भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीतियां
(शिक्षक दिवस पर समर्पित)
सुधाकर ठाकुर ( शिक्षक)
सरायकेला-खरसावां, झारखंड
परतंत्रता-काल से पूर्व भारत राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से उन्नत देश था । राजा, महाराजा, सम्राट जनप्रिय हुआ करते थे और अपनी उर्जा शक्ति का उपयोग जनहित मे किया करते थे । देश में काल और परिस्थितियां हमेशा बदलती रहती हैं । हमारे सम्पन्न भारत पर विदेशी आक्रांताओ की बुरी नजर हमेशा बनी रहती थी । वे हमेशा भारत पर आधिपत्य जमाने के लिए आक्रमण किया करते थे । कालांतर मे भारत गुलाम हुआ । गुलामी काल मे राजनीति और राजस्व के अलावा सबसे ज्यादा चोट हमारी शिक्षा और संस्कृति पर की गई। भारत के महत्वपूर्ण शिक्षण संस्थान यथा : तक्षशिला, काश्मीर, स्मस्त, नालंदा, विक्रमशीला, वल्लभी पुषपगिरि, ओदंतपुरी, सोमपुरा, काशी, जगदला आदि नामचीन विश्व विद्यालय थे जो हमारी गौरवशाली शिक्षा के प्रमाण थे। यूनान, मिश्र और रोम की सभ्यताओं की तरह भारत की सभ्यता, शिक्षा और संस्कृति को करीब करीब बर्बाद करने का पूर्ण प्रयास किया गया ।

परन्तु , हमारा भारत शिक्षा के रक्षक श्रुतियों या वेदों का देश है यहां के जन मानस ने अपने ज्ञान और शिक्षा के स्रोतो, विद्वानों, ऋषियों, मनिषियों, विदुषियो को स्मरण मे रखा । चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, पाणिनी, भास्कराचार्य, माधवाचार्य, पतंजलि, चक्रपाणी, तिरूवल्लूवर, गौतम, वेदव्यास, वाल्मिकी, सूर, तुलसी, गार्गी और सावित्रीबाई फूले आदि को जीवित रखने का काम किया । शिक्षा के माध्यम से यही हमारी शैक्षिक एवं सांस्कृतिक विरासत को जिन्दा रखने के प्रबल स्रोत हैं । ब्रिटिश काल मे हमारे गौरवशाली शिक्षण संस्थानों के साथ-साथ इन महान विद्वानों और विभूतियो के योगदान को समाप्त करने का प्रयास किया गया ।मैकमूलर और मैकाले ने हमारे सम्पूर्ण जन मानस को शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः गुलाम बनाने का प्रयास किया ।
परन्तु , *यदायदाहिज्ञानस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युथानम् ज्ञानस्यतदात्मनं सृजाम्यहम्* वाला देश अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्र का विगुल फूंका और हमारे क्रांतिवीरो की शहादत के परिणाम स्वरूप देश धीरे धीरे आजाद हुआ । तदुपरांत दुर्भाग्यवश भारत का फिर एकबार बंटवारा हुआ और अफगानिस्तान के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश बना जिस भू-भाग से हमारी शिक्षा और संस्कृति समाप्त प्राय है ।

भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना और यहां की तत्कालीन सरकारो ने शिक्षा के बारे मे सोंचना शुरू किया। विश्व विद्यालय शिक्षा आयोग, माध्यमिक शिक्षा आयोग, कोठारी आयोग, *प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1968* के माध्यम से देश मे शिक्षा का एक मजबूत ढांचा तैयार होने लगा। सन् 1948 ई0 से सन् 1977 ई0 तक हमारी तत्कालीन सरकारो ने मौलाना अबुल कलाम आजाद, हुमायूं कबीर, मुहम्मद करीम चागला, फकरूदीन अल्ली अहमद, नुरूल हसन जैसे इस्लामिक विद्वानो को भारत का शिक्षा मंत्री बनाया और इन्होने भारतीय शिक्षा का प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूप रेखा तैयार करने का काम वामपंथियों को सौंप दिया । व्यापक रूप से शिक्षा का ढांचा तैयार करते हुए पहली पाठ्यचर्या सन् 1975 ई0 मे लागू की गई । और हमारी पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से धर्म, जाति, मजहब, पंथ, सम्प्रदाय, स्थान, लिंग, भाषा, क्षेत्र आदि को समान प्राथमिकता देते हुए शिक्षा को भारतीयता से *सेकुलरिज्म* की ओर खींचने का प्रयास किया गया।

18 वर्ष बाद *द्वितीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति* की आवश्यकता महसूस हुई ।सन् 1986 ई0 मे द्वितीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई। इस शिक्षा नीति का उद्देश्य स्वर्ण-मृग की तरह था जिसे “राष्ट्र की प्रगति” कहा गया । तदुपरांत साझी नागरिकता एवं साझी सांस्कृति को बढ़ावा देना, उसे पुष्पित, पल्लवित और फलित करने एवं राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को मजबूत करने का लक्ष्य रखा गया ।
28 वर्षों के लम्बे सफर के बाद देश मे समय बदला, परिस्थितियां बदली, सरकार बदली, जनमानस बदला, सत्ता बदली, सोंच बदली, युग डिजिटल क्रांति मे बदल गया। अब देश मे तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति की आवश्यकता महसूस होने लगी । एस. आर. सुब्रमण्यम, के . कस्तुरीरंगन आदि कमीटियो के माध्यम से हमारे माननीय प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता मे *29 जुलाई 2020 को तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति* को लागू कर दिया गया। इस तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भी उद्देश्य तय किए गए। यह नीति *भारत की संस्कृति, परंपरा और ज्ञान को जीवित रखेगी* साथ ही *भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति तथा विद्यार्थियों मे उनके मौलिक कर्तव्यों एवं संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान की भावना जागृत करेगी* । इस तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति का सिद्धांत : स्वयं मे लचीलापन होना, आधारभूत साक्षरता एवं संख्या ज्ञान (एफ एल एन) को प्राथमिकता देना, नैतिक, मानवीय एवं सैध्दांतिक मूल्यों को प्रोत्साहन देना, मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था खड़ा करना, विद्यार्थियों मे रचनात्मक एवं तार्किक सोंच विकसित करना, बहुभाषिता एवं भाषा शक्ति को बढावा देना , शिक्षक को सीखने की प्रक्रिया की परिधि मे लाना, पाठ्यचर्या, विषय एवं पाठ्येतर गतिविधियों मे कोई अलगाव नही होना, विद्यालय मे शैक्षिक वातावरण विद्यार्थियों की रूचि के अनुरूप होना, शिक्षा के माध्यम से संविधान के उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति करना आदि है ।

हम इस तृतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति से आशा करते है कि यह अपने उद्देश्य को पूरा करने और *भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति साथ विश्व गुरू बनाने मे सक्षम होगी* ।

