भाजपा का ‘75 वर्ष का नियम’ एक परंपरा से ज़्यादा एक राजनीतिक रणनीति का प्रमाण
देवानंद सिंह
भारतीय राजनीति में उम्र हमेशा से एक संवेदनशील और विवादित मुद्दा रहा है। ख़ासकर, भारतीय जनता पार्टी के भीतर यह बहस पिछले एक दशक से बार-बार सिर उठाती रही है कि क्या नेताओं को 75 वर्ष की उम्र के बाद सक्रिय राजनीति से हट जाना चाहिए ? जब-जब कोई वरिष्ठ नेता इस सीमा तक पहुंचता है, यह चर्चा अचानक प्रासंगिक हो जाती है। अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं 75 वर्ष के हो गए हैं तो एक बार फिर यह सवाल गहराई से उठ खड़ा हुआ है।
दरअसल, भाजपा के भीतर 75 वर्ष की आयु सीमा का विचार कभी भी औपचारिक रूप से घोषित नियम नहीं रहा, लेकिन इसे कई बार ‘लिखा न गया अनुशासन’ और ‘राजनीतिक संकेत’ के रूप में प्रस्तुत किया गया। पार्टी संविधान में इस तरह की कोई बाध्यता नहीं है, फिर भी राजनीतिक परंपरा के नाम पर इसका उल्लेख होता रहा। विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे विवाद की जड़ 2014 के आम चुनावों से पहले की परिस्थितियों में छिपी हुई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया गया था, तब पार्टी के कई वरिष्ठ नेता, जो लंबे समय से संगठन में प्रभावशाली थे, इस फैसले से सहज नहीं थे। उस समय यह आशंका थी कि यदि, इन बुज़ुर्ग नेताओं को सत्ता में प्रमुख भूमिका दी गई, तो मोदी की स्वतंत्रता प्रभावित होगी। ऐसे में, एक ‘तर्क’ गढ़ा गया कि 75 वर्ष की आयु के बाद नेताओं को सक्रिय पदों से हट जाना चाहिए।
यही वह दौर था, जब लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गजों को एक ‘मार्गदर्शक मंडल’ में डाल दिया गया। दिलचस्प बात यह है कि इस मंडल की आज तक कोई औपचारिक बैठक ही नहीं हुई। यह कदम उस समय राजनीतिक रूप से सुविधाजनक था, लेकिन इसे पार्टी अनुशासन का हिस्सा बताकर एक नैरेटिव खड़ा कर दिया गया। 2016 में गुजरात की तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने इस्तीफ़ा देते समय कहा था कि वे नवंबर में 75 वर्ष की हो जाएंगी और इसलिए पद छोड़ रही हैं। उन्होंने इसे भाजपा की परंपरा और अनुशासन से जोड़ा। उनके इस बयान ने उस समय यह संदेश दिया कि पार्टी ने वास्तव में आयु सीमा की एक परंपरा बना दी है, हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह नियम कभी स्थायी या सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं किया गया। इसका इस्तेमाल चुनिंदा मौक़ों पर हुआ और जब राजनीतिक मजबूरी हुई तो अपवाद भी बनाए गए।
बीजेपी को क़रीब से देखने वाले जानकार मानते हैं कि 75 वर्ष की सीमा असल में केवल एक संकेत था। यानी नेतृत्व समय-समय पर युवाओं को जगह देता रहे, पर कब और किसे हटाया जाए यह पूरी तरह राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता रहा। आडवाणी और जोशी को 2014 में हाशिए पर डालना ज़रूरी था, इसलिए यह तर्क उस समय कारगर रहा। अन्य विशेषज्ञों के अनुसार, यह सीमा कभी भी कठोर नियम नहीं थी, बल्कि एक सॉफ्ट गाइडलाइन थी। पार्टी इसका इस्तेमाल उन नेताओं को सम्मानजनक तरीक़े से साइडलाइन करने के लिए करती रही, जिनकी उपयोगिता पार्टी नेतृत्व के हिसाब से कम हो गई थी, लेकिन जब वही वरिष्ठ नेता किसी चुनावी समीकरण में काम के साबित हुए, तो अपवाद बनाए गए। यही वजह है कि यह सवाल हमेशा उठा कि क्या यह नियम केवल आडवाणी-जोशी जैसे नेताओं के लिए था या सभी के लिए समान रूप से लागू होना चाहिए।
बीजेपी के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां 75 वर्ष की दलील का लचीलेपन से इस्तेमाल हुआ। नजमा हेपतुल्ला और कलराज मिश्र को कैबिनेट से हटाकर राज्यपाल बना दिया गया। बीएस येदियुरप्पा ने 78 वर्ष की उम्र में मुख्यमंत्री पद छोड़ा। यशवंत सिन्हा को भी सक्रिय राजनीति से बाहर कर दिया गया और उन्होंने आरोप लगाया कि 75 से ऊपर के नेताओं को ब्रेन डेड मान लिया गया है, लेकिन दूसरी तरफ़ ऐसे मामले भी सामने आए जहां 75 की सीमा को दरकिनार किया गया। कई वरिष्ठ नेताओं को टिकट दिए गए, जबकि कई को इसी आधार पर टिकट से वंचित कर दिया गया। यह लचीलापन बताता है कि यह नियम दरअसल नेतृत्व की राजनीतिक सुविधा का साधन मात्र था।
