल सकता है। अगर, 2020 के नतीजों की बात करें तो तब एनडीए को 125 सीटें मिली थीं, और महागठबंधन 110 सीटों पर सिमट गया था। यह अंतर बहुत बड़ा नहीं था, और यही वजह है कि 2025 का चुनाव और ज्यादा रोमांचक होने जा रहा है।
बिहार का चुनाव केवल मतदाताओं की पसंद का सवाल नहीं है, बल्कि यह गठबंधन राजनीति की परख भी है। एनडीए में बीजेपी और जेडीयू का समीकरण अक्सर उतार-चढ़ाव से गुजरता रहा है, लेकिन इस बार नीतीश कुमार फिर उसी गठबंधन की अगुवाई कर रहे हैं। महागठबंधन में आरजेडी के साथ कांग्रेस और वाम दल हैं, लेकिन आंतरिक मतभेद और सीट बंटवारे का संकट वहां गहराता दिख रहा है। मुस्लिम वोटरों की बेचैनी, यादवों का अडिग समर्थन, अति पिछड़ों का झुकाव और ओवैसी की सक्रियता, इन सबको देखते हुए महागठबंधन को एकजुट रखना तेजस्वी यादव के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। दूसरी ओर, एनडीए को अपनी पुरानी सामाजिक इंजीनियरिंग बनाए रखने और जन सुराज जैसी नई ताक़तों से संभावित नुकसान को रोकने की जिम्मेदारी निभानी होगी।
कुल मिलाकर, बिहार का चुनाव 2025 किसी एकतरफा मुकाबले की कहानी नहीं होने जा रहा है। यह चुनाव जातीय गणित, गठबंधन की मजबूती और नई राजनीतिक ताक़तों की चुनौती का संगम होगा। एनडीए को दलितों, अति पिछड़ों और गैर-यादव ओबीसी में मजबूती मिल रही है, जबकि महागठबंधन यादव और मुस्लिम वोट बैंक पर भरोसा कर रहा है, लेकिन मुस्लिम मतदाताओं में उठती बेचैनी और ओवैसी की सक्रियता इस भरोसे को चुनौती दे सकती है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी, भले ही फिलहाल पूरे राज्य में निर्णायक न दिखे, लेकिन यह इतना असर डाल सकती है कि कई सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो जाए और परिणाम अप्रत्याशित दिशा में चले जाएं। अंततः यह चुनाव केवल दो गठबंधनों की जंग नहीं होगा। यह चुनाव बताएगा कि बिहार की राजनीति अभी भी पूरी तरह जातीय समीकरणों की गिरफ्त में है या धीरे-धीरे मतदाता नए विकल्पों की ओर देखना शुरू कर रहे हैं, लेकिन इतना तो तय है कि इस बार का चुनाव बिहार की राजनीतिक धारा को नए सिरे से मोड़ सकता है और नतीजे केवल पटना ही नहीं, दिल्ली तक की राजनीति को प्रभावित करेंगे।

