आखिर कब तक आंतरिक और बाह्य गठबंधन की राजनीति में उलझी रहेगी कांग्रेस ?
देवानंद सिंह
बिहार की राजनीति में कांग्रेस पार्टी का वर्तमान स्वरूप विडंबनाओं और विघटन के जाल में फंसा हुआ है। एक ज़माने में जो पार्टी राज्य की राजनीति का पर्याय हुआ करती थी, वह अब न सिर्फ सत्ता से बल्कि जनविश्वास और राजनीतिक नेतृत्व दोनों से दूर हो चुकी है। मार्च 1990 में आख़िरी बार सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस न केवल सत्ता के गलियारों से बल्कि विपक्ष के मंच से भी धीरे-धीरे लुप्त होती चली गई। आज वह राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की जूनियर पार्टनर बनकर राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

राहुल गांधी ने बिहार यात्रा के दौरान जब आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ मिलकर विरोध प्रदर्शन किया, तो इसे कांग्रेस के पुनर्जन्म के प्रयास के रूप में प्रचारित किया गया। मगर, इस यात्रा के दौरान कन्हैया कुमार और पप्पू यादव जैसे नेताओं को खुली गाड़ी पर राहुल के साथ जगह न देना, न केवल संगठनात्मक असंतुलन को दर्शाता है बल्कि यह संकेत भी देता है कि कांग्रेस अब भी आंतरिक और बाह्य गठबंधन की राजनीति में उलझी हुई है। कन्हैया कुमार जैसे प्रभावशाली वक्ता और युवा नेता को जिस तरह से सुरक्षाकर्मियों द्वारा रोका गया, और बाद में कांग्रेस नेताओं की प्रतिक्रियाएं सामने आईं, उससे यह स्पष्ट हो गया कि यह मात्र एक सुरक्षा या प्रोटोकॉल का मामला नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहराई से जमी राजनीतिक असहजताएं और शक्ति समीकरण छुपे हैं।

2016 में जेएनयू में एक विवादित भाषण देने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए कन्हैया कुमार वामपंथी राजनीति से निकलकर कांग्रेस में आए तो उम्मीद थी कि वह पार्टी के लिए बिहार जैसे राज्य में एक नई ऊर्जा का स्रोत बन सकते हैं। शिक्षित, वाग्मी और सामाजिक न्याय की चेतना से लैस कन्हैया की उपस्थिति कांग्रेस के लिए सवर्णों और युवाओं दोनों के बीच पकड़ मजबूत करने का ज़रिया बन सकती थी, लेकिन कांग्रेस की राज्य इकाई और सहयोगी आरजेडी दोनों के भीतर कन्हैया को लेकर दुविधा दिखाई देती है। कांग्रेस के अंदर के सूत्र बताते हैं कि प्रदेश नेतृत्व उन्हें लेकर पूरी तरह सहज नहीं है। राज्य इकाई का एक बड़ा तबका यह मानता है कि कन्हैया पार्टी लाइन से अधिक अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और दिल्ली-केंद्रित पहचान पर भरोसा करते हैं। वहीं, आरजेडी के लिए भी कन्हैया एक ‘सवर्ण चेहरा’ हैं, जो तेजस्वी यादव की पिछड़ी और दलित-आधारित राजनीति में वैचारिक टकराव ला सकते हैं।

प्रशांत किशोर जैसे रणनीतिकारों की मानें तो कांग्रेस आरजेडी की छाया से बाहर नहीं निकल पा रही है। कन्हैया कुमार को राहुल गांधी की गाड़ी पर न चढ़ने देने का निर्णय अगर आरजेडी के दबाव में लिया गया, तो यह कांग्रेस की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। बिहार कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष की अनौपचारिक टिप्पणी इस संदेह को और पुष्ट करती है कि कन्हैया को शायद जानबूझकर इस विरोध-प्रदर्शन से दूर रखा गया।

राजनीति में यह समझना ज़रूरी होता है कि मंच की उपस्थिति केवल फोटो ऑप का हिस्सा नहीं होती, बल्कि वह यह भी तय करती है कि जनता और मीडिया किन चेहरों को ‘लीडर’ मानती है। इस संदर्भ में कन्हैया की अनुपस्थिति जितनी उनकी निजी विफलता नहीं थी, उससे कहीं ज़्यादा यह कांग्रेस और आरजेडी की सोची-समझी रणनीति लगती है। पूर्णिया से निर्दलीय सांसद और जनप्रिय नेता पप्पू यादव को भी राहुल की गाड़ी से दूर रखा जाना राजनीतिक सीमांकन की एक और बानगी है। पप्पू यादव कांग्रेस या आरजेडी के औपचारिक गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं, यह सही है, लेकिन यह भी सच है कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने आरजेडी को हराकर यह साबित किया है कि उन्हें जनसमर्थन प्राप्त है। ऐसे में, उन्हें प्रतीकात्मक उपस्थिति से भी वंचित करना इस ओर इशारा करता है कि बिहार की वर्तमान विपक्षी राजनीति संकीर्ण हितों और आपसी अविश्वास से ग्रस्त है।