जब हाल ही में यह बहस एक बार फिर तेज़ हुई, तो गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि पार्टी संविधान में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 की उम्र में रिटायर नहीं होंगे और आगे भी देश का नेतृत्व करेंगे। शाह के बयान ने इस बहस को एक तरह से शांत करने की कोशिश की, लेकिन इससे यह भी साबित हुआ कि पार्टी शीर्ष नेतृत्व पर ऐसे नियम लागू नहीं होते।
इस साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक समारोह में 75 वर्ष की उम्र का उल्लेख करते हुए कहा था कि इस उम्र में सम्मानित करने का अर्थ होता है। अब आपका समय पूरा हुआ, अब आप हट जाइए और दूसरों को काम करने दीजिए। उनके बयान ने तुरंत राजनीतिक हलचल मचा दी और सवाल उठने लगे कि कहीं यह इशारा प्रधानमंत्री मोदी की ओर तो नहीं था, हालांकि बाद में भागवत ने स्पष्ट किया कि उनका आशय किसी व्यक्ति विशेष या भाजपा के किसी नियम से नहीं था। संयोग से इस साल स्वयं भागवत भी 75 वर्ष के हो गए, इसलिए उनके बयान को अलग-अलग अर्थों में लिया गया। कुछ जानकार मानते हैं कि यह पूरी बहस कभी असल में थी ही नहीं। यह हमेशा एक ‘नकली बहस’ रही है क्योंकि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने जब भी चाहा, किसी को भी किनारे कर दिया और जब चाहा, किसी को भी पद पर बनाए रखा। यानी यह नियम कभी भी सभी पर समान रूप से लागू नहीं हुआ। इस दृष्टि से देखा जाए तो भाजपा में उम्र की सीमा एक औपचारिक नीति से ज़्यादा एक रणनीतिक औजार रही है। शीर्ष नेतृत्व के लिए यह एक सुविधाजनक रास्ता था जिससे वह पुराने नेताओं को सम्मानजनक विदाई दे सके और साथ ही युवाओं के लिए जगह बना सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, भाजपा और संघ की संस्कृति में युवाओं को अवसर देना हमेशा से प्राथमिकता रही है। अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में भी अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद जैसे युवा नेताओं को आगे लाया गया। संगठन लगातार नई पीढ़ी को ऊपर लाने की प्रक्रिया पर काम करता है, लेकिन यह कहना कि 75 वर्ष की उम्र के बाद राजनीति से हटना अनिवार्य है, कभी सही नहीं रहा।
यह सच है कि पार्टी समय-समय पर युवाओं को अवसर देती रही है, लेकिन समानांतर रूप से यह भी सच है कि जब तक कोई वरिष्ठ नेता राजनीतिक रूप से उपयोगी है, उसकी उम्र कोई बाधा नहीं बनती।
असल सवाल यह है कि क्या किसी लोकतांत्रिक पार्टी को नेतृत्व के लिए एक औपचारिक उम्र सीमा तय करनी चाहिए? कुछ युवा नेताओं का मानना है कि यह ज़रूरी होना चाहिए, ताकि नए चेहरे सामने आएं और राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव सहज रूप से हो, लेकिन दूसरी ओर तर्क यह भी है कि अनुभव और क्षमता उम्र से नहीं, बल्कि सक्रियता और योगदान से तय होते हैं। प्रधानमंत्री जैसे पदों के मामले में यह बहस और भी पेचीदा हो जाती है। क्योंकि यदि नेता अब भी सक्षम और लोकप्रिय है, तो केवल उम्र के आधार पर उसे पद छोड़ने के लिए कहना लोकतांत्रिक भावना के विपरीत भी माना जा सकता है।
कुल मिलाकर, भाजपा में 75 वर्ष की आयु का सवाल मूलतः एक राजनीतिक औजार रहा है। इसे उस समय उठाया गया जब नेतृत्व परिवर्तन की ज़रूरत थी। इसका इस्तेमाल चुनिंदा मौक़ों पर किया गया ताकि पुराने नेताओं को किनारे किया जा सके। लेकिन जब वही वरिष्ठ नेता राजनीतिक रूप से प्रासंगिक रहे, तो नियम को भुला दिया गया, इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि भाजपा में 75 वर्ष की सीमा कोई औपचारिक परंपरा नहीं, बल्कि एक लचीला राजनीतिक नैरेटिव है। यह पार्टी नेतृत्व की ज़रूरतों और परिस्थितियों के अनुसार लागू किया गया और आगे भी यही होता रहेगा।
प्रधानमंत्री मोदी के 75 वर्ष के होने के साथ यह बहस फिर से सामने है, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने साफ़ कर दिया है कि यह सीमा उन पर लागू नहीं होती। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे नियम हमेशा शीर्ष नेतृत्व के लिए नहीं होते, बल्कि नेतृत्व द्वारा दूसरों पर लागू किए जाने वाले औज़ार होते हैं। आख़िरकार, राजनीति में उम्र से ज़्यादा अहमियत सत्ता, लोकप्रियता और रणनीतिक उपयोगिता की होती है। भाजपा का ‘75 वर्ष का नियम’ एक परंपरा से ज़्यादा एक राजनीतिक रणनीति का प्रमाण है।