बिहार में कांग्रेस की यह हालत केवल गठबंधन की मजबूरी नहीं है। यह नेतृत्वहीनता, ज़मीनी संघर्ष की कमी और वैचारिक अस्पष्टता जैसी एक बड़ी बीमारी के लक्षण हैं। सवर्ण प्रभुत्व वाले अतीत के बावजूद कांग्रेस कभी सामाजिक न्याय की अगुआ बनी थी, लेकिन मंडल राजनीति के बाद पार्टी ने न तो पिछड़े और दलित समाज से गंभीर जुड़ाव कायम किया और न ही सवर्णों के नए उभार को नेतृत्व में स्थान दिया। नतीजतन, कांग्रेस एक ऐसे रिक्त स्थान में खड़ी है, जहां वह न परंपरा की विरासत संभाल पा रही है और न परिवर्तन की उम्मीद बन पा रही है।

कन्हैया को नकारने के पीछे कांग्रेस की यह आशंका भी हो सकती है कि वे जल्दी ही पार्टी के भीतर असंतुलन पैदा कर सकते हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि अगर, कांग्रेस को जीवंत नेतृत्व की ज़रूरत है, तो वह ऐसे नेताओं को तरजीह क्यों नहीं दे रही, जिनमें राजनीतिक संवाद स्थापित करने और जनता से जुड़ने की क्षमता है? यह तर्क सही है कि केवल केंद्रीय नेतृत्व से निकटता और मीडिया की उपस्थिति से कोई भी नेता ‘मास लीडर’ नहीं बन सकता।
विश्लेषकों का कहना सही है कि कन्हैया को रेवंत रेड्डी की तरह जमीनी संघर्ष करना होगा, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस को भी उन्हें एक दिल्लीवाला बुद्धिजीवी मानकर किनारे नहीं करना चाहिए। अगर, कन्हैया को लेकर आरजेडी की कोई असहजता थी, तो कांग्रेस को उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए था न कि झुक जाना चाहिए था। कन्हैया जैसे नेता कांग्रेस के लिए बिहार में एक वैकल्पिक ‘नैरेटिव’ गढ़ सकते हैं, एक ऐसा नैरेटिव जो युवाओं, छात्रों, शिक्षित मध्यम वर्ग और सवर्ण जातियों को विपक्षी गठबंधन से जोड़ सके। अगर, कांग्रेस उन्हें केवल दिल्ली का प्रवक्ता बनाकर रखेगी, तो वह उनकी क्षमताओं का दुरुपयोग करेगी।

कुल मिलाकर, कन्हैया कुमार को राहुल गांधी की गाड़ी पर न चढ़ने देना, एक छोटी सी घटना लग सकती है, लेकिन इसके निहितार्थ बड़े हैं। यह घटनाक्रम न सिर्फ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि विपक्षी गठबंधन अभी भी नेताओं की असुरक्षाओं और गुटबाजी से मुक्त नहीं हो पाया है। बिहार की राजनीति में जहां आरजेडी पिछड़ों और दलितों के जनाधार पर टिकी है, वहां कांग्रेस के पास एकमात्र विकल्प यही हैं कि वह एक समावेशी, सशक्त नेतृत्व तैयार करे। वरना उसकी भूमिका आरजेडी की पिछलग्गू पार्टी की ही बनी रहेगी। कन्हैया कुमार के लिए भी यह एक संकेत है कि केवल राष्ट्रीय चेहरा बनना पर्याप्त नहीं है। उन्हें बिहार में समय देना होगा, कांग्रेस की राज्य इकाई में विश्वास जगाना होगा और जनता के साथ जीवंत संवाद स्थापित करना होगा।
तभी वे न केवल तेजस्वी यादव जैसे नेताओं की बराबरी कर पाएंगे, बल्कि बिहार की राजनीति में एक स्वतंत्र ध्रुव बनकर उभर सकेंगे। राजनीति में प्रतीकों का महत्व होता है। कन्हैया को रोकना सिर्फ एक व्यक्ति को रोकना नहीं था, वह बिहार में कांग्रेस के पुनर्जागरण की एक संभावना को प्रतीकात्मक रूप से खारिज करना भी था। कांग्रेस अगर इस प्रतीक को नहीं समझी, तो वह और भी अप्रासंगिक होती चली जाएगी।

